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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 107"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 107

> पुनरेवं ब्रुवाणं तं भरतं लक्ष्मणाग्रजः ।  
> प्रत्युवाच ततः श्रीमाञ्ज्ञातिमध्ये सुसत्कृतः ॥ १ ॥  
> उपपन्नमिदं वाक्यं यस्त्वमेवमभाषथाः ।  
> जातः पुत्रो दशरथात् कैकेय्यां राजसत्तमात् ॥ २ ॥

जब भरत पुनः इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, तब कुटुम्बीजनोंके बीचमें सत्कारपूर्वक बैठे हुए लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीमान् रामचन्द्रजीने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ‘भाई ! तुम नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथके द्वारा केकयराज-कन्या माता कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो; अतः तुमने जो ऐसे उत्तम वचन कहे हैं, वे सर्वथा तुम्हारे योग्य हैं ॥ २ ॥

> पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्वहन् ।  
> मातामहे समाश्रौषीद् राज्यशुल्कमनुत्तमम् ॥ ३ ॥

‘भैया ! आजसे बहुत पहलेकी बात है—पिताजीका जब तुम्हारी माताजीके साथ विवाह हुआ था, तभी उन्होंने तुम्हारे नानासे कैकेयीके पुत्रको राज्य देनेकी उत्तम शर्त कर ली थी ॥ ३ ॥

> देवासुरे च संग्रामे जनन्यै तव पार्थिवः ।  
> सम्प्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधितः प्रभुः ॥ ४ ॥

‘इसके बाद देवासुर-संग्राममें तुम्हारी माताने प्रभावशाली महाराजकी बड़ी सेवा की; इससे संतुष्ट होकर राजाने उन्हें वरदान दिया ॥ ४ ॥

> ततः सा सम्प्रतिश्राव्य तव माता यशस्विनी ।  
> अयाचत नरश्रेष्ठं द्वौ वरौ वरवर्णिनी ॥ ५ ॥  
> तव राज्यें नरव्याघ्र मम प्रव्राजनं तथा ।  
> तच्च राजा तथा तस्यै नियुक्तः प्रददौ वरम् ॥ ६ ॥

‘उसीकी पूर्तिके लिये प्रतिज्ञा कराकर तुम्हारी श्रेष्ठ वर्णवाली यशस्विनी माताने उन नरश्रेष्ठ पिताजीसे दो वर माँगे ॥ ‘पुरुषसिंह ! एक वरके द्वारा इन्होंने तुम्हारे लिये राज्य माँगा और दूसरेके द्वारा मेरा वनवास । इनसे इस प्रकार प्रेरित होकर राजाने वे दोनों वर इन्हें दे दिये ॥ ६ ॥

> तेन पित्राहमप्यत्र नियुक्तः पुरुषर्षभ ।  
> चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वरदानिकम् ॥ ७ ॥

‘पुरुषप्रवर ! इस प्रकार उन पिताजीने वरदानके रूपमें मुझे चौदह वर्षोंतक वनवासकी आज्ञा दी है ॥ ७ ॥

> सोऽयं वनमिदं प्राप्तो निर्जनं लक्ष्मणान्वितः ।  
> सीतया चाप्रतिद्वन्द्वः सत्यवादे स्थितः पितुः ॥ ८ ॥

‘यही कारण है कि मैं सीता और लक्ष्मणके साथ इस निर्जन वनमें चला आया हूँ । यहाँ मेरा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है । मैं यहाँ पिताजीके सत्यकी रक्षामें स्थित रहूँगा ॥ ८ ॥

> भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादिनम् ।  
> कर्तुमर्हसि राजेन्द्र क्षिप्रमेवाभिषिञ्चनात् ॥ ९ ॥

‘राजेन्द्र ! तुम भी उनकी आज्ञा मानकर शीघ्र ही राज्यपदपर अपना अभिषेक करा लो और पिताको सत्यवादी बनाओ—यही तुम्हारे लिये उचित है ॥ ९ ॥

> ऋणान्मोचय राजानं मत्कृते भरत प्रभुम् ।  
> पितरं त्राहि धर्मज्ञ मातरं चाभिनन्दय ॥ १० ॥

‘धर्मज्ञ भरत ! तुम मेरे लिये पूज्य पिता राजा दशरथको कैकेयीके ऋणसे मुक्त करो, उन्हें नरकमें गिरनेसे बचाओ और माताका भी आनन्द बढ़ाओ ॥ १० ॥

> श्रूयते धीमता तात श्रुतिर्गीता यशस्विना ।  
> गयेन यजमानेन गयेष्वेव पितॄन् प्रति ॥ ११ ॥

‘तात ! सुना जाता है कि बुद्धिमान्, यशस्वी राजा गयने गय-देशमें ही यज्ञ करते हुए पितरोंके प्रति एक कहावत कही थी ॥ ११ ॥

> पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुतः ।  
> तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः पितॄन् यः पाति सर्वतः ॥ १२ ॥

‘( वह इस प्रकार है—) बेटा पुत् नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है, इसलिये वह पुत्र कहा गया है । वही पुत्र है, जो पितरोंकी सब ओरसे रक्षा करता है ॥ १२ ॥

> एष्टव्या बहवः पुत्रा गुणवन्तो बहुश्रुताः ।  
> तेषां वै समवेतानामपि कश्चिद् गयां व्रजेत् ॥ १३ ॥

‘बहुतसे गुणवान् और बहुश्रुत पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये । सम्भव है कि प्राप्त हुए उन पुत्रोंमेंसे कोई एक भी गयाकी यात्रा करे ? ॥ १३ ॥

> एवं राजर्षयः सर्वे प्रतीता रघुनन्दन ।  
> तस्मात् त्राहि नरश्रेष्ठ पितरं नरकात् प्रभो ॥ १४ ॥

‘रघुनन्दन ! नरश्रेष्ठ भरत ! इस प्रकार सभी राजर्षियोंने पितरोंके उद्धारका निश्चय किया है, अतः प्रभो ! तुम भी अपने पिताका नरकसे उद्धार करो ॥ १४ ॥

> अयोध्यां गच्छ भरत प्रकृतीरुपरञ्जय ।  
> शत्रुघ्नसहितो वीर सह सर्वैर्द्विजातिभिः ॥ १५ ॥

‘वीर भरत ! तुम शत्रुघ्न तथा समस्त ब्राह्मणोंको साथ लेकर अयोध्याको लौट जाओ और प्रजाको सुख दो ॥ १५ ॥

> प्रवेक्ष्ये दण्डकारण्यमहमप्यविलम्बयन् ।  
> आभ्यां तु सहितो वीर वैदेह्या लक्ष्मणेन च ॥ १६ ॥

‘वीर ! अब मैं भी लक्ष्मण और सीताके साथ शीघ्र ही दण्डकारण्यमें प्रवेश करूँगा ॥ १६ ॥

> त्वं राजा भरत भव स्वयं नराणां  
> वन्यानामहमपि राजराण्मृगाणाम् ।  
> गच्छ त्वं पुरवरमद्य सम्प्रहृष्टः  
> संहृष्टस्त्वहमपि दण्डकान् प्रवेक्ष्ये ॥ १७ ॥

‘भरत ! तुम स्वयं मनुष्योंके राजा बनो और मैं जंगली पशुओंका सम्राट् बनूँगा । अब तुम अत्यन्त हर्षपूर्वक श्रेष्ठ नगर अयोध्याको जाओ और मैं भी प्रसन्नतापूर्वक दण्डकवनमें प्रवेश करूँगा ॥ १७ ॥

> छायां ते दिनकरभाः प्रबाधमानं  
> वर्षत्रं भरत करोतु मूर्ध्नि शीताम् ।  
> एतेषामहमपि काननद्रुमाणां  
> छायां तामतिशयिनीं शनैः श्रयिष्ये ॥ १८ ॥

‘भरत ! सूर्यकी प्रभाको तिरोहित कर देनेवाला छत्र तुम्हारे मस्तकपर शीतल छाया करे । अब मैं भी धीरे-धीरे इन जंगली वृक्षोंकी घनी छायाका आश्रय लूँगा ॥ १८ ॥

> शत्रुघ्नस्त्वतुलमतिस्तु ते सहायः  
> सौमित्रिर्मम विदितः प्रधानमित्रम् ।  
> चत्वारस्तनयवरा वयं नरेन्द्रं  
> सत्यस्थं भरत चराम मा विषीद ॥ १९ ॥

‘भरत । अतुलित बुद्धिवाले शत्रुघ्न तुम्हारी सहायतामें रहें और सुविख्यात सुमित्राकुमार लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र ( सहायक ) हैं; हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथके सत्यकी रक्षा करें । तुम विषाद मत करो’ ॥ १९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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