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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 106"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 106

> एवमुक्त्वा तु विरते रामे वचनमर्थवत् ।  
> ततो मन्दाकिनीतीरे रामं प्रकृतिवत्सलम् ॥ १ ॥  
> उवाच भरतश्चित्रं धार्मिको धार्मिकं वचः ।  
> को हि स्यादीदृशो लोके यादृशस्त्वमरिंदम ॥ २ ॥

ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरतने मन्दाकिनीके तटपर प्रजा-वत्सल धर्मात्मा श्रीरामसे यह विचित्र बात कही—‘शत्रुदमन रघुवीर ! इस जगत्में जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है ? ॥ १-२ ॥

> न त्वां प्रव्यथयेद् दुःखं प्रीतिर्वा न प्रहर्षयेत् ।  
> सम्मतश्चापि वृद्धानां तांश्च पृच्छसि संशयान् ॥ ३ ॥

‘कोई भी दुःख आपको व्यथित नहीं कर सकता । कितनी ही प्रिय बात क्यों न हो, वह आपको हर्षोत्फुल्ल नहीं कर सकती । वृद्ध पुरुषोंके सम्माननीय होकर भी आप उनसे संदेहकी बातें पूछते हैं ॥ ३ ॥

> यथा मृतस्तथा जीवन् यथासति तथा सति ।  
> यस्यैष बुद्धिलाभः स्यात् परितप्येत केन सः ॥ ४ ॥

‘जैसे मरे हुए जीवका अपने शरीर आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार जीते-जी भी वह उनके सम्बन्धसे रहित है। जैसे वस्तुके अभावमें उसके प्रति राग-द्वेष नहीं होता, वैसे ही उसके रहनेपर भी मनुष्यको राग-द्वेषसे शून्य होना चाहिये । जिसे ऐसी विवेकयुक्त बुद्धि प्राप्त हो गयी है, उसको संताप क्यों होगा ? ॥ ४ ॥

> परावरज्ञो यश्च स्याद् यथा त्वं मनुजाधिप ।  
> स एव व्यसनं प्राप्य न विषीदितुमर्हति ॥ ५ ॥

‘नरेश्वर ! जिसे आपके समान आत्मा और अनात्माका ज्ञान है, वही संकटमें पड़नेपर भी विषाद नहीं कर सकता ॥ ५ ॥

> अमरोपमसत्त्वस्त्वं महात्मा सत्यसंगरः ।  
> सर्वज्ञः सर्वदर्शी च बुद्धिमांश्चासि राघव ॥ ६ ॥

‘रघुनन्दन ! आप देवताओंकी भाँति सत्त्वगुणसे सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सबके साक्षी और बुद्धिमान् हैं ॥ ६ ॥

> न त्वामेवंगुणैर्युक्तं प्रभवाभवकोविदम् ।  
> अविषह्यतमं दुःखमासादयितुमर्हति ॥ ७ ॥

‘ऐसे उत्तम गुणोंसे युक्त और जन्म-मरणके रहस्यको जाननेवाले आपके पास असह्य दुःख नहीं आ सकता ॥ ७ ॥

> प्रोषिते मयि यत् पापं मात्रा मत्कारणात् कृतम् ।  
> क्षुद्रया तदनिष्टं मे प्रसीदतु भवान् मम ॥ ८ ॥

‘जब मैं परदेशमें था, उस समय नीच विचार रखनेवाली मेरी माताने मेरे लिये जो पाप कर डाला, वह मुझे अभीष्ट नहीं है; अतः आप उसे क्षमा करके मुझपर प्रसन्न हों ॥ ८ ॥

> धर्मबन्धेन बद्धोऽस्मि तेनेमां नेह मातरम् ।  
> हन्मि तीव्रेण दण्डेन दण्डार्हां पापकारिणीम् ॥ ९ ॥

‘मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हूँ, इसीलिये इस पाप करनेवाली एवं दण्डनीय माताको मैं कठोर दण्ड देकर मार नहीं डालता ॥ ९ ॥

> कथं दशरथाज्जातः शुभाभिजनकर्मणः ।  
> जानन् धर्ममधर्मं च कुर्यां कर्म जुगुप्सितम् ॥ १० ॥

‘जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथसे उत्पन्न होकर धर्म और अधर्मको जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ ? ॥ १० ॥

> गुरुः क्रियावान् वृद्धश्च राजा प्रेतः पितेति च ।  
> तातं न परिगर्हेऽहं दैवतं चेति संसदि ॥ ११ ॥

‘महाराज मेरे गुरु, श्रेष्ठ यज्ञकर्म करनेवाले, बड़े-बूढ़े, राजा, पिता और देवता रहे हैं और इस समय परलोकवासी हो चुके हैं, इसीलिये इस भरी सभामें मैं उनकी निन्दा नहीं करता हूँ ॥ ११ ॥

> को हि धर्मार्थयोर्हीनमीदृशं कर्म किल्बिषम् ।  
> स्त्रियः प्रियचिकीर्षुः सन् कुर्याद् धर्मज्ञ धर्मवित् ॥ १२ ॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन ! कौन ऐसा मनुष्य है, जो धर्मको जानते हुए भी स्त्रीका प्रिय करनेकी इच्छासे ऐसा धर्म और अर्थसे हीन कुत्सित कर्म कर सकता है ? ॥ १२ ॥

> अन्तकाले हि भूतानि मुह्यन्तीति पुरा श्रुतिः ।  
> राज्ञैवं कुर्वता लोके प्रत्यक्षा सा श्रुतिः कृता ॥ १३ ॥

‘लोकमें एक प्राचीन किंवदन्ती है कि अन्तकालमें सब प्राणी मोहित हो जाते हैं—उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। राजा दशरथने ऐसा कठोर कर्म करके उस किंवदन्तीकी सत्यताको प्रत्यक्ष कर दिखाया ॥ १३ ॥

> साध्वर्थमभिसंधाय क्रोधान्मोहाच्च साहसात् ।  
> तातस्य यदतिकान्तं प्रत्याहरतु तद् भवान् ॥ १४ ॥

‘पिताजीने क्रोध, मोह और साहसके कारण ठीक समझ कर जो धर्मका उल्लङ्घन किया है, उसे आप पलट दें-उसका संशोधन कर दें ॥ १४ ॥

> पितुर्हि समतिक्रान्तं पुत्रो यः साधु मन्यते ।  
> तदपत्यं मतं लोके विपरीतमतोऽन्यथा ॥ १५ ॥

‘जो पुत्र पिताकी की हुई भूलको ठीक कर देता है, वही लोकमें उत्तम संतान माना गया है। जो इसके विपरीत बर्ताव करता है, वह पिताकी श्रेष्ठ संतति नहीं है ॥ १५ ॥

> तदपत्यं भवानस्तु मा भवान् दुष्कृतं पितुः ।  
> अति यत् तत् कृतं कर्म लोके धीरविगर्हितम् ॥ १६ ॥

‘अतः आप पिताकी योग्य संतान ही बने रहें। उनके अनुचित कर्मका समर्थन न करें । उन्होंने इस समय जो कुछ किया है, वह धर्मकी सीमासे बाहर है । संसारमें धीर पुरुष उसकी निन्दा करते हैं ॥ १६ ॥

> कैकेयीं मां च तातं च सुहृदो बान्धवांश्च नः ।  
> पौरजानपदान् सर्वांस्त्रातुं सर्वमिदं भवान् ॥ १७ ॥

‘कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गण, बन्धु-बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्रकी प्रजा—इन सबकी रक्षाके लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें ॥ १७ ॥

> क चारण्यं क च क्षात्रं क जटाः क च पालनम् ।  
> ईदृशं व्याहतं कर्म न भवान् कर्तुमर्हति ॥ १८ ॥

‘कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म ? कहाँ जटा-धारण और कहाँ प्रजाका पालन ? ऐसे परस्परविरोधी कर्म आपको नहीं करने चाहिये ॥ १८ ॥

> एष हि प्रथमो धर्मः क्षत्रियस्याभिषेचनम् ।  
> येन शक्यं महाप्राज्ञ प्रजानां परिपालनम् ॥ १९ ॥

‘महाप्राज्ञ ! क्षत्रियके लिये पहला धर्म यही है कि उसका राज्यपर अभिषेक हो, जिससे वह प्रजाका भलीभाँति पालन कर सके ॥ १९ ॥

> कश्च प्रत्यक्षमुत्सृज्य संशयस्थमलक्षणम् ।  
> आयतिस्थं चरेद् धर्मं क्षत्रबन्धुरनिश्चितम् ॥ २० ॥

‘भला कौन ऐसा क्षत्रिय होगा, जो प्रत्यक्ष सुखके साधनभूत प्रजापालनरूप धर्मका परित्याग करके संशयमें स्थित, सुखके लक्षणसे रहित, भविष्यमें फल देनेवाले अनिश्चित धर्मका आचरण करेगा ? ॥ २० ॥

> अथ क्लेशजमेव त्वं धर्मं चरितुमिच्छसि ।  
> धर्मेण चतुरो वर्णान् पालयन् क्लेशमाप्नुहि ॥ २१ ॥

‘यदि आप क्लेशसाध्य धर्मका ही आचरण करना चाहते हैं तो धर्मानुसार चारों वर्णोंका पालन करते हुए ही कष्ट उठाइये ॥ २१ ॥

> चतुर्णामाश्रमाणां हि गार्हस्थ्यं श्रेष्ठमुत्तमम् ।  
> आहुर्धर्मज्ञ धर्मज्ञास्तं कथं त्यक्तुमिच्छसि ॥ २२ ॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन ! धर्मके ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमोंमें गार्हस्थ्यको ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं ? ॥ २२ ॥

> श्रुतेन बालः स्थानेन जन्मना भवतो ह्यहम् ।  
> स कथं पालयिष्यामि भूमिं भवति तिष्ठति ॥ २३ ॥

‘मैं शास्त्रज्ञान और जन्मजात अवस्था दोनों ही दृष्टियोंसे आपकी अपेक्षा बालक हूँ, फिर आपके रहते हुए मैं वसुधाका पालन कैसे करूँगा ? ॥ २३ ॥

> हीनबुद्धिगुणो बालो हीनस्थानेन चाप्यहम् ।  
> भवता च विनाभूतो न वर्तयितुमुत्सहे ॥ २४ ॥

‘मैं बुद्धि और गुण दोनोंसे हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अतः मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता; राज्यका पालन तो दूरकी बात है ॥ २४ ॥

> इदं निखिलमप्यग्र्यं राज्यं पित्र्यमकण्टकम् ।  
> अनुशाधि स्वधर्मेण धर्मज्ञ सह बान्धवैः ॥ २५ ॥

‘धर्मज्ञ रघुनन्दन ! पिताका यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अतः आप बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये ॥ २५ ॥

> इहैव त्वाभिषिञ्चन्तु सर्वाः प्रकृतयः सह ।  
> ऋत्विजः सवसिष्ठाश्च मन्त्रविन्मन्त्रकोविदाः ॥ २६ ॥

‘मन्त्रज्ञ रघुवीर ! मन्त्रोंके ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ आदि सभी ऋत्विज तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं। ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें ॥ २६ ॥

> अभिषिक्तस्त्वमस्माभिरयोध्यां पालने व्रज ।  
> विजित्य तरसा लोकान् मरुद्भिरिव वासवः ॥ २७ ॥

‘हमलोगोंके द्वारा अभिषिक्त होकर आप मरुद्गणोंसे अभिषिक्त हुए इन्द्रकी भाँति वेगपूर्वक सब लोकोंको जीतकर प्रजाका पालन करनेके लिये अयोध्याको चलें ॥ २७ ॥

> ऋणानि त्रीण्यपाकुर्वन् दुर्हृदः साधु निर्दहन् ।  
> सुहृदस्तर्पयन् कामैस्त्वमेवात्रानुशाधि माम् ॥ २८ ॥

‘वहाँ देवता, ऋषि और पितरोंका ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओंका भलीभाँति दमन करें तथा मित्रोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंद्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्यामें मुझे धर्मकी शिक्षा देते रहें ॥ २८ ॥

> अद्यार्य मुदिताः सन्तु सुहृदस्तेऽभिषेचने ।  
> अद्य भीताः पलायन्तु दुष्प्रदास्ते दिशो दश ॥२९॥

‘आर्य ! आपका अभिषेक सम्पन्न होनेपर सुहृद्गण प्रसन्न हों और दुःख देनेवाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओंमें भाग जायँ ॥ २९ ॥

> आक्रोशं मम मातुश्च प्रमृज्य पुरुषर्षभ ।  
> अद्य तत्रभवन्तं च पितरं रक्ष किल्बिषात् ॥ ३० ॥

‘पुरुषप्रवर ! आज आप मेरी माताके कलङ्कको घो-पोंछकर पूज्य पिताजीको भी निन्दासे बचाइये ॥ ३० ॥

> शिरसा त्वाभियाचेऽहं कुरुष्व करुणां मयि ।  
> बान्धवेषु च सर्वेषु भूतेष्विव महेश्वरः ॥ ३१ ॥

‘मैं आपके चरणोंमें माथा टेककर याचना करता हूँ । आप मुझपर दया कीजिये । जैसे महादेवजी सब प्राणियोंपर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु-बान्धवोंपर कृपा कीजिये ॥ ३१ ॥

> अथवा पृष्ठतः कृत्वा वनमेव भवानितः ।  
> गमिष्यति गमिष्यामि भवता सार्धमप्यहम् ॥ ३२ ॥

‘अथवा यदि आप मेरी प्रार्थनाको ठुकराकर यहाँसे वनको ही जायँगे तो मैं भी आपके साथ जाऊँगा’ ॥ ३२ ॥

> तथाभिरामो भरतेन ताम्यता  
> प्रसाद्यमानः शिरसा महीपतिः ।  
> न चैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान्  
> मतिं पितुस्तद् वचने प्रतिष्ठितः ॥ ३३ ॥

ग्लानिमें पड़े हुए भरतने मनोभिराम राजा श्रीरामको उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रसन्न करनेकी चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुणसम्पन्न रघुनाथजीने पिताकी आज्ञामें ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या जानेका विचार नहीं किया ॥ ३३ ॥

> तदद्भुतं स्थैर्यमवेक्ष्य राघवे  
> समं जनो हर्षमवाप दुःखितः ।  
> न यात्ययोध्यामिति दुःखितोऽभवत्  
> स्थिरप्रतिज्ञत्वमवेक्ष्य हर्षितः ॥ ३४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी वह अद्भुत दृढ़ता देखकर सब लोग एक ही साथ दुखी भी हुए और हर्षको भी प्राप्त हुए । ये अयोध्या नहीं जा रहे हैं—यह सोचकर वे दुखी हुए और प्रतिज्ञा-पालनमें उनकी दृढ़ता देखकर उन्हें हर्ष हुआ ॥ ३४ ॥

> तमृत्विजो नैगमयूथवल्लभा-  
> स्तथा विसंज्ञाश्रुकलाश्च मातरः ।  
> तथा ब्रुवाणं भरतं प्रतुष्टुवुः  
> प्रणम्य रामं च ययाचिरे सह ॥३५॥

उस समय ऋत्विज, पुरवासी, भिन्न-भिन्न समुदायके नेता और माताएँ अचेत-सी होकर आँसू बहाती हुई पूर्वोक्त बातें कहनेवाले भरतकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजीके सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या लौट चलनेकी याचना की ॥ ३५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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