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title: "अयोध्याकाण्ड, Sarga 105"
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# अयोध्याकाण्ड, Sarga 105

> ततः पुरुषसिंहानां वृतानां तैः सुहृद्गणैः ।  
> शोचतामेव रजनी दुःखेन व्यत्यवर्तत ॥ १ ॥  
> रजन्यां सुप्रभातायां भ्रातरस्ते सुहृद्वृताः ।  
> मन्दाकिन्यां हुतं जप्यं कृत्वा राममुपागमन् ॥ २ ॥

अपने सुहृदोंसे घिरकर बैठे हुए पुरुषसिंह श्रीराम आदि भाइयोंकी वह रात्रि पिताकी मृत्युके दुःखसे शोक करते हुए ही व्यतीत हुई । सबेरा होनेपर भरत आदि तीनों भाई सुहृदोंके साथ ही मन्दाकिनीके तटपर गये और स्नान, होम एवं जप आदि करके पुनः श्रीरामके पास लौट आये ॥ १-२ ॥

> तूष्णीं ते समुपासीना न कश्चित् किंचिदब्रवीत् ।  
> भरतस्तु सुहृन्मध्ये रामं वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥

वहाँ आकर सभी चुपचाप बैठ गये । कोई कुछ नहीं बोल रहा था । तब सुहृदोंके बीचमें बैठे हुए भरतने श्रीरामसे इस प्रकार कहा—॥ ३ ॥

> सान्त्विता मामिका माता दत्तं राज्यमिदं मम ।  
> तद् ददामि तवैवाहं भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम् ॥ ४ ॥

‘भैया ! पिताजीने वरदान देकर मेरी माताको संतुष्ट कर दिया और माताने यह राज्य मुझे दे दिया । अब मैं अपनी ओरसे यह अकण्टक राज्य आपकी ही सेवामें समर्पित करता हूँ । आप इसका पालन एवं उपभोग कीजिये ॥ ४ ॥

> महतेवाम्बुवेगेन भिन्नः सेतुर्जलागमे ।  
> दुरावरं त्वदन्येन राज्यखण्डमिदं महत् ॥ ५ ॥

‘वर्षाकालमें जलके महान् वेगसे टूटे हुए सेतुकी भाँति इस विशाल राज्यखण्डको सँभालना आपके सिवा दूसरेके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ ५ ॥

> गतिं खर इवाश्वस्य तार्क्ष्यस्येव पतत्त्रिणः ।  
> अनुगन्तुं न शक्तिर्मे गतिं तव महीपते ॥ ६ ॥

‘पृथ्वीनाथ ! जैसे गदहा घोड़ेकी और अन्य साधारण पक्षी गरुड़की चाल नहीं चल सकते, उसी प्रकार मुझमें आपकी गतिका—आपकी पालन-पद्धतिका अनुसरण करनेकी शक्ति नहीं है ॥ ६ ॥

> सुजीवं नित्यशस्तस्य यः परैरुपजीव्यते ।  
> राम तेन तु दुर्जीवं यः परानुपजीवति ॥ ७ ॥

‘श्रीराम ! जिसके पास आकर दूसरे लोग जीवन-निर्वाह करते हैं, उसीका जीवन उत्तम है और जो दूसरोंका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करता है, उसका जीवन दुःखमय है ( अतः आपके लिये राज्य करना ही उचित है ) ॥ ७ ॥

> यथा तु रोपितो वृक्षः पुरुषेण विवर्धितः ।  
> ह्रस्वकेन दुरारोहो रूढस्कन्धो महाद्रुमः ॥ ८ ॥  
> स यदा पुष्पितो भूत्वा फलानि न विदर्शयेत् ।  
> सतां नानुभवेत् प्रीतिं यस्य हेतोः प्ररोपितः ॥ ९ ॥  
> एषोपमा महाबाहो तदर्थं वेत्तुमर्हसि ।  
> यत्र त्वमस्मान् वृषभो भर्ता भृत्यान् न शाधि हि ॥ १० ॥

‘जैसे फलकी इच्छा रखनेवाले किसी पुरुषने एक वृक्ष लगाया, उसे पाल-पोसकर बड़ा किया; फिर उसके तने मोटे हो गये और वह ऐसा विशाल वृक्ष हो गया कि किसी नाटे कदके पुरुषके लिये उसपर चढ़ना अत्यन्त कठिन था । उस वृक्षमें जब फूल लग जायँ, उसके बाद भी यदि वह फल न दिखा सके तो जिसके लिये उस वृक्षको लगाया गया था, वह उद्देश्य पूरा न हो सका । ऐसी स्थितिमें उसे लगानेवाला पुरुष उस प्रसन्नताका अनुभव नहीं करता, जो फलकी प्राप्ति होनेसे सम्भावित थी । महाबाहो ! यह एक उपमा है, इसका अर्थ आप स्वयं समझ लें ( अर्थात् पिताजीने आप-जैसे सर्वसद्गुणसम्पन्न पुत्रको लोकरक्षाके लिये उत्पन्न किया था । यदि आपने राज्यपालनका भार अपने हाथमें नहीं लिया तो उनका वह उद्देश्य व्यर्थ हो जायगा ) । इस राज्यपालनके अवसरपर आप श्रेष्ठ एवं भरण-पोषणमें समर्थ होकर भी यदि हम भृत्योंका शासन नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त उपमा ही आपके लिये लागू होगी ॥ ८–१० ॥

> श्रेणयस्त्वां महाराज पश्यन्त्वग्र्याश्च सर्वशः ।  
> प्रतपन्तमिवादित्यं राज्यस्थितमरिंदमम् ॥ ११ ॥

‘महाराज ! विभिन्न जातियोंके सङ्घ और प्रधान-प्रधान पुरुष आप शत्रुदमन नरेशको सब ओर तपते हुए सूर्यकी भाँति राज्यसिंहासनपर विराजमान देखें ॥ ११ ॥

> तथानुयाने काकुत्स्थ मत्ता नर्दन्तु कुञ्जराः ।  
> अन्तःपुरगता नार्यो नन्दन्तु सुसमाहिताः ॥ १२ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण ! इस प्रकार आपके अयोध्याको लौटते समय मतवाले हाथी गर्जना करें और अन्तःपुरकी स्त्रियाँ एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नतापूर्वक आपका अभिनन्दन करें’ ॥ १२ ॥

> तस्य साध्वनुमन्यन्त नागरा विविधा जनाः ।  
> भरतस्य वचः श्रुत्वा रामं प्रत्यनुयाचतः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीरामसे राज्य-ग्रहणके लिये प्रार्थना करते हुए भरतजीकी बात सुनकर नगरके भिन्न-भिन्न मनुष्योंने उसका भलीभाँति अनुमोदन किया ॥ १३ ॥

> तमेवं दुःखितं प्रेक्ष्य विलपन्तं यशस्विनम् ।  
> रामः कृतात्मा भरतं समाश्वासयदात्मवान् ॥ १४ ॥

तब शिक्षित बुद्धिवाले अत्यन्त धीर भगवान् श्रीरामने यशस्वी भरतको इस तरह दुखी हो विलाप करते देख उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—॥ १४ ॥

> नात्मनः कामकारो हि पुरुषोऽयमनीश्वरः ।  
> इतश्चेतरतश्चैनं कृतान्तः परिकर्षति ॥ १५ ॥

‘भाई ! यह जीव ईश्वरके समान स्वतन्त्र नहीं है, अतः कोई यहाँ अपनी इच्छाके अनुसार कुछ नहीं कर सकता । काल इस पुरुषको इधर-उधर खींचता रहता है ॥ १५ ॥

> सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः।  
> संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥ १६ ॥

‘समस्त संग्रहोंका अन्त विनाश है । लौकिक उन्नतियोंका अन्त पतन है । संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है ॥ १६ ॥

> यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद् भयम् ।  
> एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद् भयम् ॥ १७ ॥

‘जैसे पके हुए फलोंको पतनके सिवा और किसीसे भय नहीं है, उसी प्रकार उत्पन्न हुए मनुष्यको मृत्युके सिवा और किसीसे भय नहीं है ॥ १७ ॥

> यथाऽऽगारं दृढस्थूणं जीर्णं भूत्वोपसीदति ।  
> तथावसीदन्ति नरा जरामृत्युवशंगताः ॥ १८ ॥

‘जैसे सुदृढ़ खम्भेवाला मकान भी पुराना होनेपर गिर जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जरा और मृत्युके वशमें पड़कर नष्ट हो जाते हैं ॥ १८ ॥

> अत्येति रजनी या तु सा न प्रतिनिवर्तते ।  
> यात्येव यमुना पूर्णं समुद्रमुदकार्णवम् ॥ १९ ॥

‘जो रात बीत जाती है, वह लौटकर फिर नहीं आती है । जैसे यमुना जलसे भरे हुए समुद्रकी ओर जाती ही है, उधरसे लौटती नहीं ॥ १९ ॥

> अहोरात्राणि गच्छन्ति सर्वेषां प्राणिनामिह ।  
> आयूंषि क्षपयन्त्याशु ग्रीष्मे जलमिवांशवः ॥ २० ॥

‘दिन-रात लगातार बीत रहे हैं और इस संसारमें सभी प्राणियोंकी आयुका तीव्र गतिसे नाश कर रहे हैं । ठीक वैसे ही जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म ऋतुमें जलको शीघ्रतापूर्वक सोखती रहती हैं ॥ २० ॥

> आत्मानमनुशोच त्वं किमन्यमनुशोचसि ।  
> आयुस्तु हीयते यस्य स्थितस्यास्य गतस्य च॥ २१ ॥

‘तुम अपने ही लिये चिन्ता करो, दूसरेके लिये क्यों बार-बार शोक करते हो । कोई इस लोकमें स्थित हो या अन्यत्र गया हो, जिस किसीकी भी आयु तो निरन्तर क्षीण ही हो रही है ॥ २१ ॥

> सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति ।  
> गत्वा सुदीर्घमध्वानं सह मृत्युर्निवर्तते ॥ २२ ॥

‘मृत्यु साथ ही चलती है, साथ ही बैठती है और बहुत बड़े मार्गकी यात्रामें भी साथ ही जाकर वह मनुष्यके साथ ही लौटती है ॥ २२ ॥

> गात्रेषु वलयः प्राप्ताः श्वेताश्चैव शिरोरुहाः ।  
> जरया पुरुषो जीर्णः किंहि कृत्वा प्रभावयेत् ॥ २३ ॥  
> नन्दन्त्युदित आदित्ये नन्दन्त्यस्तमितेऽहनि ।  
> आत्मनो नावबुध्यन्ते मनुष्या जीवितक्षयम् ॥ २४ ॥

‘शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं, सिरके बाल सफेद हो गये । फिर जरावस्थासे जीर्ण हुआ मनुष्य कौन-सा उपाय करके मृत्युसे बचनेके लिये अपना प्रभाव प्रकट कर सकता है ?॥ ‘लोग सूर्योदय होनेपर प्रसन्न होते हैं, सूर्यास्त होनेपर भी खुश होते हैं; किंतु यह नहीं जानते कि प्रतिदिन अपने जीवनका नाश हो रहा है ॥ २४ ॥

> हृष्यन्त्यृतुमुखं दृष्ट्वा नवं नवमिवागतम् ।  
> ऋतूनां परिवर्तेन प्राणिनां प्राणसंक्षयः ॥ २५ ॥

‘किसी ऋतुका प्रारम्भ देखकर मानो वह नयी-नयी आयी हो ( पहले कभी आयी ही न हो ) ऐसा समझकर लोग हर्षसे खिल उठते हैं, परंतु यह नहीं जानते कि इन ऋतुओंके परिवर्तनसे प्राणियोंके प्राणोंका ( आयुका ) क्रमशः क्षय हो रहा है ॥ २५ ॥

> यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे ।  
> समेत्य तु व्यपेयातां कालमासाद्य कंचन ॥ २६ ॥  
> एवं भार्याश्च पुत्राश्च ज्ञातयश्च वसूनि च ।  
> समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो ह्येषां विनाभवः ॥ २७ ॥

‘जैसे महासागरमें बहते हुए दो काठ कभी एक दूसरेसे मिल जाते हैं और कुछ कालके बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं; क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है ॥ २६-२७ ॥

> नात्र कश्चिद् यथाभावं प्राणी समतिवर्तते ।  
> तेन तस्मिन् न सामर्थ्यं प्रेतस्यास्त्यनुशोचतः ॥ २८ ॥

‘इस संसारमें कोई भी प्राणी यथासमय प्राप्त होनेवाले जन्म-मरणका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । इसलिये जो किसी मरे हुए व्यक्तिके लिये बारंबार शोक करता है, उसमें भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी ही मृत्युको टाल सके ॥ २८ ॥

> यथा हि सार्थं गच्छन्तं ब्रूयात् कश्चित् पथि स्थितः।  
> अहमप्यागमिष्यामि पृष्ठतो भवतामिति ॥ २९ ॥  
> एवं पूर्वैर्गतो मार्गः पैतृपितामहैर्ध्रुवः ।  
> तमापन्नः कथं शोचेद् यस्य नास्ति व्यतिक्रमः ॥ ३० ॥

‘जैसे आगे जाते हुए यात्रियों अथवा व्यापारियोंके समुदायसे रास्तेमें खड़ा हुआ पथिक यों कहे कि मैं भी आप लोगोंके पीछे-पीछे आऊँगा और तदनुसार वह उनके पीछे-पीछे जाय, उसी प्रकार हमारे पूर्वज पिता-पितामह आदि जिस मार्गसे गये हैं, जिसपर जाना अनिवार्य है तथा जिससे बचनेका कोई उपाय नहीं है, उसी मार्गपर स्थित हुआ मनुष्य किसी औरके लिये शोक कैसे करे ?॥ २९-३० ॥

> वयसः पतमानस्य स्रोतसो वानिवर्तिनः ।  
> आत्मा सुखे नियोक्तव्यः सुखभाजः प्रजाः स्मृताः॥३१॥

‘जैसे नदियोंका प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार दिन-दिन ढलती हुई अवस्था फिर नहीं लौटती है । उसका क्रमशः नाश हो रहा है, यह सोचकर आत्माको कल्याणके साधनभूत धर्ममें लगावे; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं ॥ ३१ ॥

> धर्मात्मा सुशुभैः कृत्स्नैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ।  
> धूतपापो गतः स्वर्गं पिता नः पृथिवीपतिः ॥ ३२ ॥

‘तात ! हमारे पिता धर्मात्मा थे । उन्होंने पर्याप्त दक्षिणाएँ देकर प्रायः सभी परम शुभकारक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था । उनके सारे पाप धुल गये थे । अतः वे महाराज स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ३२ ॥

> भृत्यानां भरणात् सम्यक् प्रजानां परिपालनात् ।  
> अर्थादानाच्च धर्मेण पिता नस्त्रिदिवं गतः ॥ ३३ ॥

‘वे भरण-पोषणके योग्य परिजनोंका भरण करते थे । प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन करते थे और प्रजाजनोंसे धर्मके अनुसार कर आदिके रूपमें धन लेते थे—इन सब कारणोंसे हमारे पिता उत्तम स्वर्गलोकमें पधारे हैं ॥ ३३ ॥

> कर्मभिस्तु शुभैरिष्टैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ।  
> स्वर्गं दशरथः प्राप्तः पिता नः पृथिवीपतिः ॥ ३४ ॥

‘सर्वप्रिय शुभ कर्मों तथा प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंके अनुष्ठानोंसे हमारे पिता पृथ्वीपति महाराज दशरथ स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ३४ ॥

> इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्भोगांश्चावाप्य पुष्कलान् ।  
> उत्तमं चायुरासाद्य स्वर्गतः पृथिवीपतिः ॥ ३५ ॥

‘उन्होंने नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा यज्ञपुरुषकी आराधना की, प्रचुर भोग प्राप्त किये और उत्तम आयु पायी थी, इसके बाद वे महाराज यहाँसे स्वर्गलोकको पधारे हैं ॥ ३५ ॥

> आयुरुत्तममासाद्य भोगानपि च राघवः ।  
> न स शोच्यः पिता तात स्वर्गतः सत्कृतः सताम् ॥ ३६ ॥

‘तात ! अन्य राजाओंकी अपेक्षा उत्तम आयु और श्रेष्ठ भोगोंको पाकर हमारे पिता सदा सत्पुरुषोंके द्वारा सम्मानित हुए हैं; अतः स्वर्गवासी हो जानेपर भी वे शोक करनेयोग्य नहीं हैं ॥ ३६ ॥

> स जीर्णमानुषं देहं परित्यज्य पिता हि नः ।  
> दैवीमृद्धिमनुप्राप्तो ब्रह्मलोकविहारिणीम् ॥ ३७ ॥  
> तं तु नैवंविधः कश्चित् प्राज्ञः शोचितुमर्हसि ।  
> त्वद्विधो मद्विधश्चापि श्रुतवान् बुद्धिमत्तरः ॥ ३८ ॥

‘हमारे पिताने जराजीर्ण मानव-शरीरका परित्याग करके दैवी सम्पत्ति प्राप्त की है, जो ब्रह्मलोकमें विहार करानेवाली है॥ ‘कोई भी ऐसा विद्वान्, जो तुम्हारे और मेरे समान शास्त्रज्ञान-सम्पन्न एवं परम बुद्धिमान् है, पिताजीके लिये शोक नहीं कर सकता ॥ ३८ ॥

> एते बहुविधाः शोका विलापरुदिते तदा ।  
> वर्जनीया हि धीरेण सर्वावस्थासु धीमता ॥ ३९ ॥

‘धीर एवं प्रज्ञावान् पुरुषको सभी अवस्थाओंमें ये नाना प्रकारके शोक, विलाप तथा रोदन त्याग देने चाहिये ॥ ३९ ॥

> स स्वस्थो भव मा शोको यात्वा चावस तां पुरीम् ।  
> तथा पित्रा नियुक्तोऽसि वशिना वदतां वर ॥ ४० ॥

‘इसलिये तुम स्वस्थ हो जाओ, तुम्हारे मनमें शोक नहीं होना चाहिये । वक्ताओंमें श्रेष्ठ भरत ! तुम यहाँसे जाकर अयोध्यापुरीमें निवास करो; क्योंकि मनको वशमें रखनेवाले पूज्य पिताजीने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है ॥ ४० ॥

> यत्राहमपि तेनैव नियुक्तः पुण्यकर्मणा ।  
> तत्रैवाहं करिष्यामि पितुरार्यस्य शासनम् ॥ ४१ ॥

‘उन पुण्यकर्मा महाराजने मुझे भी जहाँ रहनेकी आज्ञा दी है, वहीं रहकर मैं उन पूज्य पिताके आदेशका पालन करूँगा ॥ ४१ ॥

> न मया शासनं तस्य त्यक्तुं न्याय्यमरिंदम ।  
> स त्वयापि सदा मान्यः स वै बन्धुः स नः पिता ॥ ४२ ॥

‘शत्रुदमन भरत ! पिताकी आज्ञाकी अवहेलना करना मेरे लिये कदापि उचित नहीं है । वे तुम्हारे लिये भी सर्वदा सम्मानके योग्य हैं; क्योंकि वे ही हमलोगोंके हितैषी बन्धु और जन्मदाता थे ॥ ४२ ॥

> तद् वचः पितुरेवाहं सम्मतं धर्मचारिणाम् ।  
> कर्मणा पालयिष्यामि वनवासेन राघव ॥ ४३ ॥  
> धार्मिकेणानृशंसेन नरेण गुरुवर्तिना ।  
> भवितव्यं नरव्याघ्र परलोकं जिगीषता ॥ ४४ ॥

‘रघुनन्दन ! मैं इस वनवासरूपी कर्मके द्वारा पिताजीके ही वचनका जो धर्मात्माओंको भी मान्य है, पालन करूँगा ॥ ‘नरश्रेष्ठ ! परलोकपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको धार्मिक, क्रूरतासे रहित और गुरुजनोंका आज्ञापालक होना चाहिये ॥ ४४ ॥

> आत्मानमनुतिष्ठ त्वं स्वभावेन नरर्षभ ।  
> निशाम्य तु शुभं वृत्तं पितुर्दशरथस्य नः ॥ ४५ ॥

‘मनुष्योंमें श्रेष्ठ भरत ! हमारे पूज्य पिता दशरथके शुभ आचरणोंपर दृष्टिपात करके तुम अपने धार्मिक स्वभावके द्वारा आत्माकी उन्नतिके लिये प्रयत्न करो’ ॥ ४५ ॥

> इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा  
> पितुर्निदेशप्रतिपालनार्थम् ।  
> यवीयसं भ्रातरमर्थवच्च  
> प्रभुर्मुहूर्ताद् विरराम रामः ॥ ४६ ॥

सर्वशक्तिमान् महात्मा श्रीराम एक मुहूर्ततक, अपने के उद्देश्यसे ये अर्थयुक्त वचन कहकर चुप हो छोटे भाई भरतसे पिताकी आज्ञाका पालन कराने- गये ॥ ४६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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