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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 72"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 72

> पुरा राम महाबाहो महाबलपराक्रमम् ।  
> रूपमासीन्ममाचिन्त्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ १ ॥

‘महाबाहु श्रीराम ! पूर्वकालमें मेरा रूप महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकोंमें विख्यात था ॥ १ ॥

> यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य च यथा वपुः ।  
> सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत् ॥ २ ॥  
> ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्ततः ।

‘सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्रका शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था । ऐसा होनेपर भी मैं लोगोंको भयभीत करनेवाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षस रूपको धारण करके इधर-उधर घूमता और वनमें रहनेवाले ऋषियोंको डराया करता था ॥ २½ ॥

> ततः स्थूलशिरा नाम महर्षिः कोपितो मया ॥ ३ ॥  
> स चिन्वन् विविधं वन्यं रूपेणानेन घर्षितः ।  
> तेनाहमुक्तः प्रेक्ष्यैवं घोरशापाभिधायिना ॥ ४ ॥

अपने इस बर्तावसे एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षिको कुपित कर दिया । वे नाना प्रकारके जंगली फल-मूल आदिका संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षसरूपसे डरा दिया । मुझे ऐसे विकट रूपमें देखकर उन्होंने घोर शाप देते हुए कहा—॥ ३-४ ॥

> एतदेवं नृशंसं ते रूपमस्तु विगर्हितम् ।  
> स मया याचितः क्रुद्धः शापस्यान्तो भवेदिति ॥ ५ ॥  
> अभिशापकृतस्येति तेनेदं भाषितं वचः ।

‘दुरात्मन् ! आजसे सदाके लिये तुम्हारा यही क्रूर और निन्दित रूप रह जाय ।’ यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षिसे प्रार्थना की—‘भगवन् ! इस अभिशाप ( तिरस्कार ) जनित शापका अन्त होना चाहिये ।’ तब उन्होंने इस प्रकार कहा—॥ ५½ ॥

> यदा छित्त्वा भुजौ रामस्त्वां दहेद् विजने वने ॥ ६ ॥  
> तदा त्वं प्राप्स्यसे रूपं स्वमेव विपुलं शुभम् ।  
> श्रिया विराजितं पुत्रं दनोस्त्वं विद्धि लक्ष्मण ॥ ७ ॥

‘जब श्रीराम ( और लक्ष्मण ) तुम्हारी दोनों भुजाएँ काटकर तुम्हें निर्जन वनमें जलायेंगे, तब तुम पुनः अपने उसी परम उत्तम, सुन्दर और शोभासम्पन्न रूपको प्राप्त कर लोगे ।’ लक्ष्मण ! इस प्रकार तुम मुझे एक दुराचारी दानव समझो ॥ ६-७ ॥

> इन्द्रकोपादिदं रूपं प्राप्तमेवं रणाजिरे ।  
> अहं हि तपसोग्रेण पितामहमतोषयम् ॥ ८ ॥  
> दीर्घमायुः स मे प्रादात् ततो मां विभ्रमोऽस्पृशत् ।  
> दीर्घमायुर्मया प्राप्तं किं मां शक्रः करिष्यति ॥ ९ ॥

‘मेरा जो यह ऐसा रूप है, यह समराङ्गणमें इन्द्रके क्रोधसे प्राप्त हुआ है । मैंने पूर्वकालमें राक्षस होनेके पश्चात् घोर तपस्या करके पितामह ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे दीर्घजीवी होनेका वर दिया । इससे मेरी बुद्धिमें यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे तो दीर्घकालतक बनी रहनेवाली आयु प्राप्त हुई है; फिर इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे ? ॥ ८-९ ॥

> इत्येवं बुद्धिमास्थाय रणे शक्रमधर्षयम् ।  
> तस्य बाहुप्रमुक्तेन वज्रेण शतपर्वणा ॥ १० ॥  
> सक्थिनी च शिरश्चैव शरीरे सम्प्रवेशितम् ।

‘ऐसे विचारका आश्रय लेकर एक दिन मैंने युद्धमें देवराजपर आक्रमण किया । उस समय इन्द्रने मुझपर सौ धारोंवाले वज्रका प्रहार किया । उनके छोड़े हुए उस वज्रसे मेरी जाँघें और मस्तक मेरे ही शरीरमें घुस गये ॥ १०½ ॥

> स मयायाच्यमानः सन् नानयद् यमसादनम् ॥ ११ ॥  
> पितामहवचः सत्यं तदस्त्विति ममाब्रवीत् ।  
> अनाहारः कथं शक्तो भग्नसक्थिशिरोमुखः ॥ १२ ॥  
> वज्रेणाभिहतः कालं सुदीर्घमपि जीवितुम् ।

‘मैंने बहुत प्रार्थना की, इसलिये उन्होंने मुझे यमलोक नहीं पठाया और कहा—‘पितामह ब्रह्माजीने जो तुम्हें दीर्घजीवी होनेके लिये वरदान दिया है, वह सत्य हो’ ॥ ‘तब मैंने कहा—देवराज ! आपने अपने वज्रकी मारसे मेरी जाँघें, मस्तक और मुँह सभी तोड़ डाले । अब मैं कैसे आहार ग्रहण करूँगा और निराहार रहकर किस प्रकार सुदीर्घकालतक जीवित रह सकूँगा ? ॥ १२½ ॥

> स एवमुक्तः शक्रो मे बाहू योजनमायतौ ॥ १३ ॥  
> तदा चास्यं च मे कुक्षौ तीक्ष्णदंष्ट्रमकल्पयत् ।

‘मेरे ऐसा कहनेपर इन्द्रने मेरी भुजाएँ एक-एक योजन लंबी कर दीं एवं तत्काल ही मेरे पेटमें तीखे दाढ़ोंवाला एक मुख बना दिया ॥ १३½ ॥

> सोऽहं भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां संक्षिप्यासिन् वनेचरान् ॥१४  
> सिंहद्वीपिमृगव्याघ्रान् भक्षयामि समन्ततः ।

‘इस प्रकार मैं विशाल भुजाओंद्वारा वनमें रहनेवाले सिंह, चीते, हरिन और बाघ आदि जन्तुओंको सब ओरसे समेटकर खाया करता था ॥ १४½ ॥

> स तु मामब्रवीदिन्द्रो यदा रामः सलक्ष्मणः ॥ १५ ॥  
> छेत्स्यते समरे बाहू तदा स्वर्गं गमिष्यसि ।

‘इन्द्रने मुझे यह भी बतला दिया था कि जब लक्ष्मणसहित श्रीराम तुम्हारी भुजाएँ काट देंगे, उस समय तुम स्वर्गमें जाओगे ॥ १५½ ॥

> अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम ॥ १६ ॥  
> यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये ।

‘तात ! राजशिरोमणे ! इस शरीरसे इस वनके भीतर मैं जो-जो वस्तु देखता हूँ, वह सब ग्रहण कर लेना मुझे ठीक लगता है ॥ १६½ ॥

> अवश्यं ग्रहणं रामो मन्येऽहं समुपैष्यति ॥ १७ ॥  
> इमां बुद्धिं पुरस्कृत्य देहन्यासकृतश्रमः।

‘इन्द्र तथा मुनिके कथनानुसार मुझे यह विश्वास था कि एक दिन श्रीराम अवश्य मेरी पकड़में आ जायँगे । इसी विचारको सामने रखकर मैं इस शरीरको त्याग देनेके लिये प्रयत्नशील था ॥ १७½ ॥

> स त्वं रामोऽसि भद्रं ते नाहमन्येन राघव ॥ १८ ॥  
> शक्यो हन्तुं यथा तत्त्वमेवमुक्तं महर्षिणा।

‘रघुनन्दन ! अवश्य ही आप श्रीराम हैं। आपका कल्याण हो । मैं आपके सिवा दूसरे किसीसे नहीं मारा जा सकता था । यह बात महर्षिने ठीक ही कही थी ॥ १८½ ॥

> अहं हि मतिसाचिव्यं करिष्यामि नरर्षभ ॥ १९ ॥  
> मित्रं चैवोपदेक्ष्यामि युवाभ्यां संस्कृतोऽग्निना।

‘नरश्रेष्ठ ! आप दोनों जब अग्निके द्वारा मेरा दाह-संस्कार कर देंगे, उस समय मैं आपकी बौद्धिक सहायता करूँगा । आप दोनोंके लिये एक अच्छे मित्रका पता बताऊँगा’ ॥ १९½ ॥

> एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दनुना तेन राघवः ॥ २० ॥  
> इदं जगाद वचनं लक्ष्मणस्य च पश्यतः।

उस दानवके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके सामने उससे यह बात कही—॥ २०½ ॥

> रावणेन हृता भार्या सीता मम यशस्विनी ॥ २१ ॥  
> निष्क्रान्तस्य जनस्थानात् सह भ्रात्रा यथासुखम्।  
> नाममात्रं तु जानामि न रूपं तस्य रक्षसः ॥ २२ ॥

‘कबन्ध ! मेरी यशस्विनी भार्या सीताको रावण हर ले गया है । उस समय मैं अपने भाई लक्ष्मणके साथ सुखपूर्वक जनस्थानके बाहर चला गया था । मैं उस राक्षसका नाममात्र जानता हूँ । उसकी शकल-सूरतसे परिचित नहीं हूँ ॥ २१-२२ ॥

> निवासं वा प्रभावं वा वयं तस्य न विद्महे।  
> शोकार्तानामनाथानामेवं विपरिधावताम् ॥ २३ ॥  
> कारुण्यं सदृशं कर्तुमुपकारेण वर्तताम्।

‘वह कहाँ रहता है और कैसा उसका प्रभाव है, इस बातसे हमलोग सर्वथा अनभिज्ञ हैं । इस समय सीताका शोक हमें बड़ी पीड़ा दे रहा है । हम असहाय होकर इसी तरह सब ओर दौड़ रहे हैं । तुम हमारे ऊपर समुचित करुणा करनेके लिये इस विषयमें हमारा कुछ उपकार करो ॥२३½॥

> काष्ठान्यानीय भग्नानि काले शुष्काणि कुञ्जरैः ॥ २४ ॥  
> धक्ष्यामस्त्वां वयं वीर श्वभ्रे महति कल्पिते।

‘वीर ! फिर हमलोग हाथियोंद्वारा तोड़े गये सूखे काठ लाकर स्वयं खोदे हुए एक बहुत बड़े गड्ढेमें तुम्हारे शरीरको रखकर जला देंगे ॥ २४½ ॥

> स त्वं सीतां समाचक्ष्व येन वा यत्र वाहृता ॥ २५ ॥  
> कुरु कल्याणमत्यर्थं यदि जानासि तत्त्वतः।

‘अतः अब तुम हमें सीताका पता बताओ । इस समय वह कहाँ है ? तथा उसे कौन कहाँ ले गया है ? यदि ठीक-ठीक जानते हो तो सीताका समाचार बताकर हमारा अत्यन्त कल्याण करो’ ॥ २५½ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण वाक्यं दनुरनुत्तमम् ॥ २६ ॥  
> प्रोवाच कुशलो वक्ता वक्तारमपि राघवम्।

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर बातचीतमें कुशल उस दानवने उन प्रवचनपटु रघुनाथजीसे यह परम उत्तम बात कही–॥ २६½ ॥

> दिव्यमस्ति न मे ज्ञानं नाभिजानामि मैथिलीम् ॥ २७ ॥  
> यस्तां वक्ष्यति तं वक्ष्ये दग्धः स्वं रूपमास्थितः।  
> योऽभिजानाति तद्रक्षस्तद् वक्ष्ये राम तत्परम् ॥ २८ ॥

‘श्रीराम ! इस समय मुझे दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं मिथिलेशकुमारीके विषयमें कुछ भी नहीं जानता । जब मेरे इस शरीरका दाह हो जायगा, तब मैं अपने पूर्व स्वरूपको प्राप्त होकर किसी ऐसे व्यक्तिका पता बता सकूँगा, जो सीताके विषयमें आपको कुछ बतायेगा तथा जो उस उत्कृष्ट राक्षसको भी जानता होगा, ऐसे पुरुषका आपको परिचय दूँगा ॥ २७-२८ ॥

> अदग्धस्य हि विज्ञातुं शक्तिरस्ति न मे प्रभो।  
> राक्षसं तु महावीर्यं सीता येन हृता तव ॥ २९ ॥

‘प्रभो ! जबतक मेरे इस शरीरका दाह नहीं होगा तबतक मुझमें यह जाननेकी शक्ति नहीं आ सकती कि वह महापराक्रमी राक्षस कौन है, जिसने आपकी सीताका अपहरण किया है ॥ २९ ॥

> विज्ञानं हि महद् भ्रष्टं शापदोषेण राघव।  
> स्वकृतेन मया प्राप्तं रूपं लोकविगर्हितम् ॥ ३० ॥

‘रघुनन्दन ! शाप-दोषके कारण मेरा महान् विज्ञान नष्ट हो गया है । अपनी ही करतूतसे मुझे यह लोकनिन्दित रूप प्राप्त हुआ है ॥ ३० ॥

> किं तु यावन्न यात्यस्तं सविता श्रान्तवाहनः।  
> तावन्मामवटे क्षिप्त्वा दह राम यथाविधि ॥ ३१ ॥

‘किंतु श्रीराम ! जबतक सूर्यदेव अपने वाहनोंके थक जानेपर अस्त नहीं हो जाते, तभीतक मुझे गड्ढेमें डालकर शास्त्रीय विधिके अनुसार मेरा दाह-संस्कार कर दीजिये ॥३१॥

> दग्धस्त्वयाहमवटे न्यायेन रघुनन्दन।  
> वक्ष्यामि तं महावीर यस्तं वेत्स्यति राक्षसम् ॥ ३२ ॥

‘महावीर रघुनन्दन! आपके द्वारा विधिपूर्वक गड्ढेमें मेरे शरीरका दाह हो जानेपर मैं ऐसे महापुरुषका परिचय दूँगा, जो उस राक्षसको जानते होंगे ॥ ३२ ॥

> तेन सख्यं च कर्तव्यं न्याय्यवृत्तेन राघव ।  
> कल्पयिष्यति ते वीर साहाय्यं लघुविक्रम ॥ ३३ ॥

‘शीघ्र पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर रघुनाथजी ! न्यायोचित आचारवाले उन महापुरुषके साथ आपको मित्रता कर लेनी चाहिये । वे आपकी सहायता करेंगे ॥ ३३ ॥

> नहि तस्यास्त्यविज्ञातं त्रिषु लोकेषु राघव ।  
> सर्वान् परिवृतो लोकान् पुरा वै कारणान्तरे ॥ ३४ ॥

‘रघुनन्दन ! उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि किसी कारणवश वे पहले समस्त लोकोंमें चक्कर लगा चुके हैं’ ॥ ३४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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