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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 115"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 115

> ततो निक्षिप्य मातृस्ता अयोध्यायां दृढव्रतः।  
> भरतः शोकसंतप्तो गुरूनिदमथाब्रवीत् ॥ १ ॥

तदनन्तर सब माताओंको अयोध्यामें रखकर दृढ-प्रतिज्ञ भरतने शोकसे संतप्त हो गुरुजनोंसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

> नन्दिग्रामं गमिष्यामि सर्वानामन्त्रयेऽत्र वः।  
> तत्र दुःखमिदं सर्वं सहिष्ये राघवं विना ॥ २ ॥

‘अब मैं नन्दिग्रामको जाऊँगा, इसके लिये आप सब लोगोंकी आज्ञा चाहता हूँ। वहाँ श्रीरामके विना प्राप्त होनेवाले इस सारे दुःखको सहन करूँगा ॥२॥

> गतश्चाहो दिवं राजा वनस्थः स गुरुर्मम।  
> रामं प्रतीक्षे राज्याय स हि राजा महायशाः ॥ ३ ॥

‘अहो ! महाराज ( पूज्य पिताजी ) तो स्वर्गको सिधारे और वे मेरे गुरु ( पूजनीय भ्राता ) श्रीरामचन्द्रजी वनमें विराज रहे हैं। मैं इस राज्यके लिये वहाँ श्रीरामकी प्रतीक्षा करता रहूँगा; क्योंकि वे महायशस्वी श्रीराम ही हमारे राजा हैं’ ॥ ३ ॥

> एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः।  
> अब्रुवन् मन्त्रिणः सर्वे वसिष्ठश्च पुरोहितः ॥ ४ ॥

महात्मा भरतका यह शुभ वचन सुनकर सब मन्त्री और पुरोहित वसिष्ठजी बोले—॥ ४ ॥

> सुभृशं श्लाघनीयं च यदुक्तं भरत त्वया।  
> वचनं भ्रातृवात्सल्यादनुरूपं तवैव तत् ॥ ५ ॥

‘भरत ! भ्रातृभक्तिसे प्रेरित होकर तुमने जो बात कही है, वह बहुत ही प्रशंसनीय है। वास्तवमें वह तुम्हारे ही योग्य है ॥ ५ ॥

> नित्यं ते बन्धुलुब्धस्य तिष्ठतो भ्रातृसौहृदे।  
> मार्गमार्ये प्रपन्नस्य नानुमन्येत कः पुमान् ॥ ६ ॥

‘तुम अपने भाईके दर्शनके लिये सदा लालायित रहते हो और भाईके ही सौहार्द ( हितसाधन ) में संलग्न हो। साथ ही श्रेष्ठ मार्गपर स्थित हो, अतः कौन पुरुष तुम्हारे विचारका अनुमोदन नहीं करेगा’ ॥ ६ ॥

> मन्त्रिणां वचनं श्रुत्वा यथाभिलषितं प्रियम्।  
> अब्रवीत् सारथिं वाक्यं रथो मे युज्यतामिति ॥ ७ ॥

मन्त्रियोंका अपनी रुचिके अनुरूप प्रिय वचन सुनकर भरतने सारथिसे कहा—‘मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय’ ॥ ७ ॥

> प्रहृष्टवदनः सर्वा मातृः समभिभाष्य च।  
> आरुरोह रथं श्रीमाञ्शत्रुघ्नेन समन्वितः ॥ ८ ॥

फिर उन्होंने प्रसन्नवदन होकर सब माताओंसे बातचीत करके जानेकी आज्ञा ली। इसके बाद शत्रुघ्नके सहित श्रीमान् भरत रथपर सवार हुए ॥ ८ ॥

> आरुह्य तु रथं क्षिप्रं शत्रुघ्नभरतावुभौ।  
> ययतुः परमप्रीतौ वृतौ मन्त्रिपुरोहितैः ॥ ९ ॥

रथपर आरूढ़ होकर परम प्रसन्न हुए भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई मन्त्रियों तथा पुरोहितोंसे घिरकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ९ ॥

> अग्रतो गुरवः सर्वे वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः।  
> प्रययुः प्राङ्मुखाः सर्वे नन्दिग्रामो यतो भवेत् ॥ १० ॥

आगे-आगे वसिष्ठ आदि सभी गुरुजन एवं ब्राह्मण चल रहे थे। उन सब लोगोंने अयोध्यासे पूर्वाभिमुख होकर यात्रा की और उस मार्गको पकड़ा, जो नन्दिग्रामकी ओर जाता था ॥ १० ॥

> बलं च तद्नाहूतं गजाश्वरथसंकुलम्।  
> प्रययौ भरते याते सर्वे च पुरवासिनः ॥ ११ ॥

भरतके प्रस्थित होनेपर हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई सारी सेना भी बिना बुलाये ही उनके पीछे-पीछे चल दी और समस्त पुरवासी भी उनके साथ हो लिये ॥ ११ ॥

> रथस्थः स तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सलः।  
> नन्दिग्राममं ययौ तूर्णं शिरस्यादाय पादुके ॥ १२ ॥

धर्मात्मा भ्रातृवत्सल भरत अपने मस्तकपर भगवान् श्रीरामकी चरणपादुका लिये रथपर बैठकर बड़ी शीघ्रतासे नन्दिग्रामकी ओर चले ॥ १२ ॥

> भरतस्तु ततः क्षिप्रं नन्दिग्रामं प्रविश्य सः।  
> अवतीर्य रथात् तूर्णं गुरूनिदमभाषत ॥१३॥

नन्दिग्राममें शीघ्र पहुँचकर भरत तुरंत ही रथसे उतर पड़े और गुरुजनोंसे इस प्रकार बोले—॥ १३ ॥

> एतद् राज्यं मम भ्रात्रा दत्तं संन्यासमुत्तमम् ।  
> योगक्षेमवहे चेमे पादुके हेमभूषिते ॥ १४ ॥

‘मेरे भाईने यह उत्तम राज्य मुझे धरोहरके रूपमें दिया है, उनकी ये सुवर्णविभूषित चरणपादुकाएँ ही सबके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाली हैं’ ॥ १४ ॥

> भरतः शिरसा कृत्वा संन्यासं पादुके ततः ।  
> अब्रवीद् दुःखसंतप्तः सर्वं प्रकृतिमण्डलम् ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् भरतने मस्तक झुकाकर उन चरणपादुकाओंके प्रति उस धरोहररूप राज्यको समर्पित करके दुःखसे संतप्त हो समस्त प्रकृतिमण्डल ( मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि ) से कहा—॥ १५ ॥

> छत्रं धारयत क्षिप्रमार्यपादाविमौ मतौ ।  
> आभ्यां राज्ये स्थितो धर्मः पादुकाभ्यां गुरोर्मम ॥ १६ ॥

‘आप सब लोग इन चरणपादुकाओंके ऊपर छत्र धारण करें । मैं इन्हें आर्य रामचन्द्रजीके साक्षात् चरण मानता हूँ । मेरे गुरुकी इन चरणपादुकाओंसे ही इस राज्यमें धर्मकी स्थापना होगी ॥ १६ ॥

> भ्रात्रा तु मयि संन्यासो निक्षिप्तः सौहृदादयम् ।  
> तमिमं पालयिष्यामि राघवागमनं प्रति ॥ १७ ॥

‘मेरे भाईने प्रेमके कारण ही यह धरोहर मुझे सौंपी है, अतः मैं उनके लौटनेतक इसकी भलीभाँति रक्षा करूँगा ॥ १७ ॥

> क्षिप्रं संयोजयित्वा तु राघवस्य पुनः स्वयम् ।  
> चरणौ तौ तु रामस्य द्रक्ष्यामि सहपादुकौ ॥ १८ ॥

‘इसके बाद मैं स्वयं इन पादुकाओंको पुनः शीघ्र ही श्रीरघुनाथजीके चरणोंसे संयुक्त करके इन पादुकाओंसे सुशोभित श्रीरामके उन युगल चरणोंका दर्शन करूँगा ॥ १८ ॥

> ततो निक्षिप्तभारोऽहं राघवेण समागतः ।  
> निवेद्य गुरवे राज्यं भजिष्ये गुरुवर्तिताम् ॥ १९ ॥

‘श्रीरघुनाथजीके आनेपर उनसे मिलते ही मैं अपने उन गुरुदेवको यह राज्य समर्पित करके उनकी आज्ञाके अधीन हो उन्हींकी सेवामें लग जाऊँगा। राज्यका यह भार उनपर डालकर मैं हलका हो जाऊँगा ॥ १९ ॥

> राघवाय च संन्यासं दत्त्वेमे वरपादुके ।  
> राज्यं चेदमयोध्यां च धूतपापो भवाम्यहम् ॥ २० ॥

‘मेरे पास धरोहररूपमें रखे हुए इस राज्यको, अयोध्याको तथा इन श्रेष्ठ पादुकाओंको श्रीरघुनाथजीकी सेवामें समर्पित करके मैं सब प्रकारके पापतापसे मुक्त हो जाऊँगा ॥ २० ॥

> अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे प्रहृष्टमुदिते जने ।  
> प्रीतिर्मम यशश्चैव भवेद् राज्याच्चतुर्गुणम् ॥ २१ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामका अयोध्याके राज्यपर अभिषेक हो जानेपर जब सब लोग हर्ष और आनन्दमें निमग्न हो जायँगे, तब मुझे राज्य पानेकी अपेक्षा चौगुनी प्रसन्नता और चौगुने यशकी प्राप्ति होगी’ ॥ २१ ॥

> एवं तु विलपन् दीनो भरतः स महायशाः ।  
> नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं दुःखितो मन्त्रिभिः सह ॥

इस प्रकार दीनभावसे विलाप करते हुए दुःखमग्न महायशस्वी भरत मन्त्रियोंके साथ नन्दिग्राममें रहकर राज्यका शासन करने लगे ॥ २२ ॥

> स वल्कलजटाधारी मुनिवेषधरः प्रभुः ।  
> नन्दिग्रामेऽवसद् धीरः ससैन्यो भरतस्तदा ॥ २३ ॥

सेनासहित प्रभावशाली धीर-वीर भरतने उस समय वल्कल और जटा धारण करके मुनिवेषधारी हो नन्दिग्राममें निवास किया ॥ २३ ॥

> रामागमनमाकाङ्क्षन् भरतो भ्रातृवत्सलः ।  
> भ्रातुर्वचनकारी च प्रतिज्ञापारगस्तदा ।  
> पादुके त्वभिषिच्याथ नन्दिग्रामेऽवसत् तदा ॥ २४ ॥

भाईकी आज्ञाका पालन और प्रतिज्ञाके पार जानेकी इच्छा करनेवाले भ्रातृवत्सल भरत श्रीरामचन्द्रजीके आगमनकी आकाङ्क्षा रखते हुए उनकी चरणपादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्त करके उन दिनों नन्दिग्राममें रहने लगे ॥ २४ ॥

> सवालव्यजनं छत्रं धारयामास स स्वयम् ।  
> भरतः शासनं सर्वं पादुकाभ्यां निवेदयन् ॥ २५ ॥

भरतजी राज्य-शासनका समस्त कार्य भगवान् श्रीरामकी चरणपादुकाओंको निवेदन करके करते थे तथा स्वयं ही उनके ऊपर छत्र लगाते और चँवर डुलाते थे ॥ २५ ॥

> ततस्तु भरतः श्रीमानभिषिच्यार्यपादुके ।  
> तदधीनस्तदा राज्यं कारयामास सर्वदा ॥ २६ ॥

श्रीमान् भरत बड़े भाईकी उन पादुकाओंको राज्यपर अभिषिक्त करके सदा उनके अधीन रहकर उन दिनों राज्यका सब कार्य मन्त्री आदिसे कराते थे ॥ २६ ॥

> तदा हि यत् कार्यमुपैति किंचि-  
> दुपायनं चोपहृतं महार्हम् ।  
> स पादुकाभ्यां प्रथमं निवेद्य  
> चकार पश्चाद् भरतो यथावत् ॥ २७ ॥

उस समय जो कोई भी कार्य उपस्थित होता, जो भी बहुमूल्य भेंट आती, वह सब पहले उन पादुकाओंको निवेदन करके पीछे भरतजी उसका यथावत् प्रबन्ध करते थे ॥ २७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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