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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 25"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 25

> सा विनीय तमायासमुपस्पृश्य जलं शुचि ।  
> चकार माता रामस्य मङ्गलानि मनस्विनी ॥ १ ॥

तदनन्तर उस क्लेशजनक शोकको मनसे निकालकर श्रीरामकी मनस्विनी माता कौसल्याने पवित्र जलसे आचमन किया, फिर वे यात्राकालिक मङ्गलकृत्योंका अनुष्ठान करने लगीं ॥ १ ॥

> न शक्यसे वारयितुं गच्छेदानीं रघूत्तम ।  
> शीघ्रं च विनिवर्तस्व वर्तस्व च सतां क्रमे ॥ २ ॥

( इसके बाद वे आशीर्वाद देती हुई बोलीं—) ‘रघुकुलभूषण ! अब मैं तुम्हें रोक नहीं सकती, इस समय जाओ, सत्पुरुषोंके मार्गपर स्थिर रहो और शीघ्र ही वनसे लौट आओ ॥ २ ॥

> यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च ।  
> स वै राघवशार्दूल धर्मस्त्वामभिरक्षतु ॥ ३ ॥

‘रघुकुलसिंह ! तुम नियमपूर्वक प्रसन्नताके साथ जिस धर्मका पालन करते हो, वही सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करे ॥ ३ ॥

> येभ्यः प्रणमसे पुत्र देवेष्वायतनेषु च ।  
> ते च त्वामभिरक्षन्तु वने सह महर्षिभिः ॥ ४ ॥

‘बेटा ! देवस्थानों और मन्दिरोंमें जाकर तुम जिनको प्रणाम करते हो, वे सब देवता महर्षियोंके साथ वनमें तुम्हारी रक्षा करें ॥ ४ ॥

> यानि दत्तानि तेऽस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता ।  
> तानि त्वामभिरक्षन्तु गुणैः समुदितं सदा ॥ ५ ॥

‘तुम सद्गुणोंसे प्रकाशित हो, बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने तुम्हें जो-जो अस्त्र दिये हैं, वे सब-के-सब सदा सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें ॥ ५ ॥

> पितृशुश्रूषया पुत्र मातृशुश्रूषया तथा ।  
> सत्येन च महाबाहो चिरं जीवाभिरक्षितः ॥ ६ ॥

‘महाबाहु पुत्र ! तुम पिताकी शुश्रूषा, माताकी सेवा तथा सत्यके पालनसे सुरक्षित होकर चिरंजीवी बने रहो ॥६॥

> समित्कुशपवित्राणि वेद्यश्चायतनानि च ।  
> स्थण्डिलानि च विप्राणां शैला वृक्षाः क्षुपा ह्रदाः ।  
> पतङ्गाः पन्नगाः सिंहास्त्वां रक्षन्तु नरोत्तम ॥ ७ ॥

‘नरश्रेष्ठ ! समिधा, कुशा, पवित्री, वेदियाँ, मन्दिर, ब्राह्मणोंके देवपूजनसम्बन्धी स्थान, पर्वत, वृक्ष, क्षुप ( छोटी शाखावाले वृक्ष ), जलाशय, पक्षी, सर्प और सिंह वनमें तुम्हारी रक्षा करें ॥ ७ ॥

> स्वस्ति साध्याश्च विश्वे च मरुतश्च महर्षिभिः ।  
> स्वस्ति धाता विधाता च स्वस्ति पूषा भगोऽर्यमा ॥ ८ ॥

‘साध्य, विश्वेदेव तथा महर्षियोंसहित मरुद्गण तुम्हारा कल्याण करें; धाता और विधाता तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों; पूषा, भग और अर्यमा तुम्हारा कल्याण करें ॥ ८ ॥

> लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा ।  
> ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः ॥९॥  
> दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा ।  
> श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः ॥ १० ॥

‘वे इन्द्र आदि समस्त लोकपाल, छहों ऋतुएँ, सभी मास, संवत्सर, रात्रि, दिन और मुहूर्त सदा तुम्हारा मङ्गल करें । बेटा ! श्रुति, स्मृति और धर्म भी सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें ॥ ९–१० ॥

> स्कन्दश्च भगवान् देवः सोमश्च सबृहस्पतिः ।  
> सप्तर्षयो नारदश्च ते त्वां रक्षन्तु सर्वतः ॥ ११ ॥

‘भगवान् स्कन्ददेव, सोम, बृहस्पति, सप्तर्षिगण और नारद—ये सभी सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें ॥ ११ ॥

> ते चापि सर्वतः सिद्धा दिशाश्च सदिगीश्वराः ।  
> स्तुता मया वने तस्मिन् पान्तु त्वां पुत्र नित्यशः॥१२॥

‘बेटा ! वे प्रसिद्ध सिद्धगण, दिशाएँ और दिक्पाल मेरी की हुई स्तुतिसे संतुष्ट हो उस वनमें सदा सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करें ॥ १२ ॥

> शैलाः सर्वे समुद्राश्च राजा वरुण एव च ।  
> द्यौरन्तरिक्षं पृथिवी वायुश्च सचराचरः ॥ १३ ॥  
> नक्षत्राणि च सर्वाणि ग्रहाश्च सह दैवतैः ।  
> अहोरात्रे तथा संध्ये पान्तु त्वां वनमाश्रितम् ॥ १४ ॥

‘समस्त पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, द्युलोक, अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, चराचर प्राणी, समस्त नक्षत्र, देवताओंसहित ग्रह, दिन और रात तथा दोनों संध्याएँ—ये सब-के-सब वनमें जानेपर सदा तुम्हारी रक्षा करें ॥ १३-१४ ॥

> ऋतवश्चापि षट् चान्ये मासाः संवत्सरास्तथा ।  
> कलाश्च काष्ठाश्च तथा तव शर्म दिशन्तु ते ॥ १५ ॥

‘छः ऋतुएँ, अन्यान्य मास, संवत्सर, कला और काष्ठा— ये सब तुम्हें कल्याण प्रदान करें ॥ १५ ॥

> महावनेऽपि चरतो मुनिवेषस्य धीमतः ।  
> तथा देवाश्च दैत्याश्च भवन्तु सुखदाः सदा ॥ १६ ॥

‘मुनिका वेष धारण करके उस विशाल वनमें विचरते हुए तुझ बुद्धिमान् पुत्रके लिये समस्त देवता और दैत्य सदा सुखदायक हों ॥ १६ ॥

> राक्षसानां पिशाचानां रौद्राणां क्रूरकर्मणाम् ।  
> कव्यादानां च सर्वेषां मा भूत् पुत्रक ते भयम् ॥ १७ ॥

‘बेटा ! तुम्हें भयंकर राक्षसों, क्रूरकर्मा पिशाचों तथा समस्त मांसभक्षी जन्तुओंसे कभी भय न हो ॥ १७ ॥

> प्लवगा वृश्चिका दंशा मशकाश्चैव कानने ।  
> सरीसृपाश्च कीटाश्च मा भूवन् गहने तव ॥ १८ ॥

‘वनमें जो मेढक या वानर, बिच्छू, डाँस, मच्छर, पर्वतीय सर्प और कीड़े होते हैं, वे उस गहन वनमें तुम्हारे लिये हिंसक न हों ॥ १८ ॥

> महाद्विपाश्च सिंहाश्च व्याघ्रा ऋक्षाश्च दंष्ट्रिणः ।  
> महिषाः शृङ्गिणो रौद्रा न ते द्रुह्यन्तु पुत्रक ॥ १९ ॥

‘पुत्र ! बड़े-बड़े हाथी, सिंह, व्याघ्र, रीछ, दाढ़वाले अन्य जीव तथा विशाल सींगवाले भयंकर भैंसे वनमें तुमसे द्रोह न करें ॥ १९ ॥

> नृमांसभोजना रौद्रा ये चान्ये सर्वजातयः ।  
> मा च त्वां हिंसिषुः पुत्र मया सम्पूजितास्त्विह ॥ २० ॥

‘वत्स ! इनके सिवा जो सभी जातियोंमें नरमांसभक्षी भयंकर प्राणी हैं, वे मेरे द्वारा यहाँ पूजित होकर वनमें तुम्हारी हिंसा न करें ॥ २० ॥

> आगमास्ते शिवाः सन्तु सिध्यन्तु च पराक्रमाः ।  
> सर्वसम्पत्तयो राम स्वस्तिमान् गच्छ पुत्रक ॥ २१ ॥

‘बेटा राम ! सभी मार्ग तुम्हारे लिये मङ्गलकारी हों। तुम्हारे पराक्रम सफल हों तथा तुम्हें सब सम्पत्तियाँ प्राप्त होती रहें । तुम सकुशल यात्रा करो ॥ २१ ॥

> स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यः पुनः पुनः ।  
> सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो ये च ते परिपन्थिनः ॥ २२ ॥

‘तुम्हें आकाशचारी प्राणियोंसे, भूतलके जीव-जन्तुओंसे, समस्त देवताओंसे तथा जो तुम्हारे शत्रु हैं, उनसे भी सदा कल्याण प्राप्त होता रहे ॥ २२ ॥

> शुक्रः सोमश्च सूर्यश्च धनदोऽथ यमस्तथा ।  
> पान्तु त्वामर्चिता राम दण्डकारण्यवासिनम् ॥ २३ ॥

‘श्रीराम ! शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर तथा यम—ये मुझसे पूजित हो दण्डकारण्यमें निवास करते समय सदा तुम्हारी रक्षा करें ॥ २३ ॥

> अग्निर्वायुस्तथा धूमो मन्त्राश्चर्षिमुखच्युताः ।  
> उपस्पर्शनकाले तु पान्तु त्वां रघुनन्दन ॥ २४ ॥  
> सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा भूतकर्ता तथर्षयः ।  
> ये च शेषाः सुरास्ते तु रक्षन्तु वनवासिनम् ॥ २५ ॥

‘रघुनन्दन ! स्नान और आचमनके समय अग्नि, वायु, धूम तथा ऋषियोंके मुखसे निकले हुए मन्त्र तुम्हारी रक्षा करें॥ ‘समस्त लोकोंके स्वामी ब्रह्मा, जगत्के कारणभूत परब्रह्म, ऋषिगण तथा उनके अतिरिक्त जो देवता हैं, वे सब-के-सब वनवासके समय तुम्हारी रक्षा करें’ ॥ २५ ॥

> इति माल्यैः सुरगणान् गन्धैश्चापि यशस्विनी ।  
> स्तुतिभिश्चानुरूपाभिरानर्चायतलोचना ॥ २६ ॥

ऐसा कहकर विशाललोचना यशस्विनी रानी कौसल्याने पुष्पमाला और गन्ध आदि उपचारोंसे तथा अनुरूप स्तुतियोंद्वारा देवताओंका पूजन किया ॥ २६ ॥

> ज्वलनं समुपादाय ब्राह्मणेन महात्मना ।  
> हावयामास विधिना राममङ्गलकारणात् ॥ २७ ॥  
> घृतं श्वेतानि माल्यानि समिधश्चैव सर्षपान् ।  
> उपसम्पादयामास कौसल्या परमाङ्गना ॥ २८ ॥

उन्होंने श्रीरामकी मङ्गल-कामनासे अग्निको लाकर एक महात्मा ब्राह्मणके द्वारा उसमें विधिपूर्वक होम करवाया ॥ श्रेष्ठ नारी महारानी कौसल्याने घी, श्वेत पुष्प और माला, समिधा तथा सरसों आदि वस्तुएँ ब्राह्मणके समीप रखवा दीं ॥ २८ ॥

> उपाध्यायः स विधिना हुत्वा शान्तिमनामयम् ।  
> हुतहव्यावशेषेण बाह्यं बलिमकल्पयत् ॥ २९ ॥

पुरोहितजीने समस्त उपद्रवोंकी शान्ति और आरोग्यके उद्देश्यसे विधिपूर्वक अग्निमें होम करके हवनसे बचे हुए हविष्यके द्वारा होमकी वेदीसे बाहर दसों दिशाओंमें इन्द्र आदि लोकपालोंके लिये बलि अर्पित की ॥ २९ ॥

> मधुदध्यक्षतघृतैः स्वस्तिवाच्यं द्विजांस्ततः ।  
> वाचयामास रामस्य वने स्वस्त्ययनक्रियाम् ॥ ३० ॥

तदनन्तर स्वस्तिवाचनके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको मधु, दही, अक्षत और घृत अर्पित करके ‘वनमें श्रीरामका सदा मङ्गल हो’ इस कामनासे कौसल्याजीने उन सबसे स्वस्त्ययन-सम्बन्धी मन्त्रोंका पाठ करवाया ॥ ३० ॥

> ततस्तस्मै द्विजेन्द्राय राममाता यशस्विनी ।  
> दक्षिणां प्रददौ काम्यां राघवं चेदमब्रवीत् ॥ ३१ ॥

इसके बाद यशस्विनी श्रीराममातादे उन विप्रवर पुरोहितजीको उनकी इच्छाके अनुसार दक्षिणा दी और श्रीरघुनाथजीसे इस प्रकार कहा—॥ ३१ ॥

> यन्मङ्गलं सहस्राक्षे सर्वदेवनमस्कृते ।  
> वृत्रनाशे समभवत् तत् ते भवतु मङ्गलम् ॥ ३२ ॥

‘वृत्रासुरका नाश करनेके निमित्त सर्वदेववन्दित सहस्रनेत्रधारी इन्द्रको जो मङ्गलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी हो ॥ ३२ ॥

> यन्मङ्गलं सुपर्णस्य विनताकल्पयत् पुरा ।  
> अमृतं प्रार्थयानस्य तत् ते भवतु मङ्गलम् ॥ ३३ ॥

‘पूर्वकालमें विनतादेवीने अमृत लानेकी इच्छावाले अपने पुत्र गरुड़के लिये जो मङ्गलकृत्य किया था, वही मङ्गल तुम्हें भी प्राप्त हो ॥ ३३ ॥

> अमृतोत्पादने दैत्यान् घ्नतो वज्रधरस्य यत् ।  
> अदितिर्मङ्गलं प्रादात् तत् ते भवतु मङ्गलम् ॥ ३४ ॥

‘अमृतकी उत्पत्तिके समय दैत्योंका संहार करनेवाले वज्रधारी इन्द्रके लिये माता अदितिने जो मङ्गलमय आशीर्वाद दिया था, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी सुलभ हो ॥ ३४॥

> त्रिविक्रमान् प्रक्रमतो विष्णोरतुलतेजसः ।  
> यदासीन्मङ्गलं राम तत् ते भवतु मङ्गलम् ॥ ३५ ॥

‘श्रीराम ! तीन पगोंको बढ़ाते हुए अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णुके लिये जो मङ्गलाशंसा की गयी थी, वही मङ्गल तुम्हारे लिये भी प्राप्त हो ॥ ३५ ॥

> ऋषयः सागरा द्वीपा वेदा लोका दिशश्च ते ।  
> मङ्गलानि महाबाहो दिशन्तु शुभमङ्गलम् ॥ ३६ ॥  
> इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी ।  
> गन्धैश्चापि समालभ्य राममायतलोचना ॥ ३७ ॥  
> औषधीं च सुसिद्धार्थां विशल्यकरणीं शुभाम् ।  
> चकार रक्षां कौसल्या मन्त्रैरभिजजाप च ॥ ३८ ॥

‘महाबाहो ! ऋषि, समुद्र, द्वीप, वेद, समस्त लोक और दिशाएँ तुम्हें मङ्गल प्रदान करें। तुम्हारा सदा शुभ मङ्गल हो’ ॥ इस प्रकार आशीर्वाद देकर विशाललोचना भामिनी कौसल्याने पुत्रके मस्तकपर अक्षत रखकर चन्दन और रोली लगायी तथा सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली विशल्यकरणी नामक शुभ ओषधि लेकर रक्षाके उद्देश्यसे मन्त्र पढ़ते हुए उसको श्रीरामके हाथमें बाँध दिया; फिर उसमें उत्कर्ष लानेके लिये मन्त्रका जप भी किया ॥ ३७-३८ ॥

> उवाचापि प्रहृष्टेव सा दुःखवशवर्तिनी ।  
> वाङ्मात्रेण न भावेन वाचा संसज्जमानया ॥ ३९ ॥  
> आनम्य मूर्ध्नि चाघ्राय परिष्वज्य यशस्विनी ।  
> अवदत् पुत्रमिष्टार्थों गच्छ राम यथासुखम् ॥ ४० ॥  
> अरोगं सर्वसिद्धार्थमयोध्यां पुनरागतम् ।  
> पश्यामि त्वां सुखं वत्स संधितं राजवर्त्मसु ॥ ४१ ॥

तदनन्तर दुःखके अधीन हुई कौसल्याने ऊपरसे प्रसन्न-सी होकर मन्त्रोंका स्पष्ट उच्चारण भी किया । उस समय वे वाणीमात्रसे ही मन्त्रोच्चारण कर सकीं, हृदयसे नहीं ( क्योंकि हृदय श्रीरामके वियोगकी सम्भावनासे व्यथित था, इसीलिये ) वे खेदसे गद्गद, लड़खड़ाती हुई वाणीसे मन्त्र बोल रही थीं॥ इसके बाद उनके मस्तकको कुछ झुकाकर यशस्विनी माताने सूँघा और बेटेको हृदयसे लगाकर कहा—‘वत्स राम ! तुम सफलमनोरथ होकर सुखपूर्वक वनको जाओ। जब पूर्णकाम होकर रोगरहित सकुशल अयोध्यामें लौटोगे, उस समय तुम्हें राजमार्गपर स्थित देखकर सुखी होऊँगी ॥ ४०-४१ ॥

> प्रणष्टदुःखसंकल्पा हर्षविद्योतितानना ।  
> द्रक्ष्यामि त्वां वनात् प्राप्तं पूर्णचन्द्रमिवोदितम् ॥ ४२ ॥  
> भद्रासनगतं राम वनवासादिहागतम् ।  
> द्रक्ष्यामि च पुनस्त्वां तु तीर्णवन्तं पितुर्वचः ॥ ४३ ॥

‘उस समय मेरे दुःखपूर्ण संकल्प मिट जायँगे, मुखपर हर्षजनित उल्लास छा जायगा और मैं वनसे आये हुए तुमको पूर्णिमाकी रातमें उदित हुए पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति देखूँगी ॥ ‘श्रीराम ! वनवाससे यहाँ आकर पिताकी प्रतिज्ञाको पूर्ण करके जब तुम राजसिंहासनपर बैठोगे, उस समय मैं पुनः प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा दर्शन करूँगी ॥ ४३ ॥

> मङ्गलैरुपसम्पन्नो वनवासादिहागतः ।  
> वध्वाश्च मम नित्यं त्वं कामान् संवर्धयाहि भोः ॥ ४४ ॥

‘अब जाओ और वनवाससे यहाँ लौटकर राजोचित मङ्गलमय वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो तुम सदा मेरी बहू सीताकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते रहो ॥ ४४ ॥

> मयार्चिता देवगणाः शिवादयो  
> महर्षयो भूतगणाः सुरोरगाः ।  
> अभिप्रयातस्य वनं चिराय ते  
> हितानि काङ्क्षन्तु दिशश्च राघव ॥ ४५॥

‘रघुनन्दन ! मैंने सदा जिनका पूजन और सम्मान किया है, वे शिव आदि देवता, महर्षि, भूतगण, देवोपम नाग और सम्पूर्ण दिशाएँ—ये सब-के-सब वनमें जानेपर चिरकालतक तुम्हारे हितसाधनकी कामना करते रहें’ ॥ ४५ ॥

> अतीव चाश्रुप्रतिपूर्णचोलना  
> समाप्य च स्वस्त्ययनं यथाविधि ।  
> प्रदक्षिणं चापि चकार राघवं  
> पुनः पुनश्चापि निरीक्ष्य सस्वजे ॥ ४६ ॥

इस प्रकार माताने नेत्रोंमें अत्यन्त आँसू भरकर विधिपूर्वक वह स्वस्तिवाचन कर्म पूर्ण किया । फिर श्रीरामकी परिक्रमा की और बारंबार उनकी ओर देखकर उन्हें छातीसे लगाया ॥ ४६ ॥

> तया हि देव्या च कृतप्रदक्षिणो  
> निपीड्य मातुश्चरणौ पुनः पुनः ।  
> जगाम सीतानिलयं महायशाः  
> स राघवः प्रज्वलितस्तया श्रिया ॥ ४७॥

देवी कौसल्याने जब श्रीरामकी प्रदक्षिणा कर ली, तब महायशस्वी रघुनाथजी बारंबार माताके चरणोंको दबाकर प्रणाम करके माताकी मङ्गलकामनाजनित उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न हो सीताजीके महलकी ओर चल दिये ॥ ४७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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