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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 118"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 118

> सा त्वेवमुक्ता वैदेही त्वनसूयानसूयया ।  
> प्रतिपूज्य वचो मन्दं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ १ ॥

तपस्विनी अनसूयाके इस प्रकार उपदेश देनेपर किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखनेवाली विदेहराजकुमारी सीताने उनके वचनोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके धीरे-धीरे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ १ ॥

> नैतदाश्चर्यमार्यायां यन्मां त्वमनुभाषसे ।  
> विदितं तु ममाप्येतद् यथा नार्याः पतिर्गुरुः ॥ २ ॥

‘देवि ! आप संसारकी स्त्रियोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं । आपके मुँहसे ऐसी बातोंका सुनना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । नारीका गुरु पति ही है, इस विषयमें जैसा आपने उपदेश किया है, यह बात मुझे भी पहलेसे ही विदित है ॥ २ ॥

> यद्यप्येष भवेद् भर्ता अनार्यो वृत्तिवर्जितः ।  
> अद्वैधमत्र वर्तव्यं तथाप्येष मया भवेत् ॥ ३ ॥

‘मेरे पतिदेव यदि अनार्य (चरित्रहीन) तथा जीविकाके साधनोंसे रहित (निर्धन) होते तो भी मैं बिना किसी दुविधाके इनकी सेवामें लगी रहती ॥ ३ ॥

> किं पुनर्यो गुणश्लाघ्यः सानुक्रोशो जितेन्द्रियः ।  
> स्थिरानुरागो धर्मात्मा मातृवत्पितृवत्प्रियः ॥ ४ ॥

‘फिर जब कि ये अपने गुणोंके कारण ही सबकी प्रशंसाके पात्र हैं, तब तो इनकी सेवाके लिये कहना ही क्या है। ये श्रीरघुनाथजी परम दयालु, जितेन्द्रिय, दृढ़ अनुराग रखनेवाले, धर्मात्मा तथा माता-पिताके समान प्रिय हैं ॥ ४ ॥

> यां वृत्तिं वर्तते रामः कौसल्यायां महाबलः ।  
> तामेव नृपनारीणामन्यासामपि वर्तते ॥ ५ ॥

‘महाबली श्रीराम अपनी माता कौसल्याके प्रति जैसा बर्ताव करते हैं वैसा ही महाराज दशरथकी दूसरी रानियोंके साथ भी करते हैं ॥ ५ ॥

> सकृद् दृष्टास्वपि स्त्रीषु नृपेण नृपवत्सलः ।  
> मातृवद् वर्तते वीरो मानमुत्सृज्य धर्मवित् ॥ ६ ॥

‘महाराज दशरथने एक बार भी जिन स्त्रियोंको प्रेमदृष्टिसे देख लिया है, उनके प्रति भी ये पितृवत्सल धर्मज्ञ वीर श्रीराम मान छोड़कर माताके समान ही बर्ताव करते हैं ॥ ६ ॥

> आगच्छन्त्याश्च विजनं वनमेवं भयावहम् ।  
> समाहितं हि मे श्वश्र्वा हृदये यत् स्थिरं मम ॥ ७ ॥

‘जब मैं पतिके साथ निर्जन वनमें आने लगी, उस समय मेरी सास कौसल्याने मुझे जो कर्तव्यका उपदेश दिया था, वह मेरे हृदयमें ज्यों-का-त्यों स्थिरभावसे अङ्कित है ॥ ७ ॥

> पाणिप्रदानकाले च यत् पुरा त्वग्निसंनिधौ ।  
> अनुशिष्टं जनन्या मे वाक्यं तदपि मे धृतम् ॥ ८ ॥

‘पहले मेरे विवाह-कालमें अग्निके समीप माताने मुझे जो शिक्षा दी थी, वह भी मुझे अच्छी तरह याद है ॥ ८ ॥

> न विस्मृतं तु मे सर्वं वाक्यैः स्वैर्धर्मचारिणि ।  
> पतिशुश्रूषणान्नार्यास्तपो नान्यद् विधीयते ॥ ९ ॥

‘धर्मचारिणि ! इसके सिवा मेरे अन्य स्वजनोंने अपने वचनोंद्वारा जो-जो उपदेश किया है, वह भी मुझे भूला नहीं है । स्त्रीके लिये पतिकी सेवाके अतिरिक्त दूसरे किसी तपका विधान नहीं है ॥ ९ ॥

> सावित्री पतिशुश्रूषां कृत्वा स्वर्गे महीयते ।  
> तथावृत्तिश्च याता त्वं पतिशुश्रूषया दिवम् ॥ १० ॥

‘सत्यवान्की पत्नी सावित्री पतिकी सेवा करके ही स्वर्गलोकमें पूजित हो रही हैं । उन्हींके समान बर्ताव करनेवाली आप ( अनसूया देवी ) ने भी पतिकी सेवाके ही प्रभावसे स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया है ॥ १० ॥

> वरिष्ठा सर्वनारीणामेषा च दिवि देवता ।  
> रोहिणी न विना चन्द्रं मुहूर्तमपि दृश्यते ॥ ११ ॥

‘सम्पूर्ण स्त्रियोंमें श्रेष्ठ यह स्वर्गकी देवी रोहिणी पति-सेवाके प्रभावसे ही एक मुहूर्तके लिये भी चन्द्रमासे विलग होती नहीं देखी जाती ॥ ११ ॥

> एवंविधाश्च प्रवराः स्त्रियो भर्तृदृढव्रताः ।  
> देवलोके महीयन्ते पुण्येन स्वेन कर्मणा ॥ १२ ॥

‘इस प्रकार दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य धर्मका पालन करनेवाली बहुत-सी साध्वी स्त्रियाँ अपने पुण्यकर्मके बलसे देवलोकमें आदर पा रही हैं’ ॥ १२ ॥

> ततोऽनसूया संहृष्टा श्रुत्वोक्तं सीतया वचः ।  
> शिरसाऽऽघ्राय चोवाच मैथिलीं हर्षयन्त्युत ॥ १३ ॥

तदनन्तर सीताके कहे हुए वचन सुनकर अनसूयाको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने उनका मस्तक सूँघा और फिर उन मिथिलेशकुमारीका हर्ष बढ़ाते हुए इस प्रकार कहा–॥१३॥

> नियमैर्विविधैराप्तं तपो हि महदस्ति मे ।  
> तत् संश्रित्य बलं सीते छन्दये त्वां शुचिव्रते ॥ १४ ॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीते ! मैंने अनेक प्रकारके नियमोंका पालन करके बहुत बड़ी तपस्या संचित की है । उस तपोबलका ही आश्रय लेकर मैं तुमसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहती हूँ ॥ १४ ॥

> उपपन्नं च युक्तं च वचनं तव मैथिलि ।  
> प्रीता चास्म्युचितां सीते करवाणि प्रियं च किम् ॥ १५॥

‘मिथिलेशकुमारी सीते ! तुमने बहुत ही युक्तियुक्त और उत्तम वचन कहा है । उसे सुनकर मुझे बड़ा संतोष हुआ है, अतः बताओ मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ ?’ ॥ १५ ॥

> तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा विस्मिता मन्दविस्मया ।  
> कृतमित्यब्रवीत् सीता तपोबलसमन्विताम् ॥ १६ ॥

उनका यह कथन सुनकर सीताको बड़ा आश्चर्य हुआ । वे तपोबलसम्पन्न अनसूयासे मन्द-मन्द मुसकराती हुई बोलीं—‘आपने अपने वचनोंद्वारा ही मेरा सारा प्रिय कार्य कर दिया, अब और कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं है’ १६ ॥

> सा त्वेवमुक्ता धर्मज्ञा तया प्रीततराभवत् ।  
> सफलं च प्रहर्षं ते हन्त सीते करोम्यहम् ॥ १७ ॥

सीताके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ अनसूयाको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे बोलीं—‘सीते ! तुम्हारी निर्लोभतासे जो मुझे विशेष हर्ष हुआ है ( अथवा तुममें जो लोभहीनताके कारण सदा आनन्दोत्सव भरा रहता है ), उसे मैं अवश्य सफल करूँगी ॥ १७ ॥

> इदं दिव्यं वरं माल्यं वस्त्रमाभरणानि च ।  
> अङ्गरागं च वैदेहि महार्हमनुलेपनम् ॥ १८ ॥  
> मया दत्तमिदं सीते तव गात्राणि शोभयेत् ।  
> अनुरूपमसंक्लिष्टं नित्यमेव भविष्यति ॥ १९ ॥

‘यह सुन्दर दिव्य हार, यह वस्त्र, ये आभूषण, यह अङ्गराग और बहुमूल्य अनुलेपन मैं तुम्हें देती हूँ । विदेहनन्दिनि सीते ! मेरी दी हुई ये वस्तुएँ तुम्हारे अङ्गोंकी शोभा बढ़ायेंगी । ये सब तुम्हारे ही योग्य हैं और सदा उपयोगमें लायी जानेपर निर्दोष एवं निर्विकार रहेंगी ॥ १८-१९ ॥

> अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे ।  
> शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीर्विष्णुमव्ययम् ॥ २० ॥

‘जनककिशोरी ! इस दिव्य अङ्गरागको अङ्गोंमें लगाकर तुम अपने पतिको उसी प्रकार सुशोभित करोगी, जैसे लक्ष्मी अविनाशी भगवान् विष्णुकी शोभा बढ़ाती है’ ॥ २० ॥

> सा वस्त्रमङ्गरागं च भूषणानि स्रजस्तथा ।  
> मैथिली प्रतिजग्राह प्रीतिदानमनुत्तमम् ॥ २१ ॥  
> प्रतिगृह्य च तत् सीता प्रीतिदानं यशस्विनी ।  
> श्लिष्टाञ्जलिपुटा धीरा समुपास्त तपोधनाम् ॥ २२ ॥

अनसूयाकी आज्ञासे धीरस्वभाववाली यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीताने उस वस्त्र, अङ्गराग, आभूषण और हारको उनकी प्रसन्नताका परम उत्तम उपहार समझकर ले लिया । उस प्रेमोपहारको ग्रहण करके वे दोनों हाथ जोड़कर उन तपोधना अनसूयाकी सेवामें बैठी रहीं ॥ २१-२२ ॥

> तथा सीतामुपासीनामनसूया दृढव्रता ।  
> वचनं प्रष्टुमारेभे कथां कांचिदनुप्रियाम् ॥ २३ ॥

तदनन्तर इस प्रकार अपने निकट बैठी हुई सीतासे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली अनसूयाने कोई परम प्रिय कथा सुनानेके लिये इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥ २३ ॥

> स्वयंवरे किल प्राप्ता त्वमनेन यशस्विना ।  
> राघवेणेति मे सीते कथा श्रुतिमुपागता ॥ २४ ॥

‘सीते ! इन यशस्वी राघवेन्द्रने तुम्हें स्वयंवरमें प्राप्त किया था, यह बात मेरे सुननेमें आयी है ॥ २४ ॥

> तां कथां श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण च मैथिलि ।  
> यथाभूतं च कार्त्स्न्येन तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ २५ ॥

‘मिथिलेशनन्दिनि ! मैं उस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहती हूँ । अतः जो कुछ जिस प्रकार हुआ, वह सब पूर्णरूपसे मुझे बताओ’ ॥ २५ ॥

> एवमुक्ता तु सा सीता तापसीं धर्मचारिणीम् ।  
> श्रूयतामिति चोक्त्वा वै कथयामास तां कथाम् ॥ २६ ॥

उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर सीताने उन धर्मचारिणी तापसी अनसूयासे कहा—‘माताजी ! सुनिये ।’ ऐसा कहकर उन्होंने उस कथाको इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २६ ॥

> मिथिलाधिपतिर्वीरो जनको नाम धर्मवित् ।  
> क्षत्रकर्मण्यभिरतो न्यायतः शास्ति मेदिनीम् ॥ २७ ॥

‘मिथिला जनपदके वीर राजा ‘जनक’ नामसे प्रसिद्ध हैं । वे धर्मके ज्ञाता हैं, अतः क्षात्रोचित कर्ममें तत्पर रहकर न्यायपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हैं ॥ २७ ॥

> तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम् ।  
> अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपतेः सुता ॥ २८ ॥

‘एक समयकी बात है, वे यज्ञके योग्य क्षेत्रको हाथमें हल लेकर जोत रहे थे; इसी समय मैं पृथ्वीको फाड़कर प्रकट हुई । इतनेमात्रसे ही मैं राजा जनककी पुत्री हुई ॥ २८ ॥

> स मां दृष्ट्वा नरपतिर्मुष्टिविक्षेपतत्परः ।  
> पांसुगुण्ठितसर्वाङ्गीं विस्मितो जनकोऽभवत् ॥ २९ ॥

‘वे राजा उस क्षेत्रमें ओषधियोंको मुट्ठीमें लेकर बो रहे थे । इतनेहीमें उनकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी । मेरे सारे अङ्गोंमें धूल लिपटी हुई थी । उस अवस्थामें मुझे देखकर राजा जनकको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २९ ॥

> अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम् ।  
> ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातितः ॥ ३० ॥

‘उन दिनों उनके कोई दूसरी संतान नहीं थी, इसलिये स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोदमें ले लिया और ‘यह मेरी बेटी है’ ऐसा कहकर मुझपर अपने हृदयका सारा स्नेह उड़ेल दिया ॥ ३० ॥

> अन्तरिक्षे च वागुक्ता प्रतिमामानुषी किल ।  
> एवमेतन्नरपते धर्मेण तनया तव ॥ ३१ ॥

‘इसी समय आकाशवाणी हुई, जो स्वरूपतः मानवी भाषामें कही गयी थी ( अथवा मेरे विषयमें प्रकट हुई वह वाणी अमानुषी—दिव्य थी ) । उसने कहा— ‘नरेश्वर ! तुम्हारा कथन ठीक है, यह कन्या धर्मतः तुम्हारी ही पुत्री है’ ॥ ३१ ॥

> ततः प्रहृष्टो धर्मात्मा पिता मे मिथिलाधिपः ।  
> अवाप्तो विपुलामृद्धिं मामवाप्य नराधिपः ॥ ३२ ॥

‘यह आकाशवाणी सुनकर मेरे धर्मात्मा पिता मिथिलानरेश बड़े प्रसन्न हुए । मुझे पाकर उन नरेशने मानो कोई बड़ी समृद्धि पा ली थी ॥ ३२ ॥

> दत्ता चास्मीष्टवद्येष्ठायै ज्येष्ठायै पुण्यकर्मणे ।  
> तया सम्भाविता चास्मि स्निग्धया मातृसौहृदात् ॥ ३३ ॥

‘उन्होंने पुण्यकर्मपरायणा बड़ी रानीको, जो उन्हें अधिक प्रिय थीं, मुझे दे दिया । उन स्नेहमयी महारानीने मातृ-समुचित सौहार्दसे मेरा लालन-पालन किया ॥ ३३ ॥

> पतिसंयोगसुलभं वयो दृष्ट्वा तु मे पिता ।  
> चिन्तामभ्यगमद् दीनो वित्तनाशादिवाधनः ॥ ३४ ॥

‘जब पिताने देखा कि मेरी अवस्था विवाहके योग्य हो गयी, तब इसके लिये वे बड़ी चिन्तामें पड़े । जैसे कमाये हुए धनका नाश हो जानेसे निर्धन मनुष्यको बड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार वे मेरे विवाहकी चिन्तासे बहुत दुखी हो गये ॥ ३४ ॥

> सदृशाच्चापकृष्टाच्च लोके कन्यापिता जनात् ।  
> प्रधर्षणमवाप्नोति शक्रेणापि समो भुवि ॥ ३५ ॥

‘संसारमें कन्याके पिताको, वह भूतलपर इन्द्रके ही तुल्य क्यों न हो, वरपक्षके लोगोंसे, वे अपने समान या अपनेसे छोटी हैसियतके ही क्यों न हों, प्रायः अपमान उठाना पड़ता है ॥ ३५ ॥

> तां धर्षणामदूरस्थां संदृश्यात्मनि पार्थिवः ।  
> चिन्तार्णवगतः पारं नाससादाप्लवो यथा ॥ ३६ ॥

‘यह अपमान सहन करनेकी घड़ी अपने लिये बहुत समीप आ गयी है, यह देखकर राजा चिन्ताके समुद्रमें डूब गये । जैसे नौकारहित मनुष्य पार नहीं पहुँच पाता, उसी प्रकार मेरे पिता भी चिन्ताका पार नहीं पा रहे थे ॥ ३६ ॥

> अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् ।  
> सदृशं चाभिरूपं च महीपालः पतिं मम ॥ ३७ ॥

‘मुझे अयोनिजा कन्या समझकर वे भूपाल मेरे लिये योग्य और परम सुन्दर पतिका विचार करने लगे; किंतु किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके ॥ ३७ ॥

> तस्य बुद्धिरियं जाता चिन्तयानस्य संततम् ।  
> स्वयंवरं तनूजायाः करिष्यामीति धर्मतः ॥ ३८ ॥

‘सदा मेरे विवाहकी चिन्तामें पड़े रहनेवाले उन महाराजके मनमें एक दिन यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं धर्मतः अपनी पुत्रीका स्वयंवर करूँगा ॥ ३८ ॥

> महायज्ञे तदा तस्य वरुणेन महात्मना ।  
> दत्तं धनुर्वरं प्रीत्या तूणी चाक्षय्यसायकौ ॥ ३९ ॥

‘उन्हीं दिनों उनके एक महान् यज्ञमें प्रसन्न होकर महात्मा वरुणने उन्हें एक श्रेष्ठ दिव्य धनुष तथा अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस दिये ॥ ३९ ॥

> असंचाल्यं मनुष्यैश्च यत्नेनापि च गौरवात् ।  
> तन्न शक्ता नमयितुं स्वप्नेष्वपि नराधिपाः ॥ ४० ॥

‘वह धनुष इतना भारी था कि मनुष्य पूरा प्रयत्न करनेपर भी उसे हिला भी नहीं पाते थे । भूमण्डलके नरेश स्वप्नमें भी उस धनुषको झुकानेमें असमर्थ थे ॥ ४० ॥

> तद्धनुः प्राप्य मे पित्रा व्याहृतं सत्यवादिना ।  
> समवाये नरेन्द्राणां पूर्वमामन्त्र्य पार्थिवान् ॥ ४१ ॥

‘उस धनुषको पाकर मेरे सत्यवादी पिताने पहले भूमण्डलके राजाओंको आमन्त्रित करके उन नरेशोंके समूहमें यह बात कही—॥ ४१ ॥

> इदं च धनुरुद्यम्य सज्यं यः कुरुते नरः ।  
> तस्य मे दुहिता भार्या भविष्यति न संशयः ॥ ४२ ॥

‘जो मनुष्य इस धनुषको उठाकर इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा देगा, मेरी पुत्री सीता उसीकी पत्नी होगी; इसमें संशय नहीं है; ॥ ४२ ॥

> तच्च दृष्ट्वा धनुःश्रेष्ठं गौरवाद् गिरिसंनिभम् ।  
> अभिवाद्य नृपा जग्मुरशक्तास्तस्य तोलने ॥ ४३ ॥

‘अपने भारीपनके कारण पहाड़-जैसे प्रतीत होनेवाले उस श्रेष्ठ धनुषको देखकर वहाँ आये हुए राजा जब उसे उठानेमें समर्थ न हो सके, तब उसे प्रणाम करके चले गये ॥ ४३ ॥

> सुदीर्घस्य तु कालस्य राघवोऽयं महाद्युतिः ।  
> विश्वामित्रेण सहितो यज्ञं द्रष्टुं समागतः ॥ ४४ ॥  
> लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा रामः सत्यपराक्रमः ।  
> विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा मम पित्रा सुपूजितः ॥ ४५ ॥

‘तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् ये महातेजस्वी रघुकुलनन्दन सत्यपराक्रमी श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणको साथ ले विश्वामित्रजीके साथ मेरे पिताका यज्ञ देखनेके लिये मिथिलामें पधारे । उस समय मेरे पिताने धर्मात्मा विश्वामित्र मुनिका बड़ा आदर-सत्कार किया ॥ ४४-४५ ॥

> प्रोवाच पितरं तत्र राघवौ रामलक्ष्मणौ ।  
> सुतौ दशरथस्येमौ धनुर्दर्शनकाङ्क्षिणौ ।  
> धनुर्दर्शय रामाय राजपुत्राय दैविकम् ॥ ४६ ॥

‘तब वहाँ विश्वामित्रजी मेरे पितासे बोले—‘राजन् ! ये दोनों रघुकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं और आपके उस दिव्य धनुषका दर्शन करना चाहते हैं । आप अपना वह देवप्रदत्त धनुष राजकुमार श्रीरामको दिखाइये’ ॥ ४६ ॥

> इत्युक्तस्तेन विप्रेण तद् धनुः समुपानयत् ।  
> तद् धनुर्दर्शयामास राजपुत्राय दैविकम् ॥ ४७ ॥

‘विप्रवर विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर पिताजीने उस दिव्य धनुषको मँगवाया और राजकुमार श्रीरामको उसे दिखाया ॥ ४७ ॥

> निमेषान्तरमात्रेण तदानम्य महाबलः ।  
> ज्यां समारोप्य झटिति पूरयामास वीर्यवान् ॥ ४८ ॥

‘महाबली और परम पराक्रमी श्रीरामने पलक मारते-मारते उस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसे तुरंत कानतक खींचा ॥ ४८ ॥

> तेनापूरयता वेगान्मध्ये भग्नं द्विधा धनुः ।  
> तस्य शब्दोऽभवद् भीमः पतितस्याशनेर्यथा ॥ ४९ ॥  
> ततोऽहं तत्र रामाय पित्रा सत्याभिसंधिना ।  
> उद्यता दातुमुद्यम्य जलभाजनमुत्तमम् ॥ ५० ॥

‘उनके वेगपूर्वक खींचते समय वह धनुष बीचसे ही टूट गया और उसके दो टुकड़े हो गये । उसके टूटते समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ मानो वहाँ वज्र टूट पड़ा हो ॥ ‘तब मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताने जलका उत्तम पात्र लेकर श्रीरामके हाथमें मुझे दे देनेका उद्योग किया ॥ ५० ॥ ‘उस समय अपने पिता अयोध्यानरेश महाराज दशरथके अभिप्रायको जाने बिना श्रीरामने राजा जनकके देनेपर भी मुझे नहीं ग्रहण किया ॥ ५१ ॥

> ततः श्वशुरमामन्य वृद्धं दशरथं नृपम् ।  
> मम पित्रा त्वहं दत्ता रामाय विदितात्मने ॥ ५२ ॥

‘तदनन्तर मेरे बूढ़े श्वशुर राजा दशरथकी अनुमति लेकर पिताजीने आत्मज्ञानी श्रीरामको मेरा दान कर दिया ॥ ५२ ॥

> मम चैवानुजा साध्वी ऊर्मिला शुभदर्शना ।  
> भार्यार्थे लक्ष्मणस्यापि दत्ता पित्रा मम स्वयम् ॥ ५३ ॥

‘तत्पश्चात् पिताजीने स्वयं ही मेरी छोटी बहिन सती साध्वी परम सुन्दरी ऊर्मिलाको लक्ष्मणकी पत्नीरूपसे उनके हाथमें दे दिया ॥ ५३ ॥

> एवं दत्तास्मि रामाय तथा तस्मिन् स्वयंवरे ।  
> अनुरक्तास्मि धर्मेण पतिं वीर्यवतां वरम् ॥ ५४ ॥

‘इस प्रकार उस स्वयंवरमें पिताजीने श्रीरामके हाथमें मुझको सौंपा था । मैं धर्मके अनुसार अपने पति बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीराममें सदा अनुरक्त रहती हूँ’ ॥ ५४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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