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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 29"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 29

> एतत् तु वचनं श्रुत्वा सीता रामस्य दुःखिता ।  
> प्रसक्ताश्रुमुखी मन्दमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर सीताको बड़ा दुःख हुआ, उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली और वे धीरे-धीरे इस प्रकार कहने लगीं—॥ १ ॥

> ये त्वया कीर्तिता दोषा वने वस्तव्यतां प्रति ।  
> गुणानित्येव तान् विद्धि तव स्नेहपुरस्कृता ॥ २ ॥

‘प्राणनाथ ! आपने वनमें रहनेके जो-जो दोष बताये हैं, वे सब आपका स्नेह पाकर मेरे लिये गुणरूप हो जायँगे । इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ॥ २ ॥

> मृगाः सिंहा गजाश्चैव शार्दूलाः शरभास्तथा ।  
> चमराः सृमराश्चैव ये चान्ये वनचारिणः ॥ ३ ॥  
> अदृष्टपूर्वरूपत्वात् सर्वे ते तव राघव ।  
> रूपं दृष्ट्वापसर्पेयुस्तव सर्वे हि बिभ्यति ॥ ४ ॥

‘रघुनन्दन ! मृग, सिंह, हाथी, शेर, शरभ, चमरी गाय, नीलगाय तथा जो अन्य जंगली जीव हैं, वे सब-के-सब आपका रूप देखकर भाग जायँगे; क्योंकि ऐसा प्रभावशाली स्वरूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होगा । आपसे तो सभी डरते हैं; फिर वे पशु क्यों नहीं डरेंगे ? ॥ ३-४ ॥

> त्वया च सह गन्तव्यं मया गुरुजनाज्ञया ।  
> त्वद्वियोगेन मे राम त्यक्तव्यमिह जीवितम् ॥ ५ ॥

‘श्रीराम ! मुझे गुरुजनोंकी आज्ञासे निश्चय ही आपके साथ चलना है; क्योंकि आपका वियोग हो जानेपर मैं यहाँ अपने जीवनका परित्याग कर दूँगी ॥ ५ ॥

> नहि मां त्वत्समीपस्थामपि शक्नोऽपि राघव ।  
> सुराणामीश्वरः शक्तः प्रधर्षयितुमोजसा ॥ ६ ॥

‘रघुनाथजी ! आपके समीप रहनेपर देवताओंके राजा इन्द्र भी बलपूर्वक मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते ॥ ६ ॥

> पतिहीना तु या नारी न सा शक्ष्यति जीवितुम् ।  
> काममेवंविधं राम त्वया मम निदर्शितम् ॥ ७ ॥

‘श्रीराम ! पतिव्रता स्त्री अपने पतिसे वियोग होनेपर जीवित नहीं रह सकेगी; ऐसी बात आपने भी मुझे भलीभाँति दर्शायी है ॥ ७ ॥

> अथापि च महाप्राज्ञ ब्राह्मणानां मया श्रुतम् ।  
> पुरा पितृगृहे सत्यं वस्तव्यं किल मे वने ॥ ८ ॥

‘महाप्राज्ञ ! यद्यपि वनमें दोष और दुःख ही भरे हैं, तथापि अपने पिताके घरपर रहते समय मैं ब्राह्मणोंके मुखसे पहले यह बात सुन चुकी हूँ कि ‘मुझे अवश्य ही वनमें रहना पड़ेगा’ यह बात मेरे जीवनमें सत्य होकर रहेगी ॥ ८ ॥

> लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्यः श्रुत्वाहं वचनं गृहे ।  
> वनवासकृतोत्साहा नित्यमेव महाबल ॥ ९ ॥

‘महाबली वीर ! हस्तरेखा देखकर भविष्यकी बातें जान लेनेवाले ब्राह्मणोंके मुखसे अपने घरपर ऐसी बात सुनकर मैं सदा ही वनवासके लिये उत्साहित रहती हूँ ॥ ९ ॥

> आदेशो वनवासस्य प्राप्तव्यः स मया किल ।  
> सा त्वया सह भर्त्राहं यास्यामि प्रिय नान्यथा ॥ १० ॥

‘प्रियतम ! ब्राह्मणसे ज्ञात हुआ वनमें रहनेका आदेश एक-न-एक दिन मुझे पूरा करना ही पड़ेगा, यह किसी तरह पलट नहीं सकता । अतः मैं अपने स्वामी आपके साथ वनमें अवश्य चलूँगी ॥ १० ॥

> कृतादेशा भविष्यामि गमिष्यामि त्वया सह ।  
> कालश्चायं समुत्पन्नः सत्यवान् भवतु द्विजः ॥ ११ ॥

‘ऐसा होनेसे मैं उस भाग्यके विधानको भोग लूँगी । उसके लिये यह समय आ गया है, अतः आपके साथ मुझे चलना ही है; इससे उस ब्राह्मणकी बात भी सच्ची हो जायगी ॥ ११ ॥

> वनवासे हि जानामि दुःखानि बहुधा किल ।  
> प्राप्यन्ते नियतं वीर पुरुषैरकृतात्मभिः ॥ १२ ॥

‘वीर ! मैं जानती हूँ कि वनवासमें अवश्य ही बहुत-से दुःख प्राप्त होते हैं; परंतु वे उन्हींको दुःख जान पड़ते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ और मन अपने वशमें नहीं हैं ॥ १२ ॥

> कन्यया च पितुर्गेहे वनवासः श्रुतो मया ।  
> भिक्षिण्याः शमवृत्ताया मम मातुरिहाग्रतः ॥ १३ ॥

‘पिताके घरपर कुमारी अवस्थामें एक शान्तिपरायणा भिक्षुकीके मुखसे भी मैंने अपने वनवासकी बात सुनी थी । उसने मेरी माताके सामने ही ऐसी बात कही थी ॥ १३ ॥

> प्रसादितश्च वै पूर्वं त्वं मे बहुतिथं प्रभो ।  
> गमनं वनवासस्य काङ्क्षितं हि सह त्वया ॥ १४ ॥  
> कृतक्षणाहं भद्रं ते गमनं प्रति राघव ।  
> वनवासस्य शूरस्य मम चर्या हि रोचते ॥ १५ ॥  
> शुद्धात्मन् प्रेमभावाद्धि भविष्यामि विकल्मषा ।  
> भर्तारमनुगच्छन्ती भर्ता हि परदैवतम् ॥ १६ ॥

‘प्रभो ! यहाँ आनेपर भी मैंने पहले ही कई बार आपसे कुछ कालतक वनमें रहनेके लिये प्रार्थना की थी और आपको राजी भी कर लिया था । इससे आप निश्चितरूपसे जान लें कि आपके साथ वनको चलना मुझे पहलेसे ही अभीष्ट है॥ ‘रघुनन्दन ! आपका भला हो । मैं वहाँ चलनेके लिये पहलेसे ही आपकी अनुमति प्राप्त कर चुकी हूँ । अपने शूरवीर वनवासी पतिका सेवा करना मेरे लिये अधिक रुचिकर है॥ ‘शुद्धात्मन् ! आप मेरे स्वामी हैं, आपके पीछे प्रेमभावसे वनमें जानेपर मेरे पाप दूर हो जायँगे; क्योंकि स्वामी ही स्त्रीके लिये सबसे बड़ा देवता है ॥ १६ ॥

> प्रेत्यभावे हि कल्याणः संगमो मे सदा त्वया ।  
> श्रुतिर्हि श्रूयते पुण्या ब्राह्मणानां यशस्विनाम्॥ १७ ॥

‘आपके अनुगमनसे परलोकमें भी मेरा कल्याण होगा और सदा आपके साथ मेरा संयोग बना रहेगा । इस विषयमें यशस्वी ब्राह्मणोंके मुखसे एक पवित्र श्रुति सुनी जाती है ( जो इस प्रकार है–) ॥ १७ ॥

> इहलोके च पितृभिर्या स्त्री यस्य महाबल ।  
> अद्भिर्दत्ता स्वधर्मेण प्रेत्यभावेऽपि तस्य सा ॥ १८ ॥

‘महाबली वीर ! इस लोकमें पिता आदिके द्वारा जो कन्या जिस पुरुषको अपने धर्मके अनुसार जलसे संकल्प करके दे दी जाती है, वह मरनेके बाद परलोकमें भी उसीकी स्त्री होती है ॥ १८ ॥

> एवमस्मात् स्वकां नारीं सुवृत्तां हि पतिव्रताम् ।  
> नाभिरोचयसे नेतुं त्वं मां केनेह हेतुना ॥ १९ ॥

‘मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ, उत्तम व्रतका पालन करनेवाली और पतिव्रता हूँ, फिर क्या कारण है कि आप मुझे यहाँसे अपने साथ ले चलना नहीं चाहते हैं ॥ १९ ॥

> भक्तां पतिव्रतां दीनां मां समां सुखदुःखयोः ।  
> नेतुमर्हसि काकुत्स्थ समानसुखदुःखिनीम् ॥ २० ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण ! मैं आपकी भक्त हूँ, पातिव्रत्यका पालन करती हूँ, आपके बिछोहके भयसे दीन हो रही हूँ तथा आपके सुख-दुःखमें समानरूपसे हाथ बँटानेवाली हूँ । मुझे सुख मिले या दुःख, मैं दोनों अवस्थाओंमें सम रहूँगी—हर्ष या शोकके वशीभूत नहीं होऊँगी । अतः आप अवश्य ही मुझे साथ ले चलनेकी कृपा करें ॥ २० ॥

> यदि मां दुःखितामेवं वनं नेतुं न चेच्छसि ।  
> विषमग्निं जलं वाहमास्थास्ये मृत्युकारणात् ॥ २१ ॥

‘यदि आप इस प्रकार दुःखमें पड़ी हुई मुझ सेविकाको अपने साथ वनमें ले जाना नहीं चाहते हैं तो मैं मृत्युके लिये विष खा लूँगी, आगमें कूद पड़ूँगी अथवा जलमें डूब जाऊँगी’ ॥ २१ ॥

> एवं बहुविधं तं सा याचते गमनं प्रति ।  
> नानुमेने महाबाहुस्तां नेतुं विजनं वनम् ॥ २२ ॥

इस तरह अनेक प्रकारसे सीताजी वनमें जानेके लिये याचना कर रही थीं तथापि महाबाहु श्रीरामने उन्हें अपने साथ निर्जन वनमें ले जानेकी अनुमति नहीं दी ॥ २२ ॥

> एवमुक्ता तु सा चिन्तां मैथिली समुपागता ।  
> स्नापयन्तीव गामुष्णैरश्रुभिर्नयनच्युतैः ॥ २३ ॥

इस प्रकार उनके अस्वीकार कर देनेपर मिथिलेशकुमारी सीताको बड़ी चिन्ता हुई और वे अपने नेत्रोंसे गरम-गरम आँसू बहाकर धरतीको भिगोने-सी लगीं ॥ २३ ॥

> चिन्तयन्तीं तदा तां तु निवर्तयितुमात्मवान् ।  
> क्रोधाविष्टां तु वैदेहीं काकुत्स्थो बहुसान्त्वयत् ॥ २४ ॥

उस समय विदेहनन्दिनी जानकीको चिन्तित और कुपित देख मनको वशमें रखनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें वनवासके विचारसे निवृत्त करनेके लिये भाँति-भाँतिकी बातें कहकर समझाया ॥ २४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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