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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 65"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 65

> स दीनो दीनया वाचा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ।  
> शीघ्रं लक्ष्मण जानीहि गत्वा गोदावरीं नदीम् ॥ १ ॥  
> अपि गोदावरीं सीता पद्मान्यानयितुं गता ।

तदनन्तर दीन हुए श्रीरामचन्द्रजीने दीन वाणीमें लक्ष्मणसे कहा—‘लक्ष्मण ! तुम शीघ्र ही गोदावरी नदीके तटपर जाकर पता लगाओ । सीता कमल लानेके लिये तो नहीं चली गयीं’ ॥ १½ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः पुनरेव हि ॥ २ ॥  
> नदीं गोदावरीं रम्यां जगाम लघुविक्रमः ।

श्रीरामकी ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मण शीघ्र गतिसे पुनः रमणीय गोदावरी नदीके तटपर गये ॥ २½ ॥

> तां लक्ष्मणस्तीर्थवतीं विचित्वा राममब्रवीत् ॥ ३ ॥  
> नैनां पश्यामि तीर्थेषु क्रोशतो न शृणोति मे ।

अनेक तीर्थों ( घाटों ) से युक्त गोदावरीके तटपर खोजकर लक्ष्मण पुनः लौट आये और श्रीरामसे बोले— ‘भैया ! मैं गोदावरीके घाटोंपर सीताको नहीं देख पाता हूँ; जोर-जोरसे पुकारनेपर भी वे मेरी बात नहीं सुनती हैं ॥ ३½ ॥

> कं नु सा देशमापन्ना वैदेही क्लेशनाशिनी ॥ ४ ॥  
> नहि तं वेद्मि वै राम यत्र सा तनुमध्यमा ।

‘श्रीराम ! क्लेशोंका नाश करनेवाली विदेहराजकुमारी न जाने किस देशमें चली गयीं । भैया श्रीराम ! जहाँ कृश-कटिप्रदेशवाली सीता गयी हैं, उस स्थानको मैं नहीं जानता’ ॥ ४½ ॥

> लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा दीनः संतापमोहितः ॥ ५ ॥  
> रामः समभिचक्राम स्वयं गोदावरीं नदीम् ।

लक्ष्मणकी यह बात सुनकर दीन एवं संतापसे मोहित हुए श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही गोदावरी नदीके तटपर गये ॥ ५½ ॥

> स तामुपस्थितो रामः क्व सीतेत्येवमब्रवीत् ॥ ६ ॥  
> भूतानि राक्षसेन्द्रेण वधार्हेण हृतामपि ।  
> न तां शशंसू रामाय तथा गोदावरी नदी ॥ ७ ॥

वहाँ पहुँचकर श्रीरामने पूछा—‘सीता कहाँ है ?’ परंतु वधके योग्य राक्षसराज रावणद्वारा हरी गयी सीताके विषयमें समस्त भूतोंमेंसे किसीने कुछ नहीं कहा । गोदावरी नदीने भी श्रीरामको कोई उत्तर नहीं दिया ॥ ६-७ ॥

> ततः प्रचोदिता भूतैः शंस चास्मै प्रियामिति ।  
> न च सा ख्यावदत् सीतां पृष्ठा रामेण शोचता ॥ ८ ॥

तदनन्तर वनके समस्त प्राणियोंने उन्हें प्रेरित किया कि ‘तुम श्रीरामको उनकी प्रियाका पता बता दो !’ किंतु शोकमग्न श्रीरामके पूछनेपर भी गोदावरीने सीताका पता नहीं बताया ॥ ८ ॥

> रावणस्य च तद्रूपं कर्मापि च दुरात्मनः ।  
> ध्यात्वा भयात् तु वैदेहीं सा नदी न शशंस ह ॥ ९ ॥

दुरात्मा रावणके उस रूप और कर्मको याद करके भयके मारे गोदावरी नदीने वैदेहीके विषयमें श्रीरामसे कुछ नहीं कहा ॥ ९ ॥

> निराशस्तु तया नद्या सीताया दर्शने कृतः ।  
> उवाच रामः सौमित्रिं सीतादर्शनकर्शितः ॥ १० ॥

सीताके दर्शनके विषयमें जब नदीने उन्हें पूर्ण निराश कर दिया, तब सीताको न देखनेसे कष्टमें पड़े हुए श्रीराम सुमित्राकुमारसे इस प्रकार बोले—॥ १० ॥

> एषा गोदावरी सौम्य किंचिन्न प्रतिभाषते ।  
> किं नु लक्ष्मण वक्ष्यामि समेत्य जनकं वचः ॥ ११ ॥  
> मातरं चैव वैदेह्या विना तामहमप्रियम् ।

‘सौम्य लक्ष्मण ! यह गोदावरी नदी तो मुझे कोई उत्तर ही नहीं देती है । अब मैं राजा जनकसे मिलनेपर उन्हें क्या जवाब दूँगा ? जानकीके बिना उसकी मातासे मिलकर भी मैं उनसे यह अप्रिय बात कैसे सुनाऊँगा ? ॥ ११½ ॥

> या मे राज्यविहीनस्य वने वन्येन जीवतः ॥ १२ ॥  
> सर्वं व्यपानयच्छोकं वैदेही क नु सा गता ।

‘राज्यहीन होकर वनमें जंगली फल-मूलोंसे निर्वाह करते समय भी जो मेरे साथ रहकर मेरे सभी दुःखोंको दूर किया करती थी, वह विदेहराजकुमारी कहाँ चली गयी ? ॥ १२½ ॥

> ज्ञातिवर्गविहीनस्य वैदेहीमप्यपश्यतः ॥ १३ ॥  
> मन्ये दीर्घा भविष्यन्ति रात्रयो मम जाग्रतः ।

‘बन्धु-बान्धवोंसे तो मेरा बिछोह हो ही गया था, अब सीताके दर्शनसे भी मुझे वञ्चित होना पड़ा; उसकी चिन्तामें निरन्तर जागते रहनेके कारण अब मेरी सभी रातें बहुत बड़ी हो जायँगी ॥ १३½ ॥

> मन्दाकिनीं जनस्थानमिमं प्रस्रवणं गिरिम् ॥ १४ ॥  
> सर्वाण्यनुचरिष्यामि यदि सीता हि लभ्यते ।

‘मन्दाकिनी नदी, जनस्थान तथा प्रस्रवण पर्वत—इन सभी स्थानोंपर मैं बारंबार भ्रमण करूँगा । शायद वहाँ सीताका पता चल जाय ॥ १४½ ॥

> एते महामृगा वीर मामीक्षन्ते पुनः पुनः ॥ १५ ॥  
> वक्तुकामा इह हि मे इङ्गितान्युपलक्षये ।

‘वीर लक्ष्मण ! ये विशाल मृग मेरी ओर बारंबार देख रहे हैं, मानो यहाँ ये मुझसे कुछ कहना चाहते हैं । मैं इनकी चेष्टाओंको समझ रहा हूँ’ ॥ १५½ ॥

> तांस्तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो राघवः प्रत्युवाच ह ॥ १६ ॥  
> क सीतेति निरीक्षन् वै बाष्पसंरुद्धया गिरा ।  
> एवमुक्ता नरेन्द्रेण ते मृगाः सहसोत्थिताः ॥ १७ ॥  
> दक्षिणाभिमुखाः सर्वे दर्शयन्तो नभःस्थलम् ।

तदनन्तर उन सबकी ओर देखकर पुरुषसिंह श्रीरामचन्द्रजीने उनसे कहा—‘बताओ, सीता कहाँ हैं ?’ उन मृगोंकी ओर देखते हुए राजा श्रीरामने जब अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार पूछा, तब वे मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और ऊपरकी ओर देखकर आकाशमार्गकी ओर लक्ष्य कराते हुए सब-के-सब दक्षिण दिशाकी ओर मुँह किये दौड़े ॥ १६-१७½ ॥

> मैथिली ह्रियमाणा सा दिशं यामभ्यपद्यत ॥ १८ ॥  
> तेन मार्गेण गच्छन्तो निरीक्षन्ते नराधिपम् ।

मिथिलेशकुमारी सीता हरी जाकर जिस दिशाकी ओर गयी थीं, उसी ओरके मार्गसे जाते हुए वे मृग राजा श्रीरामचन्द्रजीकी ओर मुड़-मुड़कर देखते रहते थे ॥ १८½ ॥

> येन मार्गं च भूमिं च निरीक्षन्ते स्म ते मृगाः ॥ १९ ॥  
> पुनर्नदन्तो गच्छन्ति लक्ष्मणेनोपलक्षिताः ।  
> तेषां वचनसर्वस्वं लक्षयामास चेङ्गितम् ॥ २० ॥

वे मृग आकाशमार्ग और भूमि दोनोंकी ओर देखते और गर्जना करते हुए पुनः आगे बढ़ते थे । लक्ष्मणने उनकी इस चेष्टाको लक्ष्य किया । वे जो कुछ कहना चाहते थे, उसका सारसर्वस्वरूप जो उनकी चेष्टा थी, उसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया ॥ १९-२० ॥

> उवाच लक्ष्मणो धीमाञ्ज्येष्ठं भ्रातरमार्तवत् ।  
> क सीतेति त्वया पृष्ठा यथेमे सहसोत्थिताः ॥ २१ ॥  
> दर्शयन्ति क्षितिं चैव दक्षिणां च दिशं मृगाः ।  
> साधु गच्छावहे देव दिशमेतां च नैर्ऋतीम् ॥ २२ ॥  
> यदि तस्यागमः कश्चिदार्या वा साध लक्ष्यते ।

तदनन्तर बुद्धिमान् लक्ष्मणने आर्त-से होकर अपने बड़े भाईसे इस प्रकार कहा—‘आर्य ! जब आपने पूछा कि सीता कहाँ हैं, तब ये मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और पृथ्वी तथा दक्षिणकी ओर हमारा लक्ष्य कराने लगे हैं; अतः देव ! यही अच्छा होगा कि हमलोग इस नैर्ऋत्य दिशाकी ओर चलें । सम्भव है, इधर जानेसे सीताका कोई समाचार मिल जाय अथवा आर्या सीता स्वयं ही दृष्टिगोचर हो जायँ’ ॥ २१-२२½ ॥

> बाढमित्येव काकुत्स्थः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम् ॥ २३ ॥  
> लक्ष्मणानुगतः श्रीमान् वीक्षमाणो वसुंधराम् ।

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीमान् रामचन्द्रजी लक्ष्मणको साथ ले पृथ्वीकी ओर ध्यानसे देखते हुए दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ॥ २३½ ॥

> एवं सम्भाषमाणौ तावन्योन्यं भ्रातरावुभौ ॥ २४ ॥  
> वसुंधरायां पतितपुष्पमार्गमपश्यताम् ।

वे दोनों भाई आपसमें इसी प्रकारकी बातें करते हुए ऐसे मार्गपर जा पहुँचे, जहाँ भूमिपर कुछ फूल गिरे दिखायी देते थे ॥ २४½ ॥

> पुष्पवृष्टिं निपतितां दृष्ट्वा रामो महीतले ॥ २५ ॥  
> उवाच लक्ष्मणं वीरो दुःखितो दुःखितं वचः ।

पृथ्वीपर फूलोंकी उस वर्षाको देखकर वीर श्रीरामने दुखी हो लक्ष्मणसे यह दुःखभरा वचन कहा—॥ २५½ ॥

> अभिजानामि पुष्पाणि तानीमानीह लक्ष्मण ॥ २६ ॥  
> अपिनद्धानि वैदेह्या मया दत्तानि कानने ।

‘लक्ष्मण ! मैं इन फूलोंको पहचानता हूँ । ये वे ही फूल यहाँ गिरे हैं, जिन्हें वनमें मैंने विदेहनन्दिनीको दिया था और उन्होंने अपने केशोंमें लगा लिया था ॥ २६½ ॥

> मन्ये सूर्यश्च वायुश्च मेदिनी च यशस्विनी ॥ २७ ॥  
> अभिरक्षन्ति पुष्पाणि प्रकुर्वन्तो मम प्रियम् ।

‘मैं समझता हूँ, सूर्य, वायु और यशस्विनी पृथ्वीने मेरा प्रिय करनेके लिये ही इन फूलोंको सुरक्षित रखा है’ ॥ २७½ ॥

> एवमुक्त्वा महाबाहुर्लक्ष्मणं पुरुषर्षभम् ॥ २८ ॥  
> उवाच रामो धर्मात्मा गिरिं प्रस्रवणाकुलम् ।

पुरुषप्रवर लक्ष्मणसे ऐसा कहकर धर्मात्मा महाबाहु श्रीरामने झरनोंसे भरे हुए प्रस्रवण गिरिसे कहा—॥ २८½ ॥

> कच्चित् क्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी ॥ २९ ॥  
> रामा रम्ये वनोद्देशे मया विरहिता त्वया ।

‘पर्वतराज ! क्या तुमने इस वनके रमणीय प्रदेशमें मुझसे बिछुड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी सीताको देखा है ?’ ॥ २९½ ॥

> क्रुद्धोऽब्रवीद् गिरिं तत्र सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ ३० ॥  
> तां हेमवर्णां हेमाङ्गीं सीतां दर्शय पर्वत ।  
> यावत् सानूनि सर्वाणि न ते विध्वंसयाम्यहम् ॥ ३१ ॥

तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृगको देखकर दहाड़ता है, उसी प्रकार वे कुपित हो वहाँ उस पर्वतसे बोले—‘पर्वत ! जबतक मैं तुम्हारे सारे शिखरोंका विध्वंस नहीं कर डालता हूँ, इसके पहले ही तुम उस काञ्चनकी-सी काया-कान्तिवाली सीताका मुझे दर्शन करा दो’ ॥ ३०-३१ ॥

> एवमुक्तस्तु रामेण पर्वतो मैथिलीं प्रति ।  
> दर्शयन्निव तां सीतां नादर्शयत राघवे ॥ ३२ ॥

श्रीरामके द्वारा मैथिलीके लिये ऐसा कहे जानेपर उस पर्वतने सीताको दिखाता हुआ-सा कुछ चिह्न प्रकट कर दिया । श्रीरघुनाथजीके समीप वह सीताको साक्षात् उपस्थित न कर सका ॥ ३२ ॥

> ततो दाशरथी राम उवाच च शिलोच्चयम् ।  
> मम बाणाग्निनिर्दग्धो भस्मीभूतो भविष्यसि ॥ ३३ ॥  
> असेव्यः सर्वतश्चैव निस्तृणद्रुमपल्लवः ।

तब दशरथनन्दन श्रीरामने उस पर्वतसे कहा—‘अरे ! तू मेरे बाणोंकी आगसे जलकर भस्मीभूत हो जायगा । किसी भी ओरसे तू सेवनके योग्य नहीं रह जायगा । तेरे तृण, वृक्ष और पल्लव नष्ट हो जायँगे’ ॥ ३३½ ॥

> इमां वा सरितं चाद्य शोषयिष्यामि लक्ष्मण ॥ ३४ ॥  
> यदि नाख्याति मे सीतामद्य चन्द्रनिभाननाम् ।

( इसके बाद वे सुमित्राकुमारसे बोले—) ‘लक्ष्मण ! यदि वह नदी आज मुझे चन्द्रमुखी सीताका पता नहीं बताती है तो मैं अब इसे भी सुखा डालूँगा’ ॥ ३४½ ॥

> एवं प्ररुषितो रामो दिधक्षन्निव चक्षुषा ॥ ३५ ॥  
> ददर्श भूमौ निष्क्रान्तं राक्षसस्य पदं महत् ।

ऐसा कहकर रोषमें भरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उसकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो अपनी दृष्टिद्वारा उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। इतनेहीमें उस पर्वत और गोदावरीके समीपकी भूमिपर राक्षसका विशाल पदचिह्न उभरा हुआ दिखायी दिया ॥ ३५½ ॥

> त्रस्ताया रामकाङ्क्षिण्याः प्रधावन्त्या इतस्ततः ॥ ३६ ॥  
> राक्षसेनानुसृप्ताया वैदेह्याश्च पदानि तु ।

साथ ही राक्षसने जिनका पीछा किया था और जो श्रीरामकी अभिलाषा रखकर रावणके भयसे संत्रस्त हो इधर-उधर भागती फिरी थीं, उन विदेहराजकुमारी सीताके चरणचिह्न भी वहाँ दिखायी दिये ॥ ३६½ ॥

> स समीक्ष्य परिक्रान्तं सीताया राक्षसस्य च ॥ ३७ ॥  
> भग्नं धनुश्च तूणी च विकीर्णं बहुधा रथम् ।  
> सम्भ्रान्तहृदयो रामः शशंस भ्रातरं प्रियम् ॥ ३८ ॥

सीता और राक्षसके पैरोंके निशान, टूटे धनुष, तरकस और छिन्न-भिन्न होकर अनेक टुकड़ोंमें बिखरे हुए रथको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका हृदय घबरा उठा । वे अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमारसे बोले—॥ ३७ ३८ ॥

> पश्य लक्ष्मण वैदेह्या कीर्णाः कनकबिन्दवः ।  
> भूषणानां हि सौमित्रे माल्यानि विविधानि च ॥ ३९ ॥

‘लक्ष्मण ! देखो, ये सीताके आभूषणोंमें लगे हुए सोनेके धुँधुरू बिखरे पड़े हैं । सुमित्रानन्दन ! उसके नाना प्रकारके हार भी टूटे पड़े हैं ॥ ३९ ॥

> तप्तबिन्दुनिकाशैश्च चित्रैः क्षतजबिन्दुभिः ।  
> आवृतं पश्य सौमित्रे सर्वतो धरणीतलम् ॥ ४० ॥

‘सुमित्राकुमार ! देखो, यहाँकी भूमि सब ओरसे सुवर्णकी बूँदोंके समान ही विचित्र रक्तबिन्दुओंसे रँगी दिखायी देती है ॥ ४० ॥

> मन्ये लक्ष्मण वैदेही राक्षसैः कामरूपिभिः ।  
> भित्त्वा भित्त्वा विभक्ता वा भक्षिता वा भविष्यति ॥४१॥

‘लक्ष्मण ! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंने यहाँ सीताके टुकड़े-टुकड़े करके उसे आपसमें बाँटा और खाया होगा ॥ ४१ ॥

> तस्या निमित्तं सीताया द्वयोर्विवदमानयोः ।  
> बभूव युद्धं सौमित्रे घोरं राक्षसयोरिह ॥ ४२ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! सीताके लिये परस्पर विवाद करनेवाले दो राक्षसोंमें यहाँ घोर युद्ध भी हुआ है ॥ ४२ ॥

> मुक्तामणिचितं चेदं रमणीयं विभूषितम् ।  
> धरण्यां पतितं सौम्य कस्य भग्नं महद् धनुः ॥ ४३ ॥

‘सौम्य ! तभी तो यहाँ यह मोती और मणियोंसे जटित एवं विभूषित किसीका अत्यन्त सुन्दर और विशाल धनुष खण्डित होकर पृथ्वीपर पड़ा है। यह किसका धनुष हो सकता है ? ॥ ४३ ॥

> राक्षसानामिदं वत्स सुराणामथवापि वा ।  
> तरुणादित्यसंकाशं वैदूर्यगुलिकाचितम् ॥ ४४ ॥

‘वत्स ! पता नहीं, यह राक्षसोंका है या देवताओंका; यह प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा है तथा इसमें वैदूर्यमणि ( नीलम ) के टुकड़े जड़े हुए हैं ॥ ४४ ॥

> विशीर्णं पतितं भूमौ कवचं कस्य काञ्चनम् ।  
> छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् ॥ ४५ ॥  
> भग्नदण्डमिदं सौम्य भूमौ कस्य निपातितम् ।

‘सौम्य ! उधर पृथ्वीपर टूटा हुआ एक सोनेका कवच पड़ा है, न जाने वह किसका है ? दिव्य मालाओंसे सुशोभित यह सौ कमानियोंवाला छत्र किसका है ? इसका डंडा टूट गया है और यह धरतीपर गिरा दिया गया है ॥ ४५½ ॥

> काञ्चनोरश्छदाश्चेमे पिशाचवदनाः खराः ॥ ४६ ॥  
> भीमरूपा महाकायाः कस्य वा निहता रणे ।

‘इधर ये पिशाचोंके समान मुखवाले भयंकर रूपधारी गधे मरे पड़े हैं। इनका शरीर बहुत ही विशाल रहा है; इन सबकी छातीमें सोनेके कवच बँधे हैं। ये युद्धमें मारे गये जान पड़ते हैं । पता नहीं ये किसके थे ॥ ४६½ ॥

> दीप्तपावकसंकाशो द्युतिमान् समरध्वजः ॥ ४७ ॥  
> अपविद्धश्च भग्नश्च कस्य साङ्ग्रामिको रथः ।

‘तथा संग्राममें काम देनेवाला यह किसका रथ पड़ा है ? ‘इसे किसीने उलटा गिराकर तोड़ डाला है। समराङ्गणमें स्वामीको सूचित करनेवाली ध्वजा भी इसमें लगी थी। यह तेजस्वी रथ प्रज्वलित अग्निके समान दमक रहा है ॥ ४७½ ॥

> रथाक्षमात्रा विशिखास्तपनीयविभूषणाः ॥ ४८ ॥  
> कस्येमे निहता बाणाः प्रकीर्णा घोरदर्शनाः ।

‘ये भयंकर बाण, जो यहाँ टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरे पड़े हैं, किसके हैं ? इनकी लंबाई और मोटाई रथके धुरेके समान प्रतीत होती है । इनके फल-भाग टूट गये हैं तथा ये सुवर्णसे विभूषित हैं ॥ ४८½ ॥

> शरावरौ शरैः पूर्णौ विध्वस्तौ पश्य लक्ष्मण ॥ ४९ ॥  
> प्रतोदाभीषुहस्तोऽयं कस्य वा सारथिर्हतः ।

‘लक्ष्मण ! उधर देखो, ये बाणोंसे भरे हुए दो तरकस पड़े हैं, जो नष्ट कर दिये गये हैं । यह किसका सारथि मरा पड़ा है, जिसके हाथमें चाबुक और लगाम अभीतक मौजूद हैं ॥ ४९½ ॥

> पदवी पुरुषस्यैषा व्यक्तं कस्यापि रक्षसः ॥ ५० ॥  
> वैरं शतगुणं पश्य मम तैर्जीवितान्तकम् ।  
> सुघोरहृदयैः सौम्य राक्षसैः कामरूपिभिः ॥ ५१ ॥

‘सौम्य ! यह अवश्य ही किसी राक्षसका पदचिह्न दिखायी देता है । इन अत्यन्त क्रूर हृदयवाले कामरूपी राक्षसोंके साथ मेरा वैर सौगुना बढ़ गया है। देखो, यह वैर उनके प्राण लेकर ही शान्त होगा ॥ ५०-५१ ॥

> हृता मृता वा वैदेही भक्षिता वा तपस्विनी ।  
> न धर्मस्त्रायते सीतां ह्रियमाणां महावने ॥ ५२ ॥

‘अवश्य ही तपस्विनी विदेहराजकुमारी हर ली गयी, मृत्युको प्राप्त हो गयी अथवा राक्षसोंने उसे खा लिया । इस विशाल वनमें हरी जाती हुई सीताकी रक्षा धर्म भी नहीं कर रहा है ॥ ५२ ॥

> भक्षितायां हि वैदेह्यां हृतायामपि लक्ष्मण ।  
> के हि लोके प्रियं कर्तुं शक्ताः सौम्य ममेश्वराः ॥ ५३ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण ! जब विदेहनन्दिनी राक्षसोंका ग्रास बन गयी अथवा उनके द्वारा हर ली गयी और कोई सहायक नहीं हुआ, तब इस जगत्में कौन ऐसे पुरुष हैं, जो मेरा प्रिय करनेमें समर्थ हों ॥ ५३ ॥

> कर्तारमपि लोकानां शूरं करुणवेदिनम् ।  
> अज्ञानादवमन्येरन् सर्वभूतानि लक्ष्मण ॥ ५४ ॥

‘लक्ष्मण ! जो समस्त लोकोंकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले ‘त्रिपुर-विजय’ आदि शौर्यसे सम्पन्न महेश्वर हैं, वे भी जब अपने करुणामय स्वभावके कारण चुप बैठे रहते हैं, तब सारे प्राणी उनके ऐश्वर्यको न जाननेसे उनका तिरस्कार करने लग जाते हैं ॥ ५४ ॥

> मृदुं लोकहिते युक्तं दान्तं करुणवेदिनम् ।  
> निर्वीर्य इति मन्यन्ते नूनं मां त्रिदशेश्वराः ॥ ५५ ॥

‘मैं लोकहितमें तत्पर, युक्तचित्त, जितेन्द्रिय तथा जीवोंपर करुणा करनेवाला हूँ, इसीलिये ये इन्द्र आदि देवेश्वर निश्चय ही मुझे निर्बल मान रहे हैं ( तभी तो इन्होंने सीताकी रक्षा नहीं की है ) ॥ ५५ ॥

> मां प्राप्य हि गुणो दोषः संवृत्तः पश्य लक्ष्मण ।  
> अद्यैव सर्वभूतानां रक्षसामभवाय च ॥ ५६ ॥  
> संहृत्यैव शशिज्योत्स्नां महान् सूर्य इवोदितः ।  
> संहृत्यैव गुणान् सर्वान् मम तेजः प्रकाशते ॥ ५७ ॥

‘लक्ष्मण ! देखो तो सही, यह दयालुता आदि गुण मेरे पास आकर दोष बन गया ( तभी तो मुझे निर्बल मानकर मेरी स्त्रीका अपहरण किया गया है । अतः अब मुझे पुरुषार्थ ही प्रकट करना होगा ) । जैसे प्रलयकालमें उदित हुआ महान् सूर्य चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना ( चौंदनी ) का संहार करके प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार अब मेरा तेज आज ही समस्त प्राणियों तथा राक्षसोंका अन्त करनेके लिये मेरे उन कोमल स्वभाव आदि गुणोंको समेटकर प्रचण्डरूपमें प्रकाशित होगा, यह भी तुम देखो ॥ ५६-५७ ॥

> नैव यक्षा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः ।  
> किंनरा वा मनुष्या वा सुखं प्राप्स्यन्ति लक्ष्मण ॥ ५८ ॥

‘लक्ष्मण ! अब न तो यक्ष, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस, न किन्नर और न मनुष्य ही चैनसे रहने पायेंगे ॥५८॥

> ममास्त्रबाणसम्पूर्णमाकाशं पश्य लक्ष्मण ।  
> असम्पातं करिष्यामि ह्यद्य त्रैलोक्यचारिणाम् ॥ ५९ ॥

‘सुमित्रानन्दन ! देखना, थोड़ी ही देरमें आकाशको मैं अपने चलाये हुए बाणोंसे भर दूँगा और तीन लोकोंमें विचरनेवाले प्राणियोंको हिलने-डुलने भी न दूँगा ॥ ५९ ॥

> संनिरुद्धग्रहगणमावारितनिशाकरम्  ।  
> विप्रणष्टानलमरुद्भास्करद्युतिसंवृतम्  ॥ ६० ॥  
> विनिर्मथितशैलाग्रं शुष्यमाणजलाशयम् ।  
> ध्वस्तद्रुमलतागुल्मं विप्रणाशितसागरम् ॥ ६१ ॥  
> त्रैलोक्यं तु करिष्यामि संयुक्तं कालकर्मणा ।

‘ग्रहोंकी गति रुक जायगी, चन्द्रमा छिप जायगा, अग्नि, मरुद्गण तथा सूर्यका तेज नष्ट हो जायगा, सब कुछ अन्धकारसे आच्छन्न हो जायगा, पर्वतोंके शिखर मथ डाले जायँगे, सारे जलाशय ( नदी-सरोवर आदि ) सूख जायँगे, वृक्ष, लता और गुल्म नष्ट हो जायँगे और समुद्रोंका भी नाश कर दिया जायगा । इस तरह मैं सारी त्रिलोकीमें ही कालकी विनाशलीला आरम्भ कर दूँगा ॥ ६०-६१½ ॥

> न ते कुशलिनीं सीतां प्रदास्यन्ति ममेश्वराः ॥ ६२ ॥  
> अस्मिन् मुहूर्ते सौमित्रे मम द्रक्ष्यन्ति विक्रमम् ।

‘सुमित्रानन्दन ! यदि देवेश्वरगण इसी मुहूर्तमें मुझे सीता देवीको सकुशल नहीं लौटा देंगे तो वे मेरा पराक्रम देखेंगे ॥ ६२½ ॥

> नाकाशमुत्पतिष्यन्ति सर्वभूतानि लक्ष्मण ॥ ६३ ॥  
> मम चापगुणोन्मुक्तैर्बाणजालैर्निरन्तरम् ।

‘लक्ष्मण ! मेरे धनुषकी प्रत्यञ्चासे छूटे हुए बाणसमूहोंद्वारा आकाशके ठसाठस भर जानेके कारण उसमें कोई प्राणी उड़ नहीं सकेंगे ॥ ६३½ ॥

> मर्दितं मम नाराचैर्ध्वस्तभ्रान्तमृगद्विजम् ॥ ६४ ॥  
> समाकुलममर्यादं जगत् पश्याद्य लक्ष्मण ।

‘सुमित्रानन्दन ! देखो, आज मेरे नाराचोंसे रौंदा जाकर यह सारा जगत् व्याकुल और मर्यादारहित हो जायगा । यहाँके मृग और पक्षी आदि प्राणी नष्ट एवं उद्भ्रान्त हो जायँगे ॥ ६४½ ॥

> आकर्णपूर्णैरिषुभिर्जीवलोकदुरावरैः ॥ ६५ ॥  
> करिष्ये मैथिलीहेतोरपिशाचमराक्षसम् ।

‘धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये मेरे बाणोंको रोकना जीवजगत्के लिये बहुत कठिन होगा । मैं सीताके लिये उन बाणोंद्वारा इस जगत्के समस्त पिशाचों और राक्षसोंका संहार कर डालूँगा ॥ ६५½ ॥

> मम रोषप्रयुक्तानां विशिखानां बलं सुराः ॥ ६६ ॥  
> द्रक्ष्यन्त्यद्य विमुक्तानाममर्षाद् दूरगामिनाम् ।

‘रोष और अमर्षपूर्वक छोड़े गये मेरे फल-रहित दूरगामी बाणोंका बल आज देवतालोग देखेंगे ॥ ६६½ ॥

> नैव देवा न दैतेया न पिशाचा न राक्षसाः ॥ ६७ ॥  
> भविष्यन्ति मम क्रोधात् त्रैलोक्ये विप्रणाशिते ।

‘मेरे क्रोधसे त्रिलोकीका विनाश हो जानेपर न देवता रह जायँगे न दैत्य, न पिशाच रहने पायँगे न राक्षस ॥६७½॥

> देवदानवयक्षाणां लोका ये रक्षसामपि ॥ ६८ ॥  
> बहुधा निपतिष्यन्ति बाणौघैः शकलीकृताः ।

‘देवताओं, दानवों, यक्षों और राक्षसोंके जो लोक हैं, वे मेरे बाणसमूहोंसे टुकड़े-टुकड़े होकर बारंबार नीचे गिरेंगे ॥ ६८½ ॥

> निर्मर्यादानिमाँल्लोकान् करिष्यास्यद्य सायकैः॥६९॥  
> हृतां मृतां वा सौमित्रे न दास्यन्ति ममेश्वराः ।

‘सुमित्रानन्दन ! यदि देवेश्वरगण मेरी हरी या मरी हुई सीताको लाकर मुझे नहीं देंगे तो आज मैं अपने सायकोंकी मारसे इन तीनों लोकोंको मर्यादासे भ्रष्ट कर दूँगा ॥६९½॥

> तथारूपां हि वैदेहीं न दास्यन्ति यदि प्रियाम् ॥ ७० ॥  
> नाशयामि जगत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।  
> यावद् दर्शनमस्या वै तापयामि च सायकैः ॥ ७१ ॥

‘यदि वे मेरी प्रिया विदेहराजकुमारीको मुझे उसी रूपमें वापस नहीं लौटायेंगे तो मैं चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीका नाश कर डालूँगा । जबतक सीताका दर्शन न होगा; तबतक मैं अपने सायकोंसे समस्त संसारको संतप्त करता रहूँगा’ ॥ ७०-७१ ॥

> इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षः स्फुरमाणोष्ठसम्पुटः ।  
> वल्कलाजिनमाबद्ध्य जटाभारमबन्धयत् ॥ ७२ ॥

ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये, होठ फड़कने लगे । उन्होंने वल्कल और मृगचर्मको अच्छी तरह कसकर अपने जटाभारको भी बाँध लिया ॥ ७२ ॥

> तस्य क्रुद्धस्य रामस्य तथाभूतस्य धीमतः ।  
> त्रिपुरं जघ्नुषः पूर्वं रुद्रस्येव बभौ तनुः ॥ ७३ ॥

उस समय क्रोधमें भरकर उस तरह संहारके लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीरामका शरीर पूर्वकालमें त्रिपुरका संहार करनेवाले रुद्रके समान प्रतीत होता था ॥ ७३ ॥

> लक्ष्मणादथ चादाय रामो निष्पीड्य कार्मुकम् ।  
> शरमादाय संदीप्तं घोरमाशीविषोपमम् ॥ ७४ ॥  
> संदधे धनुषि श्रीमान् रामः परपुरञ्जयः ।  
> युगान्ताग्निरिव क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७५ ॥

उस समय लक्ष्मणके हाथसे धनुष लेकर श्रीरामचन्द्रजीने उसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और एक विषधर सर्पके समान भयंकर और प्रज्वलित बाण लेकर उसे उस धनुषपर रखा । तत्पश्चात् शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीराम प्रलयाग्निके समान कुपित हो इस प्रकार बोले—॥ ७४-७५ ॥

> यथा जरा यथा मृत्युर्यथा कालो यथा विधिः ।  
> नित्यं न प्रतिहन्यन्ते सर्वभूतेषु लक्ष्मण ।  
> तथाहं क्रोधसंयुक्तो न निवार्योऽस्म्यसंशयम् ॥ ७६ ॥

‘लक्ष्मण ! जैसे बुढ़ापा, जैसे मृत्यु, जैसे काल और जैसे विधाता सदा समस्त प्राणियोंपर प्रहार करते हैं, किंतु उन्हें कोई रोक नहीं पाता है, उसी प्रकार निस्संदेह क्रोधमें भर जानेपर मेरा भी कोई निवारण नहीं कर सकता ॥७६॥

> पुरेव मे चारुदतीमनिन्दितां  
> दिशन्ति सीतां यदि नाद्य मैथिलीम् ।  
> सदेवगन्धर्वमनुष्यपन्नगं  
> जगत्सशैलं परिवर्तयाम्यहम् ॥ ७७ ॥

‘यदि देवता आदि आज पहलेकी ही भाँति मनोहर दाँतोंवाली अनिन्द्यसुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीताको मुझे लौटा नहीं देंगे तो मैं देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और पर्वतोंसहित सारे संसारको उलट दूँगा’ ॥ ७७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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