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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 16"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 16

> स तदन्तःपुरद्वारं समतीत्य जनाकुलम् ।  
> प्रविविक्तां ततः कक्ष्यामाससाद पुराणवित् ॥ १ ॥

पुरातन वृत्तान्तोंके ज्ञाता सूत सुमन्त्र मनुष्योंकी भीड़से भरे हुए उस अन्तःपुरके द्वारको लाँघकर महलकी एकान्त-कक्षामें जा पहुँचे, जहाँ भीड़ बिल्कुल नहीं थी ॥ १ ॥

> प्रासकार्मुकबिभ्रद्भिर्युवभिर्मृष्टकुण्डलैः ।  
> अप्रमादिभिरेकाग्रैः स्वानुरक्तैरधिष्ठिताम् ॥ २ ॥

वहाँ श्रीरामके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले एकाग्रचित्त एवं सावधान युवक प्रास और धनुष आदि लिये डटे हुए थे । उनके कानोंमें शुद्ध सुवर्णके बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे ॥ २ ॥

> तत्र काषायिणो वृद्धान् वेत्रपाणीन् स्वलंकृतान् ।  
> ददर्श विष्ठितान् द्वारि स्त्र्यध्यक्षान् सुसमाहितान् ॥

उस ड्योढ़ीमें सुमन्त्रको गेरुआ वस्त्र पहने और हाथमें छड़ी लिये वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत बहुतसे वृद्ध पुरुष बड़ी सावधानीके साथ द्वारपर बैठे दिखायी दिये, जो अन्तःपुरकी स्त्रियोंके अध्यक्ष ( संरक्षक ) थे ॥ ३ ॥

> ते समीक्ष्य समायान्तं रामप्रियचिकीर्षवः ।  
> सहसोत्पतिताः सर्वे ह्यासनेभ्यः ससम्भ्रमाः ॥ ४ ॥

सुमन्त्रको आते देख श्रीरामका प्रिय करनेकी इच्छावाले वे सभी पुरुष सहसा वेगपूर्वक आसनोंसे उठकर खड़े हो गये ॥ ४ ॥

> तानुवाच विनीतात्मा सूतपुत्रः प्रदक्षिणः ।  
> क्षिप्रमाख्यात रामाय सुमन्त्रो द्वारि तिष्ठति ॥ ५ ॥

राजसेवामें अत्यन्त कुशल तथा विनीत हृदयवाले सूतपुत्र सुमन्त्रने उनसे कहा—‘आपलोग श्रीरामचन्द्रजीसे शीघ्र जाकर कहें, कि सुमन्त्र दरवाजेपर खड़े हैं’ ॥ ५ ॥

> ते राममुपसङ्गम्य भर्तुः प्रियचिकीर्षवः ।  
> सहभार्याय रामाय क्षिप्रमेवाचचक्षिरे ॥ ६ ॥

स्वामीका प्रिय करनेकी इच्छावाले वे सब सेवक श्रीरामचन्द्रजीके पास जा पहुँचे । उस समय श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीताके साथ विराजमान थे । उन सेवकोंने शीघ्र ही उन्हें सुमन्त्रका संदेश सुना दिया ॥ ६ ॥

> प्रतिवेदितमाज्ञाय सूतमभ्यन्तरं पितुः ।  
> तत्रैवानाययामास राघवः प्रियकाम्यया ॥ ७ ॥

द्वाररक्षकोंद्वारा दी हुई सूचना पाकर श्रीरामने पिताकी प्रसन्नताके लिये उनके अन्तरङ्ग सेवक सुमन्त्रको वहीं अन्तःपुरमें बुलवा लिया ॥ ७ ॥

> तं वैश्रवणसंकाशमुपविष्टं स्वलंकृतम् ।  
> ददर्श सूतः पर्यङ्के सौवर्णे सोत्तरच्छदे ॥ ८ ॥

वहाँ पहुँचकर सुमन्त्रने देखा श्रीरामचन्द्रजी वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो कुबेरके समान जान पड़ते हैं और बिछौनोंसे युक्त सोनेके पलंगपर विराजमान हैं ॥ ८ ॥

> वराहरुधिराभेण शुचिना च सुगन्धिना ।  
> अनुलिप्तं परार्ध्येन चन्दनेन परंतपम् ॥ ९ ॥  
> स्थितया पार्श्वतश्चापि वालव्यजनहस्तया ।  
> उपेतं सीतया भूयश्चित्रया शशिनं यथा ॥ १० ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुनाथजीके श्रीअङ्गोंमें वाराहके रुधिरकी भाँति लाल, पवित्र और सुगन्धित उत्तम चन्दनका लेप लगा हुआ है और देवी सीता उनके पास बैठकर अपने हाथसे चवँर डुला रही हैं। सीताके अत्यन्त समीप बैठे हुए श्रीराम चित्रासे संयुक्त चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते हैं ॥ ९-१० ॥

> तं तपन्तमिवादित्यमुपपन्नं स्वतेजसा ।  
> ववन्दे वरदं वन्दी विनयज्ञो विनीतवत् ॥ ११ ॥

विनयके ज्ञाता वन्दी सुमन्त्रने तपते हुए सूर्यकी भाँति अपने नित्य प्रकाशसे सम्पन्न रहकर अधिक प्रकाशित होनेवाले वरदायक श्रीरामको विनीतभावसे प्रणाम किया ॥ ११ ॥

> प्राञ्जलिः सुमुखं दृष्ट्वा विहारशयनासने ।  
> राजपुत्रमुवाचेदं सुमन्त्रो राजसत्कृतः ॥ १२ ॥

विहारकालिक शयनके लिये जो आसन था, उस पलंगपर बैठे हुए प्रसन्न मुखवाले राजकुमार श्रीरामका दर्शन करके राजा दशरथद्वारा सम्मानित सुमन्त्रने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा—॥ १२ ॥

> कौसल्या सुप्रजा राम पिता त्वां द्रष्टुमिच्छति ।  
> महिष्यापि हि कैकेय्या गम्यतां तत्र माचिरम् ॥ १३ ॥

‘श्रीराम ! आपको पाकर महारानी कौसल्या सर्वश्रेष्ठ संतानवाली हो गयी हैं। इस समय रानी कैकेयीके साथ बैठे हुए आपके पिताजी आपको देखना चाहते हैं, अतः वहाँ चलिये, विलम्ब न कीजिये’ ॥ १३ ॥

> एवमुक्तस्तु संहृष्टो नरसिंहो महाद्युतिः ।  
> ततः सम्मानयामास सीतामिदमुवाच ह ॥ १४ ॥

सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी नरश्रेष्ठ श्रीरामने सीताजीका सम्मान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनसे इस प्रकार कहा—॥ १४ ॥

> देवि देवश्च देवी च समागम्य मदन्तरे ।  
> मन्त्रयेते ध्रुवं किंचिदभिषेचनसंहितम् ॥ १५ ॥

‘देवि ! जान पड़ता है, पिताजी और माता कैकेयी दोनों मिलकर मेरे विषयमें ही कुछ विचार कर रहे हैं। निश्चय ही मेरे अभिषेकके सम्बन्धमें ही कोई बात होती होगी ॥ १५ ॥

> लक्षयित्वा ह्यभिप्रायं प्रियकामा सुदक्षिणा ।  
> संचोदयति राजानं मदर्थमसितेक्षणा ॥ १६ ॥

‘मेरे अभिषेकके विषयमें राजाके अभिप्रायको लक्ष्य करके उनका प्रिय करनेकी इच्छावाली परम उदार एवं समर्थ कजरारे नेत्रोंवाली कैकेयी मेरे अभिषेकके लिये ही राजाको प्रेरित कर रही होंगी ॥ १६ ॥

> सा प्रहृष्टा महाराजं हितकामानुवर्तिनी ।  
> जननी चार्थकामा मे केकयाधिपतेः सुता ॥ १७ ॥

‘मेरी माता केकयराजकुमारी इस समाचारसे बहुत प्रसन्न हुई होंगी। वे महाराजका हित चाहनेवाली और उनकी अनुगामिनी हैं। साथ ही वे मेरा भी भला चाहती हैं। अतः वे महाराजको अभिषेक करनेके लिये जल्दी करनेको कह रही होंगी ॥ १७ ॥

> दिष्ट्या खलु महाराजो महिष्या प्रियया सह ।  
> सुमन्त्रं प्राहिणोद् दूतमर्थकामकरं मम ॥ १८ ॥

‘सौभाग्यकी बात है कि महाराज अपनी प्यारी रानीके साथ बैठे हैं और उन्होंने मेरे अभीष्ट अर्थको सिद्ध करनेवाले सुमन्त्रको ही दूत बनाकर भेजा है ॥ १८ ॥

> यादृशी परिषत् तत्र तादृशो दूत आगतः ।  
> ध्रुवमद्यैव मां राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ १९ ॥

‘जैसी वहाँ अन्तरङ्ग परिषद् बैठी है, वैसे ही दूत सुमन्त्रजी यहाँ पधारे हैं। अवश्य आज ही महाराज मुझे युवराजके पदपर अभिषिक्त करेंगे ॥ १९ ॥

> हन्त शीघ्रमितो गत्वा द्रक्ष्यामि च महीपतिम् ।  
> सह त्वं परिवारेण सुखमास्स्व रमस्व च ॥ २० ॥

‘अतः मैं प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे शीघ्र जाकर महाराजका दर्शन करूँगा। तुम परिजनोंके साथ यहाँ सुखपूर्वक बैठो और आनन्द करो’ ॥ २० ॥

> पतिसम्मानिता सीता भर्तारमसितेक्षणा ।  
> आ द्वारमनुवव्राज मङ्गलान्यभिदध्युषी ॥ २१ ॥

पतिके द्वारा इस प्रकार सम्मानित होकर कजरारे नेत्रोंवाली सीतादेवी उनका मङ्गल-चिन्तन करती हुई स्वामीके साथ-साथ द्वारतक उन्हें पहुँचानेके लिये गयीं ॥२१॥

> राज्यं द्विजातिभिर्जुष्टं राजसूयाभिषेचनम् ।  
> कर्तुमर्हति ते राजा वासवस्येव लोककृत् ॥ २२ ॥

उस समय वे बोलीं—‘आर्यपुत्र ! ब्राह्मणोंके साथ रहकर आपका युवराजपदपर अभिषेक करके महाराज दूसरे समयमें राजसूय-यज्ञमें सम्राट्के पदपर आपका अभिषेक करनेयोग्य हैं। ठीक उसी तरह जैसे लोकस्रष्टा ब्रह्माने देवराज इन्द्रका अभिषेक किया था ॥ २२ ॥

> दीक्षितं व्रतसम्पन्नं वराजिनधरं शुचिम् ।  
> कुरङ्गशृङ्गपाणिं च पश्यन्ती त्वां भजाम्यहम् ॥ २३ ॥

‘आप राजसूय यज्ञमें दीक्षित हो तदनुकूल व्रतका पालन करनेमें तत्पर, श्रेष्ठ मृगचर्मधारी, पवित्र तथा हाथमें मृगका शृङ्ग धारण करनेवाले हों और इस रूपमें आपका दर्शन करती हुई मैं आपकी सेवामें संलग्न रहूँ—यही मेरी शुभ-कामना है ॥ २३ ॥

> पूर्वां दिशं वज्रधरो दक्षिणां पातु ते यमः ।  
> वरुणः पश्चिमामाशां धनेशस्तूत्तरां दिशम् ॥ २४ ॥

‘आपकी पूर्व दिशामें वज्रधारी इन्द्र, दक्षिण दिशामें यमराज, पश्चिम दिशामें वरुण और उत्तर दिशामें कुबेर रक्षा करें’ ॥ २४ ॥

> अथ सीतामनुज्ञाप्य कृतकौतुकमङ्गलः ।  
> निश्चक्राम सुमन्त्रेण सह रामो निवेशनात् ॥ २५ ॥

तदनन्तर सीताकी अनुमति ले उत्सवकालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्रके साथ अपने महलसे बाहर निकले ॥ २५ ॥

> पर्वतादिव निष्क्रम्य सिंहो गिरिगुहाशयः ।  
> लक्ष्मणं द्वारि सोऽपश्यत् प्रह्वाञ्जलिपुटं स्थितम् ॥२६॥

पर्वतकी गुफामें शयन करनेवाला सिंह जैसे पर्वतसे निकलकर आता है, उसी प्रकार महलसे निकलकर श्रीरामचन्द्रजीने द्वारपर लक्ष्मणको उपस्थित देखा, जो विनीतभावसे हाथ जोड़े खड़े थे ॥ २६ ॥

> अथ मध्यमकक्ष्यायां समागच्छत् सुहृज्जनैः ।  
> स सर्वानर्थिनो दृष्ट्वा समेत्य प्रतिनन्द्य च ॥ २७ ॥  
> ततः पावकसंकाशमारुरोह रथोत्तमम् ।  
> वैयाघ्रं पुरुषव्याघ्रो राजितं राजनन्दनः ॥ २८ ॥

तदनन्तर मध्यम कक्षामें आकर वे मित्रोंसे मिले । फिर प्रार्थी जनोंको उपस्थित देख उन सबसे मिलकर उन्हें संतुष्ट करके पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम व्याघ्रचर्मसे आवृत, शोभाशाली तथा अग्निके समान तेजस्वी उत्तम रथपर आरूढ़ हुए ॥ २७-२८ ॥

> मेघनादमसम्बाधं मणिहेमविभूषितम् ।  
> मुष्णन्तमिव चक्षूंषि प्रभया मेरुवर्चसम् ॥ २९ ॥  
> करेणुशिशुकल्पैश्च युक्तं परमवाजिभिः ।  
> हरियुक्तं सहस्राक्षो रथमिन्द्र इवाशुगम् ॥ ३० ॥  
> प्रययौ तूर्णमास्थाय राघवो ज्वलितः श्रिया ।  
> स पर्जन्य इवाकाशे स्वनवानभिनादयन् ॥ ३१ ॥  
> निकेतान्निर्ययौ श्रीमान् महाभ्रादिव चन्द्रमाः ।  
> चित्रचामरपाणिस्तु लक्ष्मणो राघवानुजः ॥ ३२ ॥  
> जुगोप भ्रातरं भ्राता रथमास्थाय पृष्ठतः ।

उस रथकी घरघराहट मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान प्रतीत होती थी । उसमें स्थानकी संकीर्णता नहीं थी । वह विस्तृत था और मणि एवं सुवर्णसे विभूषित था । उसकी कान्ति सुवर्णमय मेरुपर्वतके समान जान पड़ती थी । वह रथ अपनी प्रभासे लोगोंकी आँखोंमें चकाचौंध-सा पैदा कर देता था ॥ उसमें उत्तम घोड़े जुते हुए थे, जो अधिक पुष्ट होनेके कारण हाथीके बच्चोंके समान प्रतीत होते थे । जैसे सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हरे रंगके घोड़ोंसे युक्त शीघ्रगामी रथपर सवार होते हैं, उसी प्रकार श्रीराम अपने उस रथपर आरूढ़ थे ॥ अपनी सहज शोभासे प्रकाशित श्रीरघुनाथजी उस रथपर आरूढ़ हो तुरंत वहाँसे चल दिये । वह तेजस्वी रथ आकाशमें गरजनेवाले मेघकी भाँति अपनी घर्घर ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ महान् मेघखण्डसे निकलनेवाले चन्द्रमाके समान श्रीरामके उस भवनसे बाहर निकला ॥ श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण भी हाथमें विचित्र चँवर लिये उस रथपर बैठ गये और पीछेसे अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामकी रक्षा करने लगे ॥ ३२½ ॥

> ततो हलहलाशब्दस्तुमुलः समजायत ॥ ३३ ॥  
> तस्य निष्क्रममाणस्य जनौघस्य समन्ततः ।

फिर तो सब ओरसे मनुष्योंकी भारी भीड़ निकलने लगी । उस समय उस जन-समूहके चलनेसे सहसा भयंकर कोलाहल मच गया ॥ ३३½ ॥

> ततो हयवरा मुख्या नागाश्च गिरिसंनिभाः ॥ ३४ ॥  
> अनुजग्मुस्तथा रामं शतशोऽथ सहस्रशः ।

श्रीरामके पीछे-पीछे अच्छे-अच्छे घोड़े और पर्वतोंके समान विशालकाय श्रेष्ठ गजराज सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें चलने लगे ॥ ३४½ ॥

> अग्रतश्चास्य संनद्धाश्चन्दनागुरुभूषिताः ॥ ३५ ॥  
> खड्गचापधराः शूरा जग्मुराशंसवो जनाः ।

उनके आगे-आगे कवच आदिसे सुसज्जित तथा चन्दन और अगुरुसे विभूषित हो खड्ग और धनुष धारण किये बहुत-से शूरवीर तथा मङ्गलाशंसी मनुष्य-वन्दी आदि चल रहे थे ॥ ३५½ ॥

> ततो वादित्रशब्दाश्च स्तुतिशब्दाश्च वन्दिनाम् ॥ ३६ ॥  
> सिंहनादाश्च शूराणां ततः शुश्रुविरे पथि ।  
> हर्म्यवातायनस्थाभिर्भूषिताभिः समन्ततः ॥ ३७ ॥  
> कीर्यमाणः सुपुष्पौघैर्ययौ स्त्रीभिररिंदमः ।  
> रामं सर्वानवद्याङ्ग्यो रामपिप्रीषया ततः ॥ ३८ ॥  
> वचोभिरग्र्यैर्हर्म्यस्थाः क्षितिस्थाश्च ववन्दिरे ।

तदनन्तर मार्गमें वाद्योंकी ध्वनि, वन्दीजनोंके स्तुतिपाठके शब्द तथा शूरवीरोंके सिंहनाद सुनायी देने लगे । महलोंकी खिड़कियोंमें बैठी हुई वस्त्राभूषणोंसे विभूषित वनिताएँ सब ओरसे शत्रुदमन श्रीरामपर ढेर-के-ढेर सुन्दर पुष्प बिखेर रही थीं । इस अवस्थामें श्रीराम आगे बढ़ते चले जा रहे थे ॥ उस समय अट्टालिकाओं और भूतलपर खड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी युवतियाँ श्रीरामका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रेष्ठ वचनोंद्वारा उनकी स्तुति गाने लगीं ॥ ३८½ ॥

> नूनं नन्दति ते माता कौसल्या मातृनन्दन ॥ ३९ ॥  
> पश्यन्ती सिद्धयात्रं त्वां पित्र्यं राज्यमुपस्थितम् ।

‘माताको आनन्द प्रदान करनेवाले रघुवीर ! आपकी यह यात्रा सफल होगी और आपको पैतृक राज्य प्राप्त होगा । इस अवस्थामें आपको देखती हुई आपकी माता कौसल्या निश्चय ही आनन्दित हो रही होंगी ॥ ३९½ ॥

> सर्वसीमन्तिनीभ्यश्च सीतां सीमन्तिनीं वराम् ॥ ४० ॥  
> अमन्यन्त हि ता नार्यो रामस्य हृदयप्रियाम् ।  
> तया सुचरितं देव्या पुरा नूनं महत् तपः ॥ ४१ ॥  
> रोहिणीव शशाङ्केन रामसंयोगमाप या ।

‘वे नारियाँ श्रीरामकी हृदयवल्लभा सीमन्तिनी सीताको संसारकी समस्त सौभाग्यवती स्त्रियोंसे श्रेष्ठ मानती हुई कहने लगीं—‘उन देवी सीताने पूर्वकालमें निश्चय ही बड़ा भारी तप किया होगा, तभी उन्होंने चन्द्रमासे संयुक्त हुई रोहिणीकी भाँति श्रीरामका संयोग प्राप्त किया है‘ ॥ ४०-४१½ ॥

> इति प्रासादशृङ्गेषु प्रमदाभिर्नरोत्तमः ।  
> शुश्राव राजमार्गस्थः प्रिया वाच उदाहृताः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार राजमार्गपर रथपर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी प्रासादशिखरोंपर बैठी हुई युवती स्त्रियोंके द्वारा कही गयी ये प्यारी बातें सुन रहे थे ॥ ४२ ॥

> स राघवस्तत्र तदा प्रलापा-  
> न्शुश्राव लोकस्य समागतस्य ।  
> आत्माधिकारा विविधाश्च वाचः  
> प्रहृष्टरूपस्य पुरे जनस्य ॥ ४३ ॥

उस समय अयोध्यामें आये हुए दूर-दूरके लोग अत्यन्त हर्षसे भरकर वहाँ श्रीरामचन्द्रजीके विषयमें जो वार्तालाप और तरह-तरहकी बातें करते थे, अपने विषयमें कही गयी उन सभी बातोंको श्रीरघुनाथजी सुनते जा रहे थे ॥ ४३ ॥

> एष श्रियं गच्छति राघवोऽद्य  
> राजप्रसादाद् विपुलां गमिष्यन् ।  
> एते वयं सर्वसमृद्धकामा  
> येषामयं नो भविता प्रशास्ता ॥ ४४ ॥

वे कहते थे—‘इस समय ये श्रीरामचन्द्रजी महाराज दशरथकी कृपासे बहुत बड़ी सम्पत्तिके अधिकारी होने जा रहे हैं । अब हम सब लोगोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी, क्योंकि ये श्रीराम हमारे शासक होंगे ॥ ४४ ॥

> लाभो जनस्यास्य यदेष सर्वं  
> प्रपत्स्यते राष्ट्रमिदं चिराय ।  
> न ह्यप्रियं किंचन जातु कश्चित्  
> पश्येत दुःखं मनुजाधिपेऽस्मिन् ॥ ४५ ॥

‘यदि यह सारा राज्य चिरकालके लिये इनके हाथमें आ जाय तो इस जगत्की समस्त जनताके लिये यह महान् लाभ होगा । इनके राजा होनेपर कभी किसीका अप्रिय नहीं होगा और किसीको कोई दुःख भी नहीं देखना पड़ेगा‘ ॥ ४५ ॥

> स घोषवद्भिश्च हयैः सनागैः  
> पुरःसरैः स्वस्तिकसूतमागधैः ।  
> महीयमानः प्रवरैश्च वादकै-  
> रभिष्टुतो वैश्रवणो यथा ययौ ॥ ४६ ॥

हिनहिनाते हुए घोड़ों, चिग्घाड़ते हुए हाथियों, जय-जयकार करते हुए आगे-आगे चलनेवाले वन्दियों, स्तुतिपाठ करनेवाले सूतों, वंशकी विरुदावलि बखाननेवाले मागधों तथा सर्वश्रेष्ठ गुणगायकोंके तुमुल घोषके बीच उन वन्दी आदिसे पूजित एवं प्रशंसित होते हुए श्रीरामचन्द्रजी कुबेरके समान चल रहे थे ॥ ४६ ॥

> करेणुमातङ्गरथाश्वसंकुलं  
> महाजनौघैः परिपूर्णचत्वरम् ।  
> प्रभूतरत्नं बहुपण्यसंचयं  
> ददर्श रामो विमलं महापथम् ॥ ४७ ॥

यात्रा करते हुए श्रीरामने उस विशाल राजमार्गको देखा, जो हथिनियों, मतवाले हाथियों, रथों और घोड़ोंसे खचाखच भरा हुआ था । उसके प्रत्येक चौराहेपर मनुष्योंकी भारी भीड़ इकट्ठी हो रही थी । उसके दोनों पार्श्वभागोंमें प्रचुर रत्नोंसे भरी हुई दूकानें थीं तथा विक्रयके योग्य और भी बहुत-से द्रव्योंके ढेर वहाँ दिखायी देते थे । वह राजमार्ग बहुत साफ-सुथरा था ॥ ४७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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