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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 112"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 112

> तमप्रतिमतेजोभ्यां भ्रातृभ्यां रोमहर्षणम् ।  
> विस्मिताः संगमं प्रेक्ष्य समुपेता महर्षयः ॥ १ ॥

उन अनुपम तेजस्वी भ्राताओंका वह रोमाञ्चकारी समागम देख वहाँ आये हुए महर्षियोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ १ ॥

> अन्तर्हिता मुनिगणाः स्थिताश्च परमर्षयः ।  
> तौ भ्रातरौ महाभागौ काकुत्स्थौ प्रशशंसिरे ॥ २ ॥  
> सदार्यौ राजपुत्रौ द्वौ धर्मज्ञौ धर्मविक्रमौ ।  
> श्रुत्वा वयं हि सम्भाषामुभयोः स्पृहयामहे ॥ ३ ॥

अन्तरिक्षमें अदृश्य भावसे खड़े हुए मुनि तथा वहाँ प्रत्यक्षरूपमें बैठे हुए महर्षि उन महान् भाग्यशाली ककुत्स्थवंशी बन्धुओंकी इस प्रकार प्रशंसा करने लगे—॥ ‘ये दोनों राजकुमार सदा श्रेष्ठ, धर्मके ज्ञाता और धर्ममार्गपर ही चलनेवाले हैं । इन दोनोंकी बातचीत सुनकर हमें उसे बारंबार सुनते रहनेकी ही इच्छा होती है’ ॥ ३ ॥

> ततस्त्वृषिगणाः क्षिप्रं दशग्रीववधैषिणः ।  
> भरतं राजशार्दूलमित्यूचुः संगता वचः ॥ ४ ॥

तदनन्तर दशग्रीव रावणके वधकी अभिलाषा रखनेवाले ऋषियोंने मिलकर राजसिंह भरतसे तुरंत ही यह बात कही—॥ ४ ॥

> कुले जात महाप्राज्ञ महावृत्त महायशः ।  
> ग्राह्यं रामस्य वाक्यं ते पितरं यद्यवेक्षसे ॥ ५ ॥

‘महाप्राज्ञ ! तुम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हो । तुम्हारा आचरण बहुत उत्तम और यश महान् है । यदि तुम अपने पिताकी ओर देखो—उन्हें सुख पहुँचाना चाहो तो तुम्हें श्रीरामचन्द्रजीकी बात मान लेनी चाहिये ॥ ५ ॥

> सदानृणमिमं रामं वयमिच्छामहे पितुः ।  
> अनृणत्वाच्च कैकेय्याः स्वर्गं दशरथो गतः ॥ ६ ॥

‘हमलोग इन श्रीरामको पिताके ऋणसे सदा उऋण देखना चाहते हैं । कैकेयीका ऋण चुका देनेके कारण ही राजा दशरथ स्वर्गमें पहुँचे हैं’ ॥ ६ ॥

> एतावदुक्त्वा वचनं गन्धर्वाः समहर्षयः ।  
> राजर्षयश्चैव तथा सर्वे स्वां स्वां गतिं गताः ॥ ७ ॥

इतना कहकर वहाँ आये हुए गन्धर्व, महर्षि और राजर्षि सब अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ७ ॥

> ह्लादितस्तेन वाक्येन शुशुभे शुभदर्शनः।  
> रामः संहृष्टवदनस्तानृषीनभ्यपूजयत् ॥ ८ ॥

‘जिनके दर्शनसे जगत्का कल्याण हो जाता है, वे भगवान् श्रीराम महर्षियोंके वचनसे बहुत प्रसन्न हुए । उनका मुख हर्षोल्लाससे खिल उठा, इससे उनकी बड़ी शोभा हुई और उन्होंने उन महर्षियोंकी सादर प्रशंसा की ॥ ८ ॥

> त्रस्तगात्रस्तु भरतः स वाचा सज्जमानया ।  
> कृताञ्जलिरिदं वाक्यं राघवं पुनरब्रवीत् ॥ ९ ॥

परंतु भरतका सारा शरीर थर्रा उठा । वे लड़खड़ाती हुई जबानसे हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥ ९ ॥

> राम धर्ममिमं प्रेक्ष्य कुलधर्मानुसंततम् ।  
> कर्तुमर्हसि काकुत्स्थ मम मातुश्च याचनाम् ॥ १० ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! हमारे कुलधर्मसे सम्बन्ध रखनेवाला जो ज्येष्ठ पुत्रका राज्यग्रहण और प्रजापालनरूप धर्म है, उसकी ओर दृष्टि डालकर आप मेरी तथा माताकी याचना सफल कीजिये ॥ १० ॥

> रक्षितुं सुमहद् राज्यमहमेकस्तु नोत्सहे ।  
> पौरजानपदांश्चापि रक्तान् रञ्जयितुं तदा ॥ ११ ॥

‘मैं अकेला ही इस विशाल राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता तथा आपके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले इन पुरवासी तथा जनपदवासी लोगोंको भी आपके बिना प्रसन्न नहीं रख सकता ॥ ११ ॥

> ज्ञातयश्चापि योधाश्च मित्राणि सुहृदश्च नः ।  
> त्वामेव हि प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः ॥ १२ ॥

‘जैसे किसान मेघकी प्रतीक्षा करते रहते हैं, उसी प्रकार हमारे बन्धु-बान्धव, योद्धा, मित्र और सुहृद् सब लोग आपकी ही बाट जोहते हैं ॥ १२ ॥

> इदं राज्यं महाप्राज्ञ स्थापय प्रतिपद्य हि ।  
> शक्तिमान् स हि काकुत्स्थ लोकस्य परिपालने ॥ १३ ॥  
> एवमुक्त्वापतद् भ्रातुः पादयोर्भरतस्तदा ।  
> भृशं सम्प्रार्थयामास राघवेऽतिप्रियं वदन् ॥ १४ ॥

‘महाप्राज्ञ ! आप इस राज्यको स्वीकार करके दूसरे किसीको इसके पालनका भार सौंप दीजिये । वही पुरुष आपके प्रजावर्ग अथवा लोकका पालन करनेमें समर्थ हो सकता है, ॥ ऐसा कहकर भरत अपने भाईके चरणोंपर गिर पड़े । उस समय उन्होंने श्रीरघुनाथजीसे अत्यन्त प्रिय वचन बोलकर उनसे राज्यग्रहण करनेके लिये बड़ी प्रार्थना की ॥ १४ ॥

> तमङ्के भ्रातरं कृत्वा रामो वचनमब्रवीत् ।  
> श्यामं नलिनपत्राक्षं मत्तहंसस्वरः स्वयम् ॥ १५ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने श्यामवर्ण कमलनयन भाई भरतको उठाकर गोदमें बिठा लिया और मदमत्त हंसके समान मधुर स्वरमें स्वयं यह बात कही—॥ १५ ॥

> आगता त्वामियं बुद्धिः स्वजा वैनयिकी च या ।  
> भृशमुत्सहसे तात रक्षितुं पृथिवीमपि ॥ १६ ॥

‘तात ! तुम्हें जो यह स्वाभाविक विनयशील बुद्धि प्राप्त हुई है इस बुद्धिके द्वारा तुम समस्त भूमण्डलकी रक्षा करने-में भी पूर्णरूपसे समर्थ हो सकते हो ॥ १६ ॥

> अमात्यैश्च सुहृद्भिश्च बुद्धिमद्भिश्च मन्त्रिभिः ।  
> सर्वकार्याणि सम्मन्त्र्य महान्त्यपि हि कारय ॥ १७ ॥

‘इसके सिवा अमात्योँ, सुहृदों और बुद्धिमान् मन्त्रियोंसे सलाह लेकर उनके द्वारा सब कार्य, वे कितने ही बड़े क्यों न हों, करा लिया करो ॥ १७ ॥

> लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद् वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् ।  
> अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥ १८ ॥

‘चन्द्रमासे उसकी प्रभा अलग हो जाय, हिमालय हिमका परित्याग कर दे, अथवा समुद्र अपनी सीमाको लाँघकर आगे बढ़ जाय, किंतु मैं पिताकी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता ॥१८॥

> कामाद् वा तात लोभाद् वा मात्रा तुभ्यमिदं कृतम् ।  
> न तन्मनसि कर्तव्यं वर्तितव्यं च मातृवत् ॥ १९ ॥

‘तात ! माता कैकेयीने कामनासे अथवा लोभवश तुम्हारे लिये जो कुछ किया है, उसको मनमें न लाना और उसके प्रति सदा वैसा ही बर्ताव करना जैसा अपनी पूजनीया माताके प्रति करना उचित है’ ॥ १९ ॥

> एवं ब्रुवाणं भरतः कौसल्यासुतमब्रवीत् ।  
> तेजसाऽऽदित्यसंकाशं प्रतिपच्चन्द्रदर्शनम् ॥ २० ॥

जो सूर्यके समान तेजस्वी हैं तथा जिनका दर्शन प्रतिपदा ( द्वितीया ) के चन्द्रमाकी भाँति आह्लादजनक है, उन कौसल्यानन्दन श्रीरामके इस प्रकार कहनेपर भरत उनसे यों बोले—॥ २० ॥

> अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते ।  
> एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥ २१ ॥

‘आर्य ! ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके चरणोंमें अर्पित हैं, आप इनपर अपने चरण रखें । ये ही सम्पूर्ण जगत्के योगक्षेमका निर्वाह करेंगी’ ॥ २१ ॥

> सोऽधिरुह्य नरव्याघ्रः पादुके ह्यवमुच्य च ।  
> प्रायच्छत् सुमहातेजा भरताय महात्मने ॥ २२ ॥

तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्रीरामने उन पादुकाओंपर चढ़कर उन्हें फिर अलग कर दिया और महात्मा भरतको सौंप दिया ॥ २२ ॥

> स पादुके सम्प्रणम्य रामं वचनमब्रवीत् ।  
> चतुर्दश हि वर्षाणि जटाचीरधरो ह्यहम् ॥ २३ ॥  
> फलमूलाशनो वीर भवेयं रघुनन्दन।  
> तवागमनमाकाङ्क्षन् वसन् वै नगराद् बहिः ॥ २४ ॥  
> तव पादुकयोर्न्यस्य राज्यतन्त्रं परंतप।

उन पादुकाओंको प्रणाम करके भरतने श्रीरामसे कहा— ‘वीर रघुनन्दन ! मैं भी चौदह वर्षोंतक जटा और चीर धारण करके फल-मूलका भोजन करता हुआ आपके आगमनकी प्रतीक्षामें नगरसे बाहर ही रहूँगा। परंतप ! इतने दिनोंतक राज्यका सारा भार आपकी इन चरणपादुकाओंपर ही रखकर मैं आपकी बाट जोहता रहूँगा ॥ २३-२४½ ॥

> चतुर्दशे हि सम्पूर्णे वर्षेऽहनि रघूत्तम ॥ २५ ॥  
> न द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्।

‘रघुकुलशिरोमणे ! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर नूतन वर्षके प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आगमें प्रवेश कर जाऊँगा’ ॥ २५½ ॥

> तथेति च प्रतिज्ञाय तं परिष्वज्य सादरम् ॥ २६ ॥  
> शत्रुघ्नं च परिष्वज्य वचनं चेदमब्रवीत्।

श्रीरामचन्द्रजीने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वीकृति दे दी और बड़े आदरके साथ भरतको हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् शत्रुघ्नको भी छातीसे लगाकर यह बात कही—॥ २६½ ॥

> मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति ॥ २७ ॥  
> मया च सीतया चैव शप्तोऽसि रघुनन्दन।  
> इत्युक्त्वाश्रुपरीताक्षो भ्रातरं विससर्ज ह ॥ २८ ॥

‘रघुनन्दन ! मैं तुम्हें अपनी और सीताकी शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम माता कैकेयीकी रक्षा करना, उनके प्रति कभी क्रोध न करना’—इतना कहते-कहते उनकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। उन्होंने व्यथित हृदयसे भाई शत्रुघ्नको विदा किया ॥ २७-२८ ॥

> स पादुके ते भरतः स्वलंकृते  
> महोज्ज्वले सम्परिगृह्य धर्मवित्।  
> प्रदक्षिणं चैव चकार राघवं  
> चकार चैवोत्तमनागमूर्धनि ॥ २९ ॥

धर्मज्ञ भरतने भलीभाँति अलंकृत की हुई उन परम उज्ज्वल चरणपादुकाओंको लेकर श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की तथा उन पादुकाओंको राजाकी सवारीमें आनेवाले सर्वश्रेष्ठ गजराजके मस्तकपर स्थापित किया ॥ २९ ॥

> अथानुपूर्व्यां प्रतिपूज्य तं जनं  
> गुरूंश्च मन्त्रीन् प्रकृतीस्तथानुजौ।  
> व्यसर्जयद् राघववंशवर्धनः  
> स्थितः स्वधर्मे हिमवानिवाचलः ॥ ३० ॥

तदनन्तर अपने धर्ममें हिमालयकी भाँति अविचल भावसे स्थित रहनेवाले रघुवंशवर्धन श्रीरामने क्रमशः वहाँ आये हुए जनसमुदाय, गुरु, मन्त्री, प्रजा तथा दोनों भाइयोंका यथायोग्य सत्कार करके उन्हें विदा किया ॥ ३० ॥

> तं मातरो बाष्पगृहीतकण्ठ्यो  
> दुःखेन नामन्त्रयितुं हि शेकुः।  
> स चैव मातृरभिवाद्य सर्वा  
> रुदन् कुटीं स्वां प्रविवेश रामः ॥ ३१ ॥

उस समय कौसल्या आदि सभी माताओंका गला आँसुओंसे रुँध गया था। वे दुःखके कारण श्रीरामको सम्बोधित भी न कर सकीं। श्रीराम भी सब माताओंको प्रणाम करके रोते हुए अपनी कुटियामें चले गये ॥ ३१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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