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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 14"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 14

> पुत्रशोकार्दितं पापा विसंज्ञं पतितं भुवि।  
> विचेष्टमानमुत्प्रेक्ष्य पेक्ष्वाकमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

‘इक्ष्वाकुनन्दन राजा दशरथ पुत्रशोकसे पीड़ित हो पृथ्वीपर अचेत पड़े थे और वेदनासे छटपटा रहे थे, उन्हें इस अवस्थामें देखकर पापिनी कैकेयी इस प्रकार बोली—॥ १ ॥

> पापं कृत्वेव किमिदं मम संश्रुत्य संश्रवम्।  
> शेषे क्षितितले सन्नः स्थित्यां स्थातुं त्वमर्हसि ॥ २ ॥

‘महाराज ! आपने मुझे दो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी और जब मैंने उन्हें माँगा, तब आप इस प्रकार सन्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो कोई पाप करके पछता रहे हों; यह क्या बात है ! आपको सत्पुरुषोंकी मर्यादामें स्थिर रहना चाहिये ॥ २ ॥

> आहुः सत्यं हि परमं धर्मं धर्मविदो जनाः।  
> सत्यमाश्रित्य च मया त्वं धर्मं प्रतिचोदितः ॥ ३ ॥

‘धर्मज्ञ पुरुष सत्यको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म बतलाते हैं, उस सत्यका सहारा लेकर मैंने आपको धर्मका पालन करनेके लिये ही प्रेरित किया है ॥ ३ ॥

> संश्रुत्य शैब्यः श्येनाय स्वां तनुं जगतीपतिः।  
> प्रदाय पक्षिणे राजा जगाम गतिमुत्तमाम् ॥ ४ ॥

‘पृथ्वीपति राजा शैब्यने बाज पक्षीको अपना शरीर देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे दे ही दिया और देकर उत्तम गति प्राप्त कर ली ॥ ४ ॥

> तथा ह्यलर्कस्तेजस्वी ब्राह्मणे वेदपारगे।  
> याचमाने स्वके नेत्रे उद्धृत्याविमना ददौ ॥ ५ ॥

‘इसी प्रकार तेजस्वी राजा अलर्कने वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणको उसके याचना करनेपर मनमें खेद न लाते हुए अपनी दोनों आँखें निकालकर दे दी थीं ॥ ५ ॥

> सरितां तु पतिः स्वल्पां मर्यादां सत्यमन्वितः।  
> सत्यानुरोधात् समये वेलां स्वां नातिवर्तते ॥ ६ ॥

‘सत्यको प्राप्त हुआ समुद्र सत्यका ही अनुसरण करनेके कारण पर्व आदिके समय भी अपनी छोटी-सी सीमातट–भूमिका भी उल्लङ्घन नहीं करता ॥ ६ ॥

> सत्यमेकपदं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः।  
> सत्यमेवाक्षया वेदाः सत्येनावाप्यते परम् ॥ ७ ॥

‘सत्य ही प्रणवरूप शब्दब्रह्म है, सत्यमें ही धर्म प्रतिष्ठित है, सत्य ही अविनाशी वेद है और सत्यसे ही परब्रह्मकी प्राप्ति होती है ॥ ७ ॥

> सत्यं समनुवर्तस्व यदि धर्मे धृता मतिः।  
> स वरः सफलो मेऽस्तु वरदो ह्यसि सत्तम ॥ ८ ॥

‘इसलिये यदि आपकी बुद्धि धर्ममें स्थित है तो सत्यका अनुसरण कीजिये। साधुशिरोमणे ! मेरा माँगा हुआ वह वर सफल होना चाहिये; क्योंकि आप स्वयं ही उस वरके दाता हैं ॥ ८ ॥

> धर्मस्यैवाभिकामार्थं मम चैवाभिचोदनात्।  
> प्रव्राजय सुतं रामं त्रिः खलु त्वां ब्रवीम्यहम् ॥ ९ ॥

‘धर्मके ही अभीष्ट फलकी सिद्धिके लिये तथा मेरी प्रेरणासे भी आप अपने पुत्र श्रीरामको घरसे निकाल दीजिये। मैं अपने इस कथनको तीन बार दुहराती हूँ ॥ ९ ॥

> समयं च ममार्येमं यदि त्वं न करिष्यसि।  
> अग्रतस्ते परित्यक्ता परित्यक्ष्यामि जीवितम् ॥ १० ॥

‘आर्य ! यदि मुझसे की हुई इस प्रतिज्ञाका आप पालन नहीं करेंगे तो मैं आपसे परित्यक्त ( उपेक्षित ) होकर आपके सामने ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगी’ ॥ १० ॥

> एवं प्रचोदितो राजा कैकेय्या निर्विशङ्कया।  
> नाशकत् पाशमुन्मोक्तुं बलिरिन्द्रकृतं यथा ॥ ११ ॥

इस प्रकार कैकेयीने जब निःशङ्क होकर राजाको प्रेरित किया, तब वे उस सत्यरूपी बन्धनको वैसे ही नहीं खोल सके—उस बन्धनसे अपनेको उसी तरह नहीं मुक्त कर सके, जैसे राजा बलि इन्द्रप्रेरित वामनके पाशसे अपनेको मुक्त करनेमें असमर्थ हो गये थे ॥ ११ ॥

> उद्भ्रान्तहृदयश्चापि विवर्णवदनोऽभवत्।  
> स धुर्यो वै परिस्पन्दन् युगचक्रान्तरं यथा ॥ १२ ॥  
> विकलाभ्यां च नेत्राभ्यामपश्यन्निव भूमिपः।  
> कृच्छ्राद् धैर्येण संस्तभ्य कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥ १३ ॥

दो पहियोंके बीचमें फँसकर वहाँसे निकलनेकी चेष्टा करनेवाले गाड़ीके बैलकी भाँति उनका हृदय उद्भ्रान्त हो उठा था और उनके मुखकी कान्ति भी फीकी पड़ गयी थी ॥ अपने विकल नेत्रोंसे कुछ भी देखनेमें असमर्थ-से होकर भूपाल दशरथने बड़ी कठिनाईसे धैर्य धारण करके अपने हृदयको सँभाला और कैकेयीसे इस प्रकार कहा—॥ १३ ॥

> यस्ते मन्त्रकृतः पाणिरग्नौ पापे मया धृतः ।  
> संत्यजामि खजं चैव तव पुत्रं सह त्वया ॥ १४ ॥

‘पापिनि ! मैंने अग्निके समीप ‘साङ्गुष्ठं ते गृभ्णामि सौभगत्वाय हस्तम्०’ इत्यादि वैदिक मन्त्रका पाठ करके तेरे जिस हाथको पकड़ा था, उसे आज छोड़ रहा हूँ । साथ ही तेरे और अपनेद्वारा उत्पन्न हुए तेरे पुत्रका भी त्याग करता हूँ ॥ १४ ॥

> प्रयाता रजनी देवि सूर्यस्योदयनं प्रति ।  
> अभिषेकाय हि जनस्त्वरयिष्यति मां ध्रुवम् ॥ १५ ॥

‘देवि ! रात बीत गयी । सूर्योदय होते ही सब लोग निश्चय ही श्रीरामका राज्याभिषेक करनेके लिये मुझे शीघ्रता करनेको कहेंगे ॥ १५ ॥

> रामाभिषेकसम्भारैस्तदर्थमुपकल्पितैः ।  
> रामः कारयितव्यो मे मृतस्य सलिलक्रियाम् ॥ १६ ॥  
> सपुत्रया त्वया नैव कर्तव्या सलिलक्रिया ।

‘उस समय जो सामान श्रीरामके अभिषेकके लिये जुटाया गया है, उसके द्वारा मेरे मरनेके बाद श्रीरामके हाथसे मुझे जलाञ्जलि दिलवा देना; परंतु अपने पुत्रसहित तू मेरे लिये जलाञ्जलि न देना ॥ १६½ ॥

> व्याहन्तास्यशुभाचारे यदि रामाभिषेचनम् ॥ १७ ॥  
> न शक्तोऽद्यास्म्यहं द्रष्टुं दृष्ट्वा पूर्वं तथामुखम् ।  
> हतहर्षं तथानन्दं पुनर्जनमवाङ्मुखम् ॥ १८ ॥  
> तां तथा ब्रुवतस्तस्य भूमिपस्य महात्मनः ।  
> प्रभाता शर्वरी पुण्या चन्द्रनक्षत्रमालिनी ॥ १९ ॥

‘पापाचारिणि ! यदि तू श्रीरामके अभिषेकमें विघ्न डालेगी ( तो तुझे मेरे लिये जलाञ्जलि देनेका कोई अधिकार न होगा )। मैं पहले श्रीरामके राज्याभिषेकके समाचारसे जो जन-समुदायका हर्षोल्लाससे परिपूर्ण उन्नत मुख देख चुका हूँ, वैसा देखनेके पश्चात् आज पुनः उसी जनताके हर्ष और आनन्दसे शून्य, नीचे लटके हुए मुखको मैं नहीं देख सकूँगा’॥ महात्मा राजा दशरथके कैकेयीसे इस तरहकी बातें करते-करते ही चन्द्रमा और नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत वह पुण्यमयी रजनी बीत गयी और प्रभातकाल आ गया ॥ १९ ॥

> ततः पापसमाचारा कैकेयी पार्थिवं पुनः ।  
> उवाच परुषं वाक्यं वाक्यज्ञा रोषमूर्च्छिता ॥ २० ॥

तदनन्तर बातचीतके मर्मको समझनेवाली पापाचारिणी कैकेयी रोषसे मूर्च्छित-सी होकर राजासे पुनः कठोर वाणीमें बोली—॥ २० ॥

> किमिदं भाषसे राजन् वाक्यं गरुजोपमम् ।  
> आनाययितुमक्लिष्टं पुत्रं राममिहार्हसि ॥ २१ ॥  
> स्थाप्य राज्ये मम सुतं कृत्वा रामं वनेचरम् ।  
> निःसपत्नां च मां कृत्वा कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ २२ ॥

‘राजन् ! आप विष और शूल आदि रोगोंके समान कष्ट देनेवाले ऐसे वचन क्यों बोल रहे हैं ( इन बातोंसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है )। आप बिना किसी क्लेशके अपने पुत्र श्रीरामको यहाँ बुलवाइये। मेरे पुत्रको राज्यपर प्रतिष्ठित कीजिये और श्रीरामको वनमें भेजकर मुझे निष्कण्टक बनाइये; तभी आप कृतकृत्य हो सकेंगे’ ॥ २१-२२ ॥

> स तुन्न इव तीक्ष्णेन प्रतोदेन हयोत्तमः ।  
> राजा प्रचोदितोऽभीक्ष्णं कैकेय्या वाक्यमब्रवीत् ॥ २३ ॥

तीखे कोड़ेकी मारसे पीड़ित हुए उत्तम अश्वकी भाँति कैकेयीद्वारा बारंबार प्रेरित होनेपर व्यथित हुए राजा दशरथने इस प्रकार कहा—॥ २३ ॥

> धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि नष्टा च मम चेतना ।  
> ज्येष्ठं पुत्रं प्रियं रामं द्रष्टुमिच्छामि धार्मिकम् ॥ २४ ॥

‘मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हुआ हूँ । मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है । इसलिये इस समय मैं अपने धर्मपरायण परम प्रिय ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको देखना चाहता हूँ’ ॥ २४ ॥

> ततः प्रभातां रजनीमुदिते च दिवाकरे ।  
> पुण्ये नक्षत्रयोगे च मुहूर्ते च समागते ॥ २५ ॥  
> वसिष्ठो गुणसम्पन्नः शिष्यैः परिवृतस्तथा ।  
> उपगृह्याशु सम्भारान् प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ २६ ॥

उधर जब रात बीती, प्रभात हुआ, सूर्यदेवका उदय हो गया और पुण्यनक्षत्रके योगमें अभिषेकका शुभ मुहूर्त आ पहुँचा, उस समय शिष्योंसे घिरे हुए शुभगुणसम्पन्न महर्षि वसिष्ठ अभिषेककी आवश्यक सामग्रियोंका संग्रह करके शीघ्रतापूर्वक उस श्रेष्ठ पुरीमें आये ॥ २५-२६ ॥

> सिक्तसम्मार्जितपथां पताकोत्तमभूषिताम् ।  
> संहृष्टमनुजोपेतां समृद्धविपणापणाम् ॥ २७ ॥

उस पुण्यवेलामें अयोध्याकी सड़कें झाड़-बुहारकर साफ की गयी थीं और उनपर जलका छिड़काव हुआ था । सारी पुरी उत्तम पताकाओंसे सुशोभित थी । वहाँके सभी मनुष्य हर्ष और उत्साहसे भरे हुए थे । बाजार और दूकानें इस तरह सजी हुई थीं कि उनकी समृद्धि देखते ही बनती थी ॥२७॥

> महोत्सवसमायुक्तां राघवार्थे समुत्सुकाम् ।  
> चन्दनागुरुधूपैश्च सर्वतः परिधूमिताम् ॥ २८ ॥

सब ओर महान् उत्सव हो रहा था । सारी नगरी श्रीरामचन्द्रजीके अभिषेकके लिये उत्सुक थी । चारों ओर चन्दन, अगर और धूपकी सुगन्ध व्याप्त हो रही थी ॥ २८ ॥

> तां पुरीं समतिक्रम्य पुरंदरपुरोपमाम् ।  
> ददर्शान्तःपुरं श्रीमान् नानाध्वजगणायुतम् ॥ २९ ॥  
> पौरजानपदाकीर्णं ब्राह्मणैरुपशोभितम् ।  
> यष्टिमद्भिः सुसम्पूर्णं सदश्वैः परमार्चितैः ॥ ३० ॥  
> तदन्तःपुरमासाद्य व्यतिचक्राम तं जनम् ।  
> वसिष्ठः परमप्रीतः परमर्षिभिरावृतः ॥ ३१ ॥  
> स त्वपश्यद् विनिष्क्रान्तं सुमन्त्रं नाम सारथिम् ।  
> द्वारे मनुजसिंहस्य सचिवं प्रियदर्शनम् ॥ ३२ ॥

इन्द्रनगरी अमरावतीके समान शोभा पानेवाली उस पुरीको पार करके श्रीमान् वसिष्ठजीने राजा दशरथके अन्तःपुरका दर्शन किया । जहाँ सहस्रों ध्वजाएँ फहरा रही थीं ॥ नगर और जनपदके लोग वहाँ भरे हुए थे। बहुत-से ब्राह्मण उस स्थानकी शोभा बढ़ाते थे। छड़ीदार राजसेवक तथा सजे-सजाये सुन्दर घोड़े वहाँ अधिक संख्यामें उपस्थित थे॥ श्रेष्ठ महर्षियोंसे घिरे हुए वसिष्ठजी परम प्रसन्न हो उस अन्तःपुरमें पहुँचकर उस जन-समुदायको लाँघकर आगे बढ़ गये॥ वहाँ उन्होंने महाराजके सुन्दर सचिव तथा सारथि सुमन्त्रको अन्तःपुरके द्वारपर उपस्थित देखा, जो उसी समय भीतरसे निकले थे ॥ ३२ ॥

> तमुवाच महातेजाः सूतपुत्रं विशारदम् ।  
> वसिष्ठः क्षिप्रमाचक्ष्व नृपतेर्मामिहागतम् ॥ ३३ ॥

तब महातेजस्वी वसिष्ठने परम चतुर सूतपुत्र सुमन्त्रसे कहा—‘सूत ! तुम महाराजको शीघ्र ही मेरे आगमनकी सूचना दो ॥ ३३ ॥

> इमे गङ्गोदकघटाः सागरेभ्यश्च काञ्चनाः ।  
> औदुम्बरं भद्रपीठमभिषेकार्थमाहृतम् ॥ ३४ ॥

‘( उन्हें बताओ कि श्रीरामके राज्याभिषेकके लिये सारी सामग्री एकत्र कर ली गयी है ) ये गङ्गाजलसे भरे कलश रखे हैं, इन सोनेके कलशोंमें समुद्रोंसे लाया हुआ जल भरा हुआ है । यह गूलरकी लकड़ीका बना हुआ भद्रपीठ है, जो अभिषेकके लिये लाया गया है ( इसीपर बिठाकर श्रीरामका अभिषेक होगा ) ॥ ३४ ॥

> सर्वबीजानि गन्धाश्च रत्नानि विविधानि च ।  
> क्षौद्रं दधि घृतं लाजा दर्भाः सुमनसः पयः ॥ ३५ ॥  
> अष्टौ च कन्या रुचिरा मत्तश्च वरवारणः ।  
> चतुरश्वो रथः श्रीमान् निस्त्रिंशो धनुरुत्तमम् ॥ ३६ ॥  
> वाहनं नरसंयुक्तं छत्रं च शशिसंनिभम् ।  
> श्वेते च वालव्यजने भृङ्गारं च हिरण्मयम् ॥ ३७ ॥  
> हेमदामपिनद्धश्च ककुद्मान् पाण्डुरो वृषः ।  
> केसरी च चतुर्दंष्ट्रो हरिश्रेष्ठो महाबलः ॥ ३८ ॥  
> सिंहासनं व्याघ्रतनुः समिधश्च हुताशनः ।  
> सर्वे वादित्रसङ्घाश्च वेश्याश्चालंकृताः स्त्रियः ॥ ३९ ॥  
> आचार्या ब्राह्मणा गावः पुण्याश्च मृगपक्षिणः ।  
> पौरजानपदश्रेष्ठा नैगमाश्च गणैः सह ॥ ४० ॥  
> पते चान्ये च बहवः प्रीयमाणाः प्रियंवदाः ।  
> अभिषेकाय रामस्य सह तिष्ठन्ति पार्थिवैः ॥ ४१ ॥

‘सब प्रकारके बीज, गन्ध, भाँति-भाँतिके रत्न, मधु, दही, घी, लावा या खील, कुश, फूल, दूध, आठ सुन्दरी कन्याएँ, मत्त गजराज, चार घोड़ोंवाला रथ, चमचमाता हुआ खड्ग, उत्तम धनुष, मनुष्योंद्वारा ढोयी जानेवाली सवारी ( पालकी आदि ), चन्द्रमाके समान श्वेत छत्र, सफेद चँवर, सोनेकी झारी, सुवर्णकी मालासे अलंकृत ऊँचे डीलवाला श्वेत पीतवर्णका वृषभ, चार दाढ़ोंवाला सिंह, महाबलवान् उत्तम अश्व, सिंहासन, व्याघ्रचर्म, समिधाएँ, अग्नि, सब प्रकारके बाजे, वाराङ्गनाएँ, शृङ्गारयुक्त सौभाग्यवती स्त्रियाँ, आचार्य, ब्राह्मण, गौ, पवित्र पशु-पक्षी, नगर और जनपदके श्रेष्ठ पुरुष अपने सेवक-गणोंसहित प्रसिद्ध-प्रसिद्ध व्यापारी—ये तथा और भी बहुत-से प्रियवादी मनुष्य बहुसंख्यक राजाओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामके अभिषेकके लिये यहाँ उपस्थित हैं ॥ ३५–४१ ॥

> त्वरयस्व महाराजं यथा समुदितेऽहनि ।  
> पुष्ये नक्षत्रयोगे च रामो राज्यमवाप्नुयात् ॥ ४२ ॥

‘तुम महाराजसे शीघ्रता करनेके लिये कहो, जिससे अब सूर्योदयके पश्चात् पुष्य-नक्षत्रके योगमें श्रीराम राज्य प्राप्त कर लें’ ॥ ४२ ॥

> इति तस्य वचः श्रुत्वा सूतपुत्रो महाबलः ।  
> स्तुवन् नृपतिशार्दूलं प्रविवेश निवेशनम् ॥ ४३ ॥  
> तं तु पूर्वोदितं वृद्धं द्वारस्था राजसम्मताः ।  
> न शेकुरभिसंरोद्धुं राज्ञः प्रियचिकीर्षवः ॥ ४४ ॥

वसिष्ठजीके ये वचन सुनकर महाबली सूतपुत्र सुमन्त्रने राजसिंह दशरथकी स्तुति करते हुए उनके भवनमें प्रवेश किया॥ राजाका प्रिय करनेकी इच्छा रखनेवाले और उनके द्वारा सम्मानित द्वारपाल उन बूढ़े सचिवको भीतर जानेसे रोक न सके; क्योंकि उनके लिये पहलेसे ही महाराजकी आज्ञा थी कि ये किसी समय भी भीतर आनेसे रोके न जायँ ॥ ४४ ॥

> स समीपस्थितो राज्ञस्तामवस्थामजशिवान् ।  
> वाग्भिः परमतुष्टाभिरभिष्टोतुं प्रचक्रमे ॥ ४५ ॥

सुमन्त्र राजाके पास जाकर खड़े हो गये । उन्हें उनकी उस अवस्थाका पता नहीं था; इसलिये वे अत्यन्त संतोषदायक वचनोंद्वारा उनकी स्तुति करनेको उद्यत हुए ॥ ४५ ॥

> ततः सूतो यथापूर्वं पार्थिवस्य निवेशने ।  
> सुमन्त्रः प्राञ्जलिर्भूत्वा तुष्टाव जगतीपतिम् ॥ ४६ ॥

सूत सुमन्त्र राजाके उस महलमें पहलेकी ही भाँति हाथ जोड़कर उन महाराजकी स्तुति करने लगे—॥ ४६ ॥

> यथा नन्दति तेजस्वी सागरो भास्करोदये ।  
> प्रीतः प्रीतेन मनसा तथा नन्दय नस्ततः ॥ ४७ ॥  
> इन्द्रमस्यां तु वेलायामभितुष्टाव मातलिः ।  
> सोऽजयद् दानवान् सर्वांस्तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥४८॥  
> वेदाः सहाङ्गा विद्याश्च यथा ह्यात्मभुवं प्रभुम् ।  
> ब्रह्माणं बोधयन्त्यद्य तथा त्वां बोधयाम्यहम्॥ ४९ ॥

‘महाराज ! जैसे सूर्योदय होनेपर तेजस्वी समुद्र स्वयं हर्षकी तरंगोंसे उल्लसित हो उसमें स्नानकी इच्छावाले मनुष्योंको आनन्दित करता है, उसी प्रकार आप स्वयं प्रसन्न हो प्रसन्नतापूर्ण हृदयसे हम सेवकोंको आनन्द प्रदान कीजिये ॥ ‘देवसारथि मातलिने इसी वेलामें देवराज इन्द्रकी स्तुति की थी, जिससे उन्होंने समस्त दानवोंपर विजय प्राप्त कर ली, उसी प्रकार मैं भी स्तुति-वचनोंद्वारा आपको जगा रहा हूँ ॥ ‘छहों अङ्गोंसहित चारों वेद तथा समस्त विद्याएँ जैसे स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माको जगाती हैं, उसी प्रकार आज मैं आपको जगा रहा हूँ ॥ ४९ ॥

> आदित्यः सह चन्द्रेण यथा भूतधरां शुभाम् ।  
> बोधयत्यद्य पृथिवीं तथा त्वां बोधयाम्यहम् ॥ ५० ॥

‘जैसे चन्द्रमाके साथ सूर्य समस्त भूतोंकी आधारभूता इस शुभ-स्वरूपा पृथ्वीको जगाया करते हैं, उसी प्रकार आज मैं आपको जगा रहा हूँ ॥ ५० ॥

> उत्तिष्ठ सुमहाराज कृतकौतुकमङ्गलः ।  
> विराजमानो वपुषा मेरोरिव दिवाकरः ॥ ५१ ॥

‘महाराज ! उठिये और उत्सवकालिक मङ्गलकृत्य पूर्ण करके वस्त्राभूषणोंसे सुशोभित शरीरसे सिंहासनपर विराजमान होइये । फिर मेरु पर्वतसे ऊपर उठनेवाले सूर्यदेवके समान आपकी शोभा होती रहे ॥ ५१ ॥

> सोमसूर्यौ च काकुत्स्थ शिववैश्रवणावपि ।  
> वरुणश्चाग्निरिन्द्रश्च विजयं प्रदिशन्तु ते ॥ ५२ ॥

‘ककुत्स्थ-कुलनन्दन ! चन्द्रमा, सूर्य, शिव, कुबेर, वरुण, अग्नि और इन्द्र आपको विजय प्रदान करें ॥ ५२ ॥

> गता भगवती रात्रिः कृतं कृत्यमिदं तव ।  
> बुध्यस्व नृपशार्दूल कुरु कार्यमनन्तरम् ॥ ५३ ॥

‘राजसिंह ! भगवती रात्रिदेवी विदा हो गयीं । आपने जिसके लिये आज्ञा दी थी, आपका वह सारा कार्य पूर्ण हो गया । इस बातको आप जान लें और इसके बाद जो अभिषेकका कार्य शेष है, उसे पूर्ण करें ॥ ५३ ॥

> उदतिष्ठत रामस्य समग्रमभिषेचनम् ।  
> पौरजानपदाश्चापि नैगमश्च कृताञ्जलिः ॥ ५४ ॥

‘श्रीरामके अभिषेककी सारी तैयारी हो चुकी है । नगर और जनपदके लोग तथा मुख्य-मुख्य व्यापारी भी हाथ जोड़े हुए उपस्थित हैं ॥ ५४ ॥

> स्वयं वसिष्ठो भगवान् ब्राह्मणैः सह तिष्ठति ।  
> क्षिप्रमाज्ञाप्यतां राजन् राघवस्याभिषेचनम् ॥ ५५ ॥

‘राजन् ! ये भगवान् वसिष्ठ मुनि ब्राह्मणोंके साथ द्वारपर खड़े हैं; अतः श्रीरामके अभिषेकका कार्य आरम्भ करनेके लिये शीघ्र आज्ञा दीजिये ॥ ५५ ॥

> यथा ह्यपालाः पशवो यथा सेना ह्यनायका ।  
> यथा चन्द्रं विना रात्रिर्यथा गावो विना वृषम् ॥ ५६ ॥  
> एवं हि भविता राष्ट्रं यत्र राजा न दृश्यते ।

‘जैसे चरवाहोंके बिना पशु, सेनापतिके बिना सेना, चन्द्रमाके बिना रात्रि और साँड़के बिना गौओंकी शोभा नहीं होती, ऐसी ही दशा उस राष्ट्रकी हो जाती है, जहाँ राजाका दर्शन नहीं होता है’ ॥ ५६½ ॥

> एवं तस्य वचः श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमिवार्थवत् ॥ ५७ ॥  
> अभ्यकीर्यत शोकेन भूय एव महीपतिः ।

सुमन्त्रके इस प्रकार कहे हुए सान्त्वनापूर्ण और सार्थक वचनको सुनकर राजा दशरथ पुनः शोकसे ग्रस्त हो गये ॥ ५७½ ॥

> ततस्तु राजा तं सूतं सन्नहर्षः सुतं प्रति ॥ ५८ ॥  
> शोकरक्तेक्षणः श्रीमानुद्वीक्ष्योवाच धार्मिकः ।  
> वाक्यैस्तु खलु मर्माणि मम भूयो निकृन्तसि ॥ ५९ ॥

उस समय पुत्रके वियोगकी सम्भावनासे उनकी प्रसन्नता नष्ट हो चुकी थी। शोकके कारण उनके नेत्र लाल हो गये थे। उन धर्मात्मा श्रीमान् नरेशने एक बार दृष्टि उठाकर सूतकी ओर देखा और इस प्रकार कहा—‘तुम ऐसी बातें सुनाकर मेरे मर्म-स्थानोंपर और अधिक आघात क्यों कर रहे हो’ ॥ ५८-५९ ॥

> सुमन्त्रः करुणं श्रुत्वा दृष्ट्वा दीनं च पार्थिवम् ।  
> प्रगृहीताञ्जलिः किंचित् तस्माद् देशादपाक्रमत्॥ ६० ॥

राजाके ये करुण वचन सुनकर और उनकी दीन दशापर दृष्टिपात करके सुमन्त्र हाथ जोड़े हुए उस स्थानसे कुछ पीछे हट गये ॥ ६० ॥

> यदा वक्तुं स्वयं दैन्यान्न शशाक महीपतिः ।  
> तदा सुमन्त्रं मन्त्रज्ञा कैकेयी प्रत्युवाच ह ॥ ६१ ॥

जब दुःख और दीनताके कारण राजा स्वयं कुछ भी न कह सके, तब मन्त्रणाका ज्ञान रखनेवाली कैकेयीने सुमन्त्रको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ६१ ॥

> सुमन्त्र राजा रजनीं रामहर्षसमुत्सुकः ।  
> प्रजागरपरिश्रान्तो निद्रावशमुपागतः ॥ ६२ ॥

‘सुमन्त्र ! राजा रातभर श्रीरामके राज्याभिषेकजनित हर्षके कारण उत्कण्ठित होकर जागते रहे हैं। अधिक जागरणसे थक जानेके कारण इस समय इन्हें नींद आ गयी है ॥६२॥

> तद् गच्छ त्वरितं सूत राजपुत्रं यशस्विनम् ।  
> राममानय भद्रं ते नात्र कार्या विचारणा ॥ ६३ ॥

‘अतः सूत ! तुम्हारा भला हो । तुम तुरंत जाओ और यशस्वी राजकुमार श्रीरामको यहाँ बुला लाओ । इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ ६३ ॥

> अश्रुत्वा राजवचनं कथं गच्छामि भामिनि ।  
> तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणो वाक्यं राजा मन्त्रिणमब्रवीत्॥ ६४ ॥

तब सुमन्त्रने कहा–‘भामिनि ! मैं महाराजकी आज्ञा सुने बिना कैसे जा सकता हूँ ?’ मन्त्रीकी बात सुनकर राजाने उनसे कहा—॥ ६४ ॥

> सुमन्त्र रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रमानय सुन्दरम् ।  
> स मन्यमानः कल्याणं हृदयेन ननन्द च ॥ ६५ ॥

‘सुमन्त्र ! मैं सुन्दर श्रीरामको देखना चाहता हूँ । तुम शीघ्र उन्हें यहाँ ले आओ ।’ उस समय श्रीरामके दर्शनसे ही कल्याण मानते हुए राजा मन-ही-मन आनन्दका अनुभव करने लगे ॥ ६५ ॥

> निर्जगाम च स प्रीत्या त्वरितो राजशासनात् ।  
> सुमन्त्रश्चिन्तयामास त्वरितं चोदितस्तया ॥ ६६ ॥

इधर सुमन्त्र राजाकी आज्ञासे तुरंत प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे चल दिये । कैकेयीने जो तुरंत श्रीरामको बुला लानेकी आज्ञा दी थी, उसे याद करके वे सोचने लगे—‘पता नहीं, यह उन्हें बुलानेके लिये इतनी जल्दी क्यों मचा रही है ? ॥ ६६ ॥

> व्यक्तं रामाभिषेकार्थे इहायास्यति धर्मराट् ।  
> इति सूतो मतिं कृत्वा हर्षेण महता पुनः ॥ ६७ ॥  
> निर्जगाम महातेजा राघवस्य दिदृक्षया ।  
> सागरह्रदसंकाशात्सुमन्त्रोऽन्तःपुराच्छुभात् ।  
> निष्क्रम्य जनसम्बाधं ददर्श द्वारमग्रतः ॥ ६८ ॥

‘जान पड़ता है, श्रीरामचन्द्रके अभिषेकके लिये ही यह जल्दी कर रही है । इस कार्यमें धर्मराज राजा दशरथको अधिक आयास करना पड़ता है ( शायद इसीलिये ये बाहर नहीं निकलते ) ।’ ऐसा निश्चय करके महातेजस्वी सूत सुमन्त्र फिर बड़े हर्षके साथ श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे चल पड़े । समुद्रके अन्तर्वर्ती जलाशयके समान उस सुन्दर अन्तःपुरसे निकलकर सुमन्त्रने द्वारके सामने मनुष्योंकी भारी भीड़ एकत्र हुई देखी ॥ ६७-६८ ॥

> ततः पुरस्तात् सहसा विनिःसृतो  
> महीपतेर्द्वारगतान् विलोकयन् ।  
> ददर्श पौरान् विविधान् महाधना-  
> नुपस्थितान् द्वारमुपेत्य विष्ठितान् ॥ ६९ ॥

राजाके अन्तःपुरसे सहसा निकलकर सुमन्त्रने द्वारपर एकत्र हुए लोगोंकी ओर दृष्टिपात किया । उन्होंने देखा, बहुसंख्यक पुरवासी वहाँ उपस्थित थे और अनेकानेक महाधनी पुरुष राजद्वारपर आकर खड़े थे ॥ ६९ ॥

Book: https://ramayana.com/hi/valmiki-ramayana

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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