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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 111"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 111

> वसिष्ठः स तदा राममुक्त्वा राजपुरोहितः।  
> अब्रवीद् धर्मसंयुक्तं पुनरेवापरं वचः ॥ १ ॥

उस समय राजपुरोहित वसिष्ठने पूर्वोक्त बातें कहकर पुनः श्रीरामसे दूसरी धर्मयुक्त बातें कहीं—॥ १ ॥

> पुरुषस्येह जातस्य भवन्ति गुरवः सदा।  
> आचार्यश्चैव काकुत्स्थ पिता माता च राघव ॥ २ ॥

‘रघुनन्दन ! ककुत्स्थकुलभूषण ! इस संसारमें उत्पन्न हुए पुरुषके सदा तीन गुरु होते हैं—आचार्य, पिता और माता ॥ २ ॥

> पिता होनं जनयति पुरुषं पुरुषर्षभ।  
> प्रज्ञां ददाति चाचार्यस्तस्मात् स गुरुरुच्यते ॥ ३ ॥

‘पुरुषप्रवर ! पिता पुरुषके शरीरको उत्पन्न करता है, इसलिये गुरु है और आचार्य उसे ज्ञान देता है, इसलिये गुरु कहलाता है ॥ ३ ॥

> स तेऽहं पितुराचार्यस्तव चैव परंतप।  
> मम त्वं वचनं कुर्वन् नातिवर्तेः सतां गतिम् ॥ ४ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुवीर ! मैं तुम्हारे पिताका और तुम्हारा भी आचार्य हूँ; अतः मेरी आज्ञाका पालन करनेसे तुम सत्पुरुषोंके पथका त्याग करनेवाले नहीं समझे जाओगे ॥ ४ ॥

> इमा हि ते परिषदो ज्ञातयश्च नृपास्तथा।  
> एषु तात चरन् धर्मं नातिवर्तेः सतां गतिम् ॥ ५ ॥

‘तात ! ये तुम्हारे सभासद्, बन्धु-बान्धव तथा सामन्त राजा पधारे हुए हैं, इनके प्रति धर्मानुकूल बर्ताव करनेसे भी तुम्हारे द्वारा सन्मार्गका उल्लङ्घन नहीं होगा ॥ ५ ॥

> वृद्धाया धर्मशीलाया मातुर्नार्हस्यवर्तितुम्।  
> अस्या हि वचनं कुर्वन् नातिवर्तेः सतां गतिम् ॥ ६ ॥

‘अपनी धर्मपरायणा बूढ़ी माताकी बात तो तुम्हें कभी टालनी ही नहीं चाहिये । इनकी आज्ञाका पालन करके तुम श्रेष्ठ पुरुषोंके आश्रयभूत धर्मका उल्लङ्घन करनेवाले नहीं माने जाओगे ॥ ६ ॥

> भरतस्य वचः कुर्वन् याचमानस्य राघव।  
> आत्मानं नातिवर्तेस्त्वं सत्यधर्मपराक्रम ॥ ७ ॥

‘सत्य, धर्म और पराक्रमसे सम्पन्न रघुनन्दन ! भरत अपने आत्मस्वरूप तुमसे राज्य ग्रहण करने और अयोध्या लौटनेकी प्रार्थना कर रहे हैं, उनकी बात मान लेनेसे भी तुम धर्मका उल्लङ्घन करनेवाले नहीं कहलाओगे’ ॥ ७ ॥

> एवं मधुरमुक्तः स गुरुणा राघवः स्वयम्।  
> प्रत्युवाच समासीनं वसिष्ठं पुरुषर्षभः ॥ ८ ॥

गुरु वसिष्ठने सुमधुर वचनोंमें जब इस प्रकार कहा, तब साक्षात् पुरुषोत्तम श्रीराघवेन्द्रने वहाँ बैठे हुए वसिष्ठजीको यों उत्तर दिया—॥ ८ ॥

> यन्मातापितरौ वृत्तं तनये कुरुतः सदा।  
> न सुप्रतिकरं तत् तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम् ॥ ९ ॥  
> यथाशक्तिप्रदानेन स्वापनोच्छादनेन च।  
> नित्यं च प्रियवादेन तथा संवर्धनेन च ॥ १० ॥

‘माता और पिता पुत्रके प्रति जो सर्वदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करते हैं, अपनी शक्तिके अनुसार उत्तम खाद्य पदार्थ देने, अच्छे बिछौनेपर सुलाने, उबटन आदि लगाने, सदा मीठी बातें बोलने तथा पालन-पोषण करने आदिके द्वारा माता और पिताने जो उपकार किया है, उसका बदला सहज ही नहीं चुकाया जा सकता ॥ ९-१० ॥

> स हि राजा दशरथः पिता जनयिता मम।  
> आज्ञापयन्मां यत् तस्य न तन्मिथ्या भविष्यति ॥ ११ ॥

‘अतः मेरे जन्मदाता पिता महाराज दशरथने मुझे जो आज्ञा दी है, वह मिथ्या नहीं होगी’ ॥ ११ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण भरतः प्रत्यनन्तरम्।  
> उवाच विपुलोरस्कः सूतं परमदुर्मनाः ॥ १२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर चौड़ी छातीवाले भरतजीका मन बहुत उदास हो गया। वे पास ही बैठे हुए सूत सुमन्त्रसे बोले—॥ १२ ॥

> इह तु स्थण्डिले शीघ्रं कुशानास्तर सारथे।  
> आर्य प्रत्युपवेक्ष्यामि यावन्मे सम्प्रसीदति ॥ १३ ॥  
> निराहारो निरालोको धनहीनो यथा द्विजः ।  
> शये पुरस्ताच्छालायां यावन्मां प्रतियास्यति ॥ १४ ॥

‘सारथे ! आप इस वेदीपर शीघ्र ही बहुत-से कुश बिछा दीजिये । जबतक आर्य मुझपर प्रसन्न नहीं होंगे, तबतक मैं यहीं इनके पास धरना दूँगा । जैसे साहूकार या महाजनके द्वारा निर्धन किया हुआ ब्राह्मण उसके घरके दरवाजेपर मुँह ढककर बिना खाये-पिये पड़ा रहता है, उसी प्रकार मैं भी उपवासपूर्वक मुखपर आवरण डालकर इस कुटियाके सामने लेट जाऊँगा । जबतक मेरी बात मानकर ये अयोध्याको नहीं लौटेंगे, तबतक मैं इसी तरह पड़ा रहूँगा’ ॥ १३-१४ ॥

> स तु राममवेक्षन्तं सुमन्त्रं प्रेक्ष्य दुर्मनाः ।  
> कुशोत्तरमुपस्थाप्य भूमावेवास्थितः स्वयम् ॥ १५ ॥

यह सुनकर सुमन्त्र श्रीरामचन्द्रजीका मुँह ताकने लगे । उन्हें इस अवस्थामें देख भरतके मनमें बड़ा दुःख हुआ और वे स्वयं ही कुशकी चटाई बिछाकर जमीनपर बैठ गये ॥ १५ ॥

> तमुवाच महातेजा रामो राजर्षिसत्तमः ।  
> किं मां भरत कुर्वाणं तात प्रत्युपवेक्ष्यसे ॥ १६ ॥

तब महातेजस्वी राजर्षिशिरोमणि श्रीरामने उनसे कहा—‘तात भरत ! मैं तुम्हारी क्या बुराई करता हूँ, जो मेरे आगे धरना दोगे ? ॥ १६ ॥

> ब्राह्मणो होकपार्श्वेन नरान् रोद्धुमिहार्हति ।  
> न तु मूर्धाभिषिक्तानां विधिः प्रत्युपवेशने ॥ १७ ॥  
> उत्तिष्ठ नरशार्दूल हित्वैतद् दारुणं व्रतम् ।  
> पुरवर्यामितः क्षिप्रमयोध्यां याहि राघव ॥ १८ ॥

‘ब्राह्मण एक करवटसे सोकर—धरना देकर मनुष्योंको अन्यायसे रोक सकता है, परंतु राजतिलक ग्रहण करनेवाले क्षत्रियोंके लिये इस प्रकार धरना देनेका विधान नहीं है ॥ ‘अतः नरश्रेष्ठ रघुनन्दन ! इस कठोर व्रतका परित्याग करके उठो और यहाँसे शीघ्र ही अयोध्यापुरीको जाओ’ ॥ १८ ॥

> आसीनस्त्वेव भरतः पौरजानपदं जनम् ।  
> उवाच सर्वतः प्रेक्ष्य किमार्यं नानुशासथ ॥ १९ ॥

यह सुनकर भरत वहाँ बैठे-बैठे ही सब ओर दृष्टि डालकर नगर और जनपदके लोगोंसे बोले—‘आपलोग भैयाको क्यों नहीं समझाते हैं ?’ ॥ १९ ॥

> ते तदोचुर्महात्मानं पौरजानपदा जनाः ।  
> काकुत्स्थमभिजानीमः सम्यग् वदति राघवः ॥ २० ॥

तब नगर और जनपदके लोग महात्मा भरतसे बोले— ‘हम जानते हैं, काकुत्स्थ श्रीरामचन्द्रजीके प्रति आप रघुकुलतिलक भरतजी ठीक ही कहते हैं ॥२०॥

> एषोऽपि हि महाभागः पितुर्वचसि तिष्ठति ।  
> अत एव न शक्ताः स्मो व्यावर्तयितुमञ्जसा ॥ २१ ॥

‘परंतु ये महाभाग श्रीरामचन्द्रजी भी पिताकी आज्ञाके पालनमें लगे हैं, इसलिये यह भी ठीक ही है । अतएव हम इन्हें सहसा उस ओरसे लौटानेमें असमर्थ हैं’ ॥ २१ ॥

> तेषामाज्ञाय वचनं रामो वचनमब्रवीत् ।  
> एवं निबोध वचनं सुहृदां धर्मचक्षुषाम् ॥ २२ ॥

उन पुरवासियोंके वचनका तात्पर्य समझकर श्रीरामने भरतसे कहा—‘भरत ! धर्मपर दृष्टि रखनेवाले सुहृदोंके इस कथनको सुनो और समझो ॥ २२ ॥

> एतच्चैवोभयं श्रुत्वा सम्यक् सम्पश्य राघव ।  
> उत्तिष्ठ त्वं महाबाहो मां च स्पृश तथोदकम् ॥ २३ ॥

‘रघुनन्दन ! मेरी और इनकी दोनों बातोंको सुनकर उनपर सम्यक् रूपसे विचार करो । महाबाहो ! अब शीघ्र उठो तथा मेरा और जलका स्पर्श करो’ ॥ २३ ॥

> अथोत्थाय जलं स्पृष्ट्वा भरतो वाक्यमब्रवीत् ।  
> शृण्वन्तु मे परिषदो मन्त्रिणः शृणुयुस्तथा ॥ २४ ॥  
> न याचे पितरं राज्यं नानुशासामि मातरम् ।  
> एवं परमधर्मज्ञं नानुजानामि राघवम् ॥ २५ ॥

यह सुनकर भरत उठकर खड़े हो गये और श्रीराम एवं जलका स्पर्श करके बोले—‘मेरे सभासद् और मन्त्री सब लोग सुनें—न तो मैंने पिताजीसे राज्य माँगा था और न मातासे ही कभी इसके लिये कुछ कहा था । साथ ही, परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीके वनवासमें भी मेरी कोई सम्मति नहीं है ॥ २४-२५ ॥

> यदि त्ववश्यं वस्तव्यं कर्तव्यं च पितुर्वचः ।  
> अहमेव निवत्स्यामि चतुर्दश वने समाः ॥ २६ ॥

‘फिर भी यदि इनके लिये पिताजीकी आज्ञाका पालन करना और वनमें रहना अनिवार्य है तो इनके बदले मैं ही चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करूँगा’ ॥ २६ ॥

> धर्मात्मा तस्य सत्येन भ्रातुर्वाक्येन विस्मितः ।  
> उवाच रामः सम्प्रेक्ष्य पौरजानपदं जनम् ॥ २७ ॥

भाई भरतकी इस सत्य बातसे धर्मात्मा श्रीरामको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने पुरवासी तथा राज्यनिवासी लोगोंकी ओर देखकर कहा—॥ २७ ॥

> विक्रीतमाहितं क्रीतं यत् पित्रा जीवता मम ।  
> न तल्लोपयितुं शक्यं मया वा भरतेन वा ॥ २८ ॥

‘पिताजीने अपने जीवनकालमें जो वस्तु बेंच दी है, या धरोहर रख दी है अथवा खरीदी है, उसे मैं अथवा भरत कोई भी पलट नहीं सकता ॥ २८ ॥

> उपाधिर्न मया कार्यों वनवासे जुगुप्सितः ।  
> युक्तमुक्तं च कैकेय्या पित्रा मे सुकृतं कृतम् ॥ २९ ॥

‘मुझे वनवासके लिये किसीको प्रतिनिधि नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि सामर्थ्य रहते हुए प्रतिनिधिसे काम लेना लोकमें निन्दित है । कैकेयीने उचित माँग ही प्रस्तुत की थी और मेरे पिताजीने उसे देकर पुण्य कर्म ही किया था ॥ २९ ॥

> जानामि भरतं क्षान्तं गुरुसत्कारकारिणम् ।  
> सर्वमेवात्र कल्याणं सत्यसंधे महात्मनि ॥ ३० ॥

‘मैं जानता हूँ, भरत बड़े क्षमाशील और गुरुजनोंका सत्कार करनेवाले हैं, इन सत्यप्रतिज्ञ महात्मामें सभी कल्याणकारी गुण मौजूद हैं ॥ ३० ॥

> अनेन धर्मशीलेन वनात् प्रत्यागतः पुनः ।  
> भ्रात्रा सह भविष्यामि पृथिव्याः पतिरुत्तमः ॥ ३१ ॥

‘चौदह वर्षोंकी अवधि पूरी करके जब मैं वनसे लौटूँगा, तब अपने इन धर्मशील भाईके साथ इस भूमण्डलका श्रेष्ठ राजा होऊँगा ॥ ३१ ॥

> वृतो राजा हि कैकेय्या मया तद्वचनं कृतम् ।  
> अनृतान्मोचयानेन पितरं तं महीपतिम् ॥ ३२ ॥

‘कैकेयीने राजासे वर माँगा और मैंने उसका पालन स्वीकार कर लिया; अतः भरत ! अब तुम मेरा कहना मानकर उस वरके पालनद्वारा अपने पिता महाराज दशरथको असत्यके बन्धनसे मुक्त करो’ ॥ ३२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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