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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 24"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 24

> तं समीक्ष्य व्यवसितं पितुर्निर्देशपालने ।  
> कौसल्या बाष्पसंरुद्धा वचो धर्मिष्ठमब्रवीत् ॥ १ ॥

कौसल्याने जब देखा कि श्रीरामने पिताकी आज्ञाके पालनका ही दृढ़ निश्चय कर लिया है, तब वे आँसुओंसे रुँधी हुई गद्गद वाणीमें धर्मात्मा श्रीरामसे इस प्रकार बोलीं—॥ १ ॥

> अदृष्टदुःखो धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः ।  
> मयि जातो दशरथात् कथमुञ्छेन वर्तयेत् ॥ २ ॥

‘हाय ! जिसने जीवनमें कभी दुःख नहीं देखा है, जो समस्त प्राणियोंसे सदा प्रिय वचन बोलता है, जिसका जन्म महाराज दशरथसे मेरे द्वारा हुआ है, वह मेरा धर्मात्मा पुत्र उञ्छवृत्तिसे—खेतमें गिरे हुए अनाजके एक-एक दानेको बीनकर कैसे जीवन-निर्वाह कर सकेगा ? ॥ २ ॥

> यस्य भृत्याश्च दासाश्च मृष्टान्यन्नानि भुञ्जते ।  
> कथं स भोक्ष्यते रामो वने मूलफलान्ययम्॥ ३ ॥

‘जिनके भृत्य और दास भी शुद्ध, स्वादिष्ट अन्न खाते हैं, वे ही श्रीराम वनमें फल-मूलका आहार कैसे करेंगे ? ॥ ३॥

> क एतच्छ्रद्दधेच्छ्रुत्वा कस्य वा न भवेद् भयम्।  
> गुणवान् दयितो राज्ञः काकुत्स्थो यद् विवास्यते ॥४॥

‘जो सद्गुणसम्पन्न और महाराज दशरथके प्रिय हैं, उन्हीं ककुत्स्थ-कुल-भूषण श्रीरामको जो वनवास दिया जा रहा है, इसे सुनकर कौन इसपर विश्वास करेगा ? अथवा ऐसी बात सुनकर किसको भय नहीं होगा ? ॥ ४ ॥

> नूनं तु बलवाँल्लोके कृतान्तः सर्वमादिशन् ।  
> लोके रामाभिरामस्त्वं वनं यत्र गमिष्यसि ॥ ५ ॥

‘श्रीराम ! निश्चय ही इस जगत्में दैव सबसे बड़ा बलवान् है । उसकी आज्ञा सबके ऊपर चलती है—वही सबको सुख-दुःखसे संयुक्त करता है; क्योंकि उसीके प्रभावमें आकर तुम्हारे-जैसा लोकप्रिय मनुष्य भी वनमें जानेको उद्यत है ॥ ५ ॥

> अयं तु मामात्मभवस्तवादर्शनमारुतः ।  
> विलापदुःखसमिधो रुदिताश्रुहुताहुतिः ॥ ६ ॥  
> चिन्ताबाष्पमहाधूमस्त्वागमनचिन्तजः ।  
> कर्शयित्वाधिकं पुत्र निःश्वासायासमम्भवः ॥ ७ ॥  
> त्वया विहीनामिह मां शोकाग्निरतुलो महान् ।  
> प्रधक्ष्यति यथा कक्ष्यं चित्रभानुर्हिमात्यये ॥ ८ ॥

‘परंतु बेटा ! तुमसे बिछुड़ जानेपर यहाँ मुझे शोककी अनुपम एवं बहुत बढ़ी हुई आग उसी तरह जलाकर भस्म कर डालेगी, जैसे ग्रीष्मऋतुमें दावानल सूखी लकड़ियों और घास-फूसको जला डालता है । शोककी यह आग मेरे अपने ही मनमें प्रकट हुई है । तुम्हें न देख पानेकी सम्भावना ही वायु बनकर इस अग्निको उद्दीप्त कर रही है । विलापजनित दुःख ही इसमें ईंधनका काम कर रहे हैं । रोनेसे जो अश्रुपात होते हैं, वे ही मानो इसमें दी हुई घीकी आहुति हैं । चिन्ताके कारण जो गरम-गरम उच्छ्वास उठ रहा है, वही इसका महान् धूम है । तुम दूर देशमें जाकर फिर किस तरह आओगे—इस प्रकारकी चिंता ही इस शोकाग्निको जन्म दे रही है । साँस लेनेका जो प्रयत्न है, उसीसे इस आगकी प्रतिक्षण वृद्धि हो रही है । तुम्हीं इसे बुझानेके लिये जल हो । तुम्हारे बिना यह आग मुझे अधिक सुखाकर जला डालेगी ॥ ६–८ ॥

> कथं हि धेनुः स्वं वत्सं गच्छन्तमनुगच्छति ।  
> अहं त्वानुगमिष्यामि यत्र वत्स गमिष्यसि ॥ ९ ॥

‘वत्स ! धेनु आगे जाते हुए अपने बछड़ेके पीछे-पीछे कैसे चली जाती है, उसी प्रकार मैं भी तुम जहाँ भी जाओगे, तुम्हारे पीछे-पीछे चली चलूँगी‘ ॥ ९ ॥

> यथा निगदितं मात्रा तद् वाक्यं पुरुषर्षभः ।  
> श्रुत्वा रामोऽब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदुःखिताम् ॥१०॥

माता कौसल्याने जैसे जो कुछ कहा, उस वचनको सुनकर पुरुषोत्तम श्रीरामने अत्यन्त दुःखमें डूबी हुई अपनी मासे पुनः इस प्रकार कहा—॥ १० ॥

> कैकेय्या वञ्चितो राजा मयि चारण्यमाश्रिते ।  
> भवत्या च परित्यक्तो न नूनं वर्तयिष्यति ॥ ११ ॥

‘मा ! कैकेयीने राजाके साथ धोखा किया है । इधर मैं वनको चला जा रहा हूँ । इस दशामें यदि तुम भी उनका परित्याग कर दोगी तो निश्चय ही वे जीवित नहीं रह सकेंगे ॥ ११ ॥

> भर्तुः किल परित्यागो नृशंसः केवलं स्त्रियाः ।  
> स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विगर्हितः ॥ १२ ॥

‘पतिका परित्याग नारीके लिये बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कर्म है । सत्पुरुषोंने इसकी बड़ी निन्दा की है; अतः तुम्हें तो ऐसी बात कभी मनमें भी नहीं लानी चाहिये ॥ १२ ॥

> यावज्जीवति काकुत्स्थः पिता मे जगतीपतिः ।  
> शुश्रूषा क्रियतां तावत् स हि धर्मः सनातनः ॥ १३ ॥

‘मेरे पिता ककुत्स्थकुल-भूषण महाराज दशरथ जबतक जीवित हैं, तबतक तुम उन्हींकी सेवा करो । पतिकी सेवा ही स्त्रीके लिये सनातन धर्म है’ ॥ १३ ॥

> एवमुक्ता तु रामेण कौसल्या शुभदर्शना ।  
> तथेत्युवाच सुप्रीता राममक्लिष्टकारिणम् ॥ १४ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर शुभ कर्मोंपर दृष्टि रखनेवाली देवी कौसल्याने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामसे कहा—‘अच्छा बेटा ! ऐसा ही करूँगी’ ॥ १४ ॥

> एवमुक्तस्तु वचनं रामो धर्मभृतां वरः ।  
> भूयस्तामब्रवीद् वाक्यं मातरं भृशदुःखिताम् ॥ १५ ॥

माके इस प्रकार स्वीकृतिसूचक बात कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने अत्यन्त दुःखमें पड़ी हुई अपनी मातासे पुनः इस प्रकार कहा—॥ १५ ॥

> मया चैव भवत्या च कर्तव्यं वचनं पितुः ।  
> राजा भर्ता गुरुः श्रेष्ठः सर्वेषामीश्वरः प्रभुः ॥ १६ ॥

‘मा ! पिताजीकी आज्ञाका पालन करना मेरा और तुम्हारा—दोनोंका कर्तव्य है; क्योंकि राजा हम सब लोगोंके स्वामी, श्रेष्ठ गुरु, ईश्वर एवं प्रभु हैं ॥ १६ ॥

> इमानि तु महारण्ये विहृत्य नव पञ्च च ।  
> वर्षाणि परमप्रीत्या स्थास्यामि वचने तव ॥ १७ ॥

‘इन चौदह वर्षोंतक मैं विशाल वनमें घूम-फिरकर लौट आऊँगा और बड़े प्रेमसे तुम्हारी आज्ञाका पालन करता रहूँगा‘ ॥ १७ ॥

> एवमुक्ता प्रियं पुत्रं बाष्पपूर्णानना तदा ।  
> उवाच परमार्ता तु कौसल्या सुतवत्सला ॥ १८ ॥

उनके ऐसा कहनेपर पुत्रवत्सला कौसल्याके मुखपर पुनः आँसुओंकी धारा बह चली । वे उस समय अत्यन्त आर्त होकर अपने प्रिय पुत्रसे बोलीं—॥ १८ ॥

> आसां राम सपत्नीनां वस्तुं मध्ये न मे क्षमम् ।  
> नय मामपि काकुत्स्थ वनं वन्यां मृगीमिव ॥ १९ ॥  
> यदि ते गमने बुद्धिः कृता पितरपेक्षया ।

‘बेटा राम ! अब मुझसे इन सौतोंके बीचमें नहीं रहा जायगा । काकुत्स्थ ! यदि पिताकी आज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे तुमने वनमें जानेका ही निश्चय किया है तो मुझे भी वनवासिनी हरिणीकी भाँति वनमें ही ले चलो‘ ॥ १९½ ॥

> तां तथा रुदतीं रामो रुदन् वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥  
> जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता दैवतं प्रभुरेव च ।  
> भवत्या मम चैवाद्य राजा प्रभवति प्रभुः ॥ २१ ॥

यह कहकर माता कौसल्या रोने लगीं । उन्हें उस तरह रोती देख श्रीराम भी रो पड़े और उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले—‘मा ! स्त्रीके जीते-जी उसका पति ही उसके लिये देवता और ईश्वरके समान है । महाराज तुम्हारे और मेरे दोनोंके प्रभु हैं ॥ २०-२१ ॥

> न ह्यनाथा वयं राज्ञा लोकनाथेन धीमता ।  
> भरतश्चापि धर्मात्मा सर्वभूतप्रियंवदः ॥ २२ ॥  
> भवतीमनुवर्तेत स हि धर्मरतः सदा ।

‘जबतक बुद्धिमान् जगदीश्वर महाराज दशरथ जीवित हैं, तबतक हमें अपनेको अनाथ नहीं समझना चाहिये । भरत भी बड़े धर्मात्मा हैं । वे समस्त प्राणियोंके प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सदा ही धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं; अतः वे तुम्हारा अनुसरण—तुम्हारी सेवा करेंगे ॥ २२½ ॥

> यथा मयि तु निष्क्रान्ते पुत्रशोकेन पार्थिवः ॥ २३ ॥  
> श्रमं नावाप्नुयात् किंचिदप्रमत्ता तथा कुरु ।

‘मेरे चले जानेपर जिस तरह भी महाराजको पुत्रशोकके कारण कोई विशेष कष्ट न हो, तुम सावधानीके साथ वैसा ही प्रयत्न करना ॥ २३½ ॥

> दारुणश्चाप्ययं शोको यथैनं न विनाशयेत् ॥ २४ ॥  
> राज्ञो वृद्धस्य सततं हितं चर समाहिता ।

‘कहीं ऐसा न हो कि यह दारुण शोक इनकी जीवनलीला ही समाप्त कर डाले । जैसे भी सम्भव हो, तुम सदा सावधान रहकर बूढ़े महाराजके हित-साधनमें लगी रहना ॥ २४½ ॥

> व्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा ॥ २५ ॥  
> भर्तारं नानुवर्तेत सा च पापगतिर्भवेत् ।

‘उत्कृष्ट गुण और जाति आदिकी दृष्टिसे परम उत्तम तथा व्रत-उपवासमें तत्पर होकर भी जो नारी पतिकी सेवा नहीं करती है, उसे पापियोंको मिलनेवाली गति ( नरक आदि ) की प्राप्ति होती है ॥ २५½ ॥

> भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमुत्तमम् ॥ २६ ॥  
> अपि या निर्नमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात् ।

‘जो अन्यान्य देवताओंकी वन्दना और पूजासे दूर रहती है, वह नारी भी केवल पतिकी सेवामात्रसे उत्तम स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेती है ॥ २६½ ॥

> शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता ॥ २७ ॥  
> एष धर्मः स्त्रिया नित्यो वेदे लोके श्रुतः स्मृतः ।

‘अतः नारीको चाहिये कि वह पतिके प्रिय एवं हित-साधनमें तत्पर रहकर सदा उसकी सेवा ही करे, यही स्त्रीका वेद और लोकमें प्रसिद्ध नित्य ( सनातन ) धर्म है। इसीका श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी वर्णन है ॥ २७½ ॥

> अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवताः ॥ २८ ॥  
> पूज्यास्ते मत्कृते देवि ब्राह्मणाश्चैव सत्कृताः ।

‘देवि ! तुम्हें मेरी मङ्गल-कामनासे सदा अग्निहोत्रके अवसरोंपर पुष्पोंसे देवताओंका तथा सत्कारपूर्वक ब्राह्मणोंका भी पूजन करते रहना चाहिये ॥ २८½ ॥

> एवं कालं प्रतीक्षस्व ममागमनकाङ्क्षिणी ॥ २९ ॥  
> नियता नियताहारा भर्तृशुश्रूषणे रता ।

‘इस प्रकार तुम नियमित आहार करके नियमोंका पालन करती हुई स्वामीकी सेवामें लगी रहो और मेरे आगमनकी इच्छा रखकर समयकी प्रतीक्षा करो ॥ २९½ ॥

> प्राप्स्यसे परमं कामं मयि पर्यागते सति ॥ ३० ॥  
> यदि धर्मभृतां श्रेष्ठो धारयिष्यति जीवितम् ।

‘यदि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज जीवित रहेंगे तो मेरे लौट आनेपर तुम्हारी भी शुभ कामना पूर्ण होगी’ ॥ ३०½ ॥

> एवमुक्ता तु रामेण बाष्पपर्याकुलेक्षणा ॥ ३१ ॥  
> कौसल्या पुत्रशोकार्ता रामं वचनमब्रवीत् ।

श्रीरामके ऐसा कहनेपर कौसल्याके नेत्रोंमें आँसू छलक आये । वे पुत्रशोकसे पीड़ित होकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोलीं—॥ ३१½ ॥

> गमने सुकृतां बुद्धिं न ते शक्नोमि पुत्रक ॥ ३२ ॥  
> विनिवर्तयितुं वीर नूनं कालो दुरत्ययः ।

‘बेटा ! मैं तुम्हारे वनमें जानेके निश्चित विचारको नहीं पलट सकती । वीर ! निश्चय ही कालकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन है ॥ ३२½ ॥

> गच्छ पुत्र त्वमेकाग्रो भद्रं तेऽस्तु सदा विभो ॥ ३३ ॥  
> पुनस्त्वयि निवृत्ते तु भविष्यामि गतक्लमा ।

‘सामर्थ्यशाली पुत्र ! अब तुम निश्चिन्त होकर वनको जाओ, तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। जब फिर तुम वनसे लौट आओगे, उस समय मेरे सारे क्लेश—सब संताप दूर हो जायँगे ॥ ३३½ ॥

> प्रत्यागते महाभागे कृतार्थे चरितव्रते ।  
> पितुरानृण्यतां प्राप्ते स्वपिष्ये परमं सुखम् ॥ ३४ ॥

‘बेटा ! जब तुम वनवासका महान् व्रत पूर्ण करके कृतार्थ एवं महान् सौभाग्यशाली होकर लौट आओगे और ऐसा करके पिताके ऋणसे उऋण हो जाओगे, तभी मैं उत्तम सुखकी नींद सो सकूँगी ॥ ३४ ॥

> कृतान्तस्य गतिः पुत्र दुर्विभाव्या सदा भुवि ।  
> यस्त्वां संचोदयति मे वच आविध्य राघव ॥ ३५ ॥

‘बेटा रघुनन्दन ! इस भूतलपर दैवकी गतिको समझना बहुत ही कठिन है, जो मेरी बात काटकर तुम्हें वन जानेके लिये प्रेरित कर रहा है ॥ ३५ ॥

> गच्छेदानीं महाबाहो क्षेमेण पुनरागतः ।  
> नन्दयिष्यसि मां पुत्र साम्ना श्लक्ष्णेन चारुणा ॥ ३६ ॥

‘बेटा ! महाबाहो ! इस समय जाओ, फिर कुशलपूर्वक लौटकर सान्त्वनाभरे मधुर एवं मनोहर वचनोंसे मुझे आनन्दित करना ॥ ३६ ॥

> अपीदानीं स कालः स्याद् वनात् प्रत्यागतं पुनः ।  
> यत् त्वां पुत्रक पश्येयं जटावल्कलधारिणम् ॥ ३७ ॥

‘वत्स ! क्या वह समय अभी आ सकता है, जब कि जटा-वल्कल धारण किये वनसे लौटकर आये हुए तुमको फिर देख सकूँगी’ ॥ ३७ ॥

> तथा हि रामं वनवासनिश्चितं  
> ददर्श देवी परमेण चेतसा ।  
> उवाच रामं शुभलक्षणं वचो  
> बभूव च स्वस्त्ययनाभिकाङ्क्षिणी ॥ ३८ ॥

देवी कौसल्याने जब देखा कि इस प्रकार श्रीराम वनवासका दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, तब वे परम आदरयुक्त हृदयसे उनको शुभसूचक आशीर्वाद देने और उनके लिये स्वस्तिवाचन करानेकी इच्छा करने लगीं ॥ ३८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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