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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 15"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 15

> ते तु तां रजनीमुष्य ब्राह्मणा वेदपारगाः ।  
> उपतस्थुरुपस्थानं सह राजपुरोहिताः ॥ १ ॥

वे वेदोंके पारङ्गत ब्राह्मण तथा राजपुरोहित वह रात बिताकर प्रातःकाल ( राजाकी प्रेरणाके अनुसार ) राजद्वारपर उपस्थित हुए थे ॥ १ ॥

> अमात्या बलमुख्याश्च मुख्या ये निगमस्य च ।  
> राघवस्याभिषेकार्थे प्रीयमाणाः सुसंगताः ॥ २ ॥

मन्त्री, सेनाके मुख्य-मुख्य अधिकारी और बड़े-बड़े सेठ-साहूकार श्रीरामचन्द्रजीके अभिषेकके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ एकत्र हुए थे ॥ २ ॥

> उदिते विमले सूर्ये पुष्ये चाभ्यागतेऽहनि ।  
> लग्ने कर्कटके प्राप्ते जन्म रामस्य च स्थिते ॥ ३ ॥  
> अभिषेकाय रामस्य द्विजेन्द्रैरुपकल्पितम् ।  
> काञ्चना जलकुम्भाश्च भद्रपीठं स्वलंकृतम् ॥ ४ ॥  
> रथश्च सम्यगास्तीर्णो भाखता व्याघ्रचर्मणा ।  
> गङ्गायमुनयोः पुण्यात् संगमादाहृतं जलम् ॥ ५ ॥

निर्मल सूर्योदय होनेपर दिनमें जब पुष्य नक्षत्रका योग आया तथा श्रीरामके जन्मका कर्क लग्न उपस्थित हुआ, उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने श्रीरामके अभिषेकके लिये सारी सामग्री एकत्र करके उसे जँचाकर रख दिया । जलसे भरे हुए सोनेके कलश, भलीभाँति सजाया हुआ भद्रपीठ, चमकीले व्याघ्रचर्मसे अच्छी तरह आवृत रथ, गङ्गा-यमुनाके पवित्र सङ्गमसे लाया हुआ जल—ये सब वस्तुएँ एकत्र कर ली गयी थीं ॥ ३–५ ॥

> याश्चान्याः सरितः पुण्या ह्रदाः कूपाः सरांसि च ।  
> प्राग्वहाश्चोर्ध्ववाहाश्च तिर्यग्वाहाश्च क्षीरिणः ॥ ६ ॥  
> ताभ्यश्चैवाहृतं तोयं समुद्रेभ्यश्च सर्वशः ।  
> क्षौद्रं दधि घृतं लाजा दर्भाः सुमनसः पयः ॥ ७ ॥  
> अष्टौ च कन्या रुचिरा मत्तश्च वरवारणः ।  
> सजलाः क्षीरिभिश्छन्ना घटाः काञ्चनराजताः ॥ ८ ॥  
> पद्मोत्पलयुता भान्ति पूर्णाः परमवारिणा ।

इनके सिवा जो अन्य नदियाँ, पवित्र जलाशय, कूप और सरोवर हैं तथा जो पूर्वकी ओर बहनेवाली ( गोदावरी और कावेरी आदि ) नदियाँ हैं, ऊपरकी ओर प्रवाहवाले जो ( ब्रह्मावर्त आदि ) सरोवर हैं तथा दक्षिण और उत्तरकी ओर बहनेवाली जो ( गण्डकी एवं शोणभद्र आदि ) नदियाँ हैं, जिनमें दूधके समान निर्मल जल भरा रहता है, उन सबसे और समस्त समुद्रोंसे भी लाया हुआ जल वहाँ संग्रह करके रखा गया था । इनके अतिरिक्त दूध, दही, घी, मधु, लावा, कुश, फूल, आठ सुन्दर कन्याएँ, मदमत्त गजराज और दूधवाले वृक्षोंके पल्लवोंसे ढके हुए सोने-चाँदीके जलपूर्ण कलश भी वहाँ विराजमान थे, जो उत्तम जलसे भरे होनेके साथ ही पद्म और उत्पलोंसे संयुक्त होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ६-८½ ॥

> चन्द्रांशुविकचप्रख्यं पाण्डुरं रत्नभूषितम् ॥ ९ ॥  
> सज्जं तिष्ठति रामस्य वालव्यजनमुत्तमम् ।

श्रीरामके लिये चन्द्रमाकी किरणोंके समान विकसित कान्तिसे युक्त श्वेत, पीतवर्णका रत्नजटित उत्तम चँवर सुसज्जितरूपसे रखा हुआ था ॥ ९½ ॥

> चन्द्रमण्डलसंकाशमातपत्रं च पाण्डुरम् ॥ १० ॥  
> सज्जं द्युतिकरं श्रीमदभिषेकपुरस्सरम् ।

चन्द्रमण्डलके समान सुसज्जित श्वेत छत्र भी अभिषेक-सामग्रीके साथ शोभा पा रहा था, जो परम सुन्दर और प्रकाश फैलानेवाला था ॥ १०½ ॥

> पाण्डुरश्च वृषः सज्जः पाण्डुराश्वश्च संस्थितः ॥ ११ ॥

सुसज्जित श्वेत वृषभ और श्वेत अश्व भी खड़े थे ॥११॥

> वादित्राणि च सर्वाणि वन्दिनश्च तथापरे ।  
> इक्ष्वाकूणां यथा राज्ये सम्भ्रियेताभिषेचनम् ॥ १२ ॥  
> तथाजातीयमादाय राजपुत्राभिषेचनम् ।  
> ते राजवचनात् तत्र समवेता महीपतिम् ॥ १३ ॥

सब प्रकारके बाजे मौजूद थे । स्तुति-पाठ करनेवाले वन्दी तथा अन्य मागध आदि भी उपस्थित थे । इक्ष्वाकुवंशी राजाओंके राज्यमें जैसी अभिषेक-सामग्रीका संग्रह होना चाहिये, राजकुमारके अभिषेककी वैसी ही सामग्री साथ लेकर वे सब लोग महाराज दशरथकी आज्ञाके अनुसार वहाँ उनके दर्शनके लिये एकत्र हुए थे ॥ १२-१३ ॥

> अपश्यन्तोऽब्रवन् को नु राज्ञो नः प्रतिवेदयेत् ।  
> न पश्यामश्च राजानमुदितश्च दिवाकरः ॥ १४ ॥  
> यौवराज्याभिषेकश्च सज्जो रामस्य धीमतः ।

राजाको द्वारपर न देखकर वे कहने लगे—‘कौन महाराजके पास जाकर हमारे आगमनकी सूचना देगा । हम महाराजको यहाँ नहीं देखते हैं । सूर्योदय हो गया है और बुद्धिमान् श्रीरामके यौवराज्याभिषेककी सारी सामग्री जुट गयी है’ ॥ १४½ ॥

> इति तेषु व्रुवाणेषु सर्वांस्तांश्च महीपतीन् ॥ १५ ॥  
> अब्रवीत् तानिदं वाक्यं सुमन्त्रो राजसत्कृतः ।

वे सब लोग जब इस प्रकारकी बातें कर रहे थे, उसी समय राजाद्वारा सम्मानित सुमन्त्रने वहाँ खड़े हुए उन समस्त भूपतियोंसे यह बात कही—॥ १५½ ॥

> रामं राज्ञो नियोगेन त्वरया प्रस्थितो ह्यहम् ॥ १६ ॥  
> पूज्या राज्ञो भवन्तश्च रामस्य तु विशेषतः ।  
> अयं पृच्छामि वचनात् सुखमायुष्मतामहम् ॥ १७ ॥

‘मैं महाराजकी आज्ञासे श्रीरामको बुलानेके लिये तुरंत जा रहा हूँ । आप सब लोग महाराजके तथा विशेषतः श्रीरामचन्द्रजीके पूजनीय हैं । मैं उन्हींकी ओरसे आप समस्त चिरंजीवी पुरुषोंके कुशल-समाचार पूछ रहा हूँ । आपलोग सुखसे हैं न ?’ ॥ १६–१७ ॥

> राज्ञः सम्प्रतिबुद्धस्य चानागमनकारणम् ।  
> इत्युक्त्वान्तःपुरद्वारमाजगाम पुराणवित् ॥ १८ ॥

ऐसा कहकर और जगे हुए होनेपर श्रीमहाराजके बाहर न आनेका कारण बताकर पुरातन वृत्तान्तोंको जाननेवाले सुमन्त्र पुनः अन्तःपुरके द्वारपर लौट आये ॥ १८ ॥

> सदा सक्तं च तद् वेश्म सुमन्त्रः प्रविवेश ह ।  
> तुष्टावास्य तदा वंशं प्रविश्य स विशाम्पतेः ॥ १९ ॥

वह राजभवन सुमन्त्रके लिये सदा खुला रहता था । उन्होंने भीतर प्रवेश किया और प्रवेश करके महाराजके वंशकी स्तुति की ॥ १९ ॥

> शयनीयं नरेन्द्रस्य तदासाद्य व्यतिष्ठत ।  
> सोऽत्यासाद्य तु तद् वेश्म तिरस्करणिमन्तरा ॥ २० ॥  
> आशीर्भिर्गुणयुक्ताभिरभितुष्टाव राघवम् ।

तदनन्तर वे राजाके शयनगृहके पास जाकर खड़े हो गये । उस घरके अत्यन्त निकट पहुँचकर जहाँ बीचमें केवल चिकका अन्तर रह गया था, खड़े हो वे गुणवर्णनपूर्वक आशीर्वादसूचक वचनोंद्वारा रघुकुलनरेशकी स्तुति करने लगे—॥ २०½ ॥

> सोमसूर्यौ च काकुत्स्थ शिववैश्रवणावपि ॥ २१ ॥  
> वरुणश्चाग्निरिन्द्रश्च विजयं प्रदिशन्तु ते ।

‘ककुत्स्थनन्दन ! चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कुबेर, वरुण, अग्नि और इन्द्र आपको विजय प्रदान करें ॥ २१½ ॥

> गता भगवती रात्रिरहः शिवमुपस्थितम् ॥ २२ ॥  
> बुद्ध्यस्व राजशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम् ।

‘भगवती रात्रि विदा हो गयी । अब कल्याणस्वरूप दिन उपस्थित हुआ है । राजसिंह ! निद्रा त्यागकर जग जाइये और अब जो कार्य प्राप्त है, उसे कीजिये ॥ २२½ ॥

> ब्राह्मणा बलमुख्याश्च नैगमाश्चागतास्त्विह ॥ २३ ॥  
> दर्शनं तेऽभिकाङ्क्षन्ते प्रतिबुद्ध्यस्व राघव ।

‘ब्राह्मण, सेनाके मुख्य अधिकारी और बड़े-बड़े सेठ-साहूकार यहाँ आ गये हैं । वे सब लोग आपका दर्शन चाहते हैं । रघुनन्दन ! जागिये’ ॥ २३½ ॥

> स्तुवन्तं तं तदा सूतं सुमन्त्रं मन्त्रकोविदम् ॥ २४ ॥  
> प्रतिबुद्ध्य ततो राजा इदं वचनमब्रवीत् ।

मन्त्रणा करनेमें कुशल सूत सुमन्त्र जब इस प्रकार स्तुति करने लगे, तब राजाने जागकर उनसे यह बात कही—॥ २४½ ॥

> राममानय सूतेति यदस्यभिहितो मया ॥ २५ ॥  
> किमिदं कारणं येन ममाज्ञा प्रतिवाह्यते ।  
> न चैव सम्प्रसुप्तोऽहमानयेहाशु राघवम् ॥ २६ ॥

‘सूत ! श्रीरामको बुला लाओ’—यह जो मैंने तुमसे कहा था, उसका पालन क्यों नहीं हुआ ? ऐसा कौन-सा कारण है, जिससे मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया जा रहा है ? मैं सोया नहीं हूँ । तुम श्रीरामको शीघ्र यहाँ बुला लाओ’ ॥ २५–२६ ॥

> इति राजा दशरथः सूतं तत्रान्वशात् पुनः ।  
> स राजवचनं श्रुत्वा शिरसा प्रतिपूज्य तम् ॥ २७ ॥  
> निर्जगाम नृपावासान्मन्यमानः प्रियं महत् ।  
> प्रपन्नो राजमार्गं च पताकाध्वजशोभितम् ॥ २८ ॥

इस प्रकार राजा दशरथने जब सूतको फिर उपदेश दिया, तब वे राजाकी वह आज्ञा सुनकर सिर झुकाकर उसका सम्मान करते हुए राजभवनसे बाहर निकल गये । वे मन-ही-मन अपना महान् प्रिय हुआ मानने लगे । राजभवनसे निकलकर सुमन्त्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित राजमार्गपर आ गये ॥ २७–२८ ॥

> हृष्टः प्रमुदितः सूतो जगामाशु विलोकयन् ।  
> स सूतस्तत्र शुश्राव रामाधिकरणाः कथाः ॥ २९ ॥  
> अभिषेचनसंयुक्ताः सर्वलोकस्य हृष्टवत् ।

वे हर्ष और उल्लासमें भरकर सब ओर दृष्टि डालते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ने लगे । सूत सुमन्त्र वहाँ मार्गमें सब लोगोंके मुँहसे श्रीरामके राज्याभिषेककी आनन्ददायिनी बातें सुनते जा रहे थे ॥ २९½ ॥

> ततो ददर्श रुचिरं कैलाससदृशप्रभम् ॥ ३० ॥  
> रामवेश्म सुमन्त्रस्तु शक्रवेश्मसमप्रभम् ।  
> महाकपाटपिहितं वितर्दिशतशोभितम् ॥ ३१ ॥

तदनन्तर सुमन्त्रको श्रीरामका सुन्दर भवन दिखायी दिया, जो कैलासपर्वतके समान श्वेत प्रभासे प्रकाशित हो रहा था । वह इन्द्रभवनके समान दीप्तिमान् था । उसका फाटक विशाल किवाड़ोंसे बंद था ( उसके भीतरका छोटा-सा द्वार ही खुला हुआ था ) । सैकड़ों वेदिकाएँ उस भवनकी शोभा बढ़ा रही थीं ॥ ३०–३१ ॥

> काञ्चनप्रतिमैकाग्रं मणिविद्रुमतोरणम् ।  
> शारदाभ्रघनप्रख्यं दीप्तं मेरुगुहासमम् ॥ ३२ ॥

उसका मुख्य अग्रभाग सोनेकी देव-प्रतिमाओंसे अलंकृत था । उसके बाहर फाटकमें मणि और मूँगे जड़े हुए थे । वह सारा भवन शरद् ऋतुके बादलोंकी भाँति श्वेत कान्तिसे युक्त, दीप्तिमान् और मेरुपर्वतकी कन्दराके समान शोभायमान था ॥ ३२ ॥

> मणिभिर्वरमाल्यानां सुमहद्भिरलंकृतम् ।  
> मुक्तामणिभिराकीर्णं चन्दनागुरुभूषितम् ॥ ३३ ॥

सुवर्णनिर्मित पुष्पोंकी मालाओंके बीच-बीचमें पिरोयी हुई बहुमूल्य मणियोंसे वह भवन सजा हुआ था । दीवारोंमें जड़ी हुई मुक्तामणियोंसे व्याप्त होकर जगमगा रहा था ( अथवा वहाँ मोती और मणियोंके भण्डार भरे हुए थे ) । चन्दन और अगरकी सुगन्ध उसकी शोभा बढ़ा रही थी ॥ ३३ ॥

> गन्धान् मनोज्ञान् विसृजद् दार्दुरं शिखरं यथा ।  
> सारसैश्च मयूरैश्च विनदद्भिर्विराजितम् ॥ ३४ ॥

वह भवन मलयाचलके समीपवर्ती दर्दुर नामक चन्दन-गिरिके शिखरकी भाँति सब ओर मनोहर सुगन्ध बिखेर रहा था । कलरव करते हुए सारस और मयूर आदि पक्षी उसकी शोभावृद्धि कर रहे थे ॥ ३४ ॥

> सुकृतेहामृगाकीर्णमुत्कीर्णं भक्तिभिस्तथा ।  
> मनश्चक्षुश्च भूतानामाददत् तिग्मतेजसा ॥ ३५ ॥

सोने आदिकी सुन्दर ढंगसे बनी हुई भेड़ियोंकी मूर्तियोंसे वह व्याप्त था । शिल्पियोंने उसकी दीवारोंमें बड़ी सुन्दर नक्काशी की थी । वह अपनी उत्कृष्ट शोभासे समस्त प्राणियोंके मन और नेत्रोंको आकृष्ट कर लेता था ॥ ३५ ॥

> चन्द्रभास्करसंकाशं कुबेरभवनोपमम् ।  
> महेन्द्रधामप्रतिमं नानापक्षिसमाकुलम् ॥ ३६ ॥

चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी, कुबेर-भवनके समान अक्षय सम्पत्तिसे पूर्ण तथा इन्द्रधामके समान भव्य एवं मनोरम उस श्रीरामभवनमें नाना प्रकारके पक्षी चहक रहे थे ॥ ३६ ॥

> मेरुशृङ्गसमं सूतो रामवेश्म ददर्श ह ।  
> उपस्थितैः समाकीर्णं जनैरञ्जलिकारिभिः ॥ ३७ ॥

सुमन्त्रने देखा—श्रीरामका मइल मेरु-पर्वतके शिखरकी भाँति शोभा पा रहा है । हाथ जोड़कर श्रीरामकी वन्दना करनेके लिये उपस्थित हुए असंख्य मनुष्योंसे वह भरा हुआ है ॥ ३७ ॥

> उपादाय समाक्रान्तैस्तदा जानपदैर्जनैः ।  
> रामाभिषेकसुमुखैरुन्मुखैः समलंकृतम् ॥ ३८ ॥

भाँति-भाँतिके उपहार लेकर जनपद-निवासी मनुष्य उस समय वहाँ पहुँचे हुए थे । श्रीरामके अभिषेकका समाचार सुनकर उनके मुख प्रसन्नतासे खिल उठे थे । वे उस उत्सवको देखनेके लिये उत्कण्ठित थे । उन सबकी उपस्थितिसे भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ३८ ॥

> महामेघसमप्रख्यमुदग्रं सुविराजितम् ।  
> नानारत्नसमाकीर्णं कुब्जकैरपि चावृतम् ॥ ३९ ॥

वह विशाल राजभवन महान् मेघखण्डके समान ऊँचा और सुन्दर शोभासे सम्पन्न था । उसकी दीवारोंमें नाना प्रकारके रत्न जड़े गये थे और कुबड़े सेवकोंसे वह भरा हुआ था ॥ ३९ ॥

> स वाजियुक्तेन रथेन सारथिः  
> समाकुलं राजकुलं विराजयन् ।  
> वरूथिना राजगृहाभिपातिना  
> पुरस्य सर्वस्य मनांसि हर्षयन् ॥ ४० ॥

सारथि सुमन्त्र राजभवनकी ओर जानेवाले वरूथ ( लोहेकी चद्दर या सींकचोंके बने हुए आवरण ) से युक्त तथा अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा मनुष्योंकी भीड़से भरे राजमार्गकी शोभा बढ़ाते तथा समस्त नगर-निवासियोंके मनको आनन्द प्रदान करते हुए श्रीरामके भवनके पास जा पहुँचे ॥ ४० ॥

> ततः समासाद्य महाधनं महत्  
> प्रहृष्टरोमा स बभूव सारथिः ।  
> मृगैर्मयूरैश्च समाकुलोल्बणं  
> गृहं वराहस्य शचीपतेरिव ॥ ४१ ॥

उत्तम वस्तुको प्राप्त करनेके अधिकारी श्रीरामका वह महान् समृद्धिशाली विशाल भवन शचीपति इन्द्रके भवनकी भाँति सुशोभित होता था । इधर-उधर फैले हुए मृगों और मयूरोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी । वहाँ पहुँचकर सारथि सुमन्त्रके शरीरमें अधिक हर्षके कारण रोमाञ्च हो आया ॥ ४१ ॥

> स तत्र कैलासनिभाः स्वलंकृताः  
> प्रविश्य कक्ष्यास्त्रिदशालयोपमाः ।  
> प्रियान् वरान् राममते स्थितान् बहून्  
> व्यपोह्य शुद्धान्तमुपस्थितौ रथी ॥ ४२ ॥

वहाँ कैलास और स्वर्गके समान दिव्य शोभासे युक्त, सुन्दर सजी हुई अनेक ड्योढ़ियोंको लाँघकर श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञामें चलनेवाले बहुतेरे श्रेष्ठ मनुष्योंको बीचमें छोड़ते हुए रथसहित सुमन्त्र अन्तःपुरके द्वारपर उपस्थित हुए ॥ ४२ ॥

> स तत्र शुश्राव च हर्षयुक्ता  
> रामाभिषेकार्थकृतां जनानाम् ।  
> नरेन्द्रसूनोरभिमङ्गलार्थाः  
> सर्वस्य लोकस्य गिरः प्रहृष्टाः ॥ ४३ ॥

उस स्थानपर उन्होंने श्रीरामके अभिषेक-सम्बन्धी कर्म करनेवाले लोगोंकी हर्षभरी बातें सुनीं, जो राजकुमार श्रीरामके लिये सब ओरसे मङ्गलकामना सूचित करती थीं । इसी प्रकार उन्होंने अन्य सब लोगोंकी भी हर्षोल्लाससे परिपूर्ण वार्ताओंको श्रवण किया ॥ ४३ ॥

> महेन्द्रसद्मप्रतिमं च वेश्म  
> रामस्य रम्यं मृगपक्षिजुष्टम् ।  
> ददर्श मेरोरिव शृङ्गमुच्चं  
> विभ्राजमानं प्रभया सुमन्त्रः ॥ ४४ ॥

श्रीरामका वह भवन इन्द्रसदनकी शोभाको तिरस्कृत कर रहा था । मृगों और पक्षियोंसे सेवित होनेके कारण उसकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी । सुमन्त्रने उस भवनको देखा । वह अपनी प्रभासे प्रकाशित होनेवाले मेरुगिरिके ऊँचे शिखरकी भाँति सुशोभित हो रहा था ॥ ४४ ॥

> उपस्थितैरञ्जलिकारिभिश्च  
> सोपायनैर्जानपदैर्जनैश्च ।  
> कोट्या पराधैश्च विमुक्तयानैः  
> समाकुलं द्वारपदं ददर्श ॥ ४५ ॥

उस भवनके द्वारपर पहुँचकर सुमन्त्रने देखा—श्रीरामकी वन्दनाके लिये हाथ जोड़े उपस्थित हुए जनपद-वासी मनुष्य अपनी सवारियोंसे उतरकर हाथोंमें भाँति-भाँतिके उपहार लिये करोड़ों और परार्धोंकी संख्यामें खड़े थे, जिससे वहाँ बड़ी भारी भीड़ लग गयी थी ॥ ४५ ॥

> ततो महामेघमहीधराभं  
> प्रभिन्नमत्यङ्कुशमत्यसह्यम् ।  
> रामोपवाह्यं रुचिरं ददर्श  
> शत्रुंजयं नागमुदग्रकायम् ॥ ४६ ॥

तदनन्तर उन्होंने श्रीरामकी सवारीमें आनेवाले सुन्दर शत्रुञ्जय नामक विशालकाय गजराजको देखा, जो महान् मेघसे युक्त पर्वतके समान प्रतीत होता था । उसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही थी । वह अंकुशसे काबूमें आनेवाला नहीं था । उसका वेग शत्रुओंके लिये अत्यन्त असह्य था । उसका जैसा नाम था, वैसा ही गुण भी था ॥४६ ॥

> स्वलंकृतान् साश्वरथान् सकुञ्जरा-  
> नमात्यमुख्यांश्च ददर्श वल्लभान् ।  
> व्यपोह्य सूतः सहितान् समन्ततः  
> समृद्धमन्तःपुरमाविवेश ह्व ॥

उन्होंने वहाँ राजाके परम प्रिय मुख्य-मुख्य मन्त्रियोंको भी एक साथ उपस्थित देखा, जो सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित थे और घोड़े, रथ तथा हाथियोंके साथ वहाँ आये थे । सुमन्त्रने उन सबको एक ओर हटाकर स्वयं श्रीरामके समृद्धिशाली अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥ ४७ ॥

> ततोऽद्रिकूटाचलमेघसंनिभं  
> महाविमानोपमवेश्मसंयुतम् ।  
> अवार्यमाणः प्रविवेश सारथिः  
> प्रभूतरत्नं मकरो यथार्णवम् ॥ ४८ ॥

जैसे मगर प्रचुर रत्नोंसे भरे हुए समुद्रमें बेरोक-टोक प्रवेश करता है, उसी प्रकार सारथि सुमन्त्रने पर्वत-शिखरपर आरूढ़ हुए अविचल मेघके समान शोभायमान महान् विमानके सदृश सुन्दर गृहोंसे संयुक्त तथा प्रचुर रत्न-भण्डारसे भरपूर उस महलमें बिना किसी रोक-टोकके प्रवेश किया ॥ ४८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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