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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 63"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 63

> सीतामपश्यन् धर्मात्मा शोकोपहतचेतनः ।  
> विललाप महाबाहू रामः कमललोचनः ॥ १ ॥

सीताको न देखकर शोकसे व्याकुलचित्त हुए धर्मात्मा महाबाहु कमलनयन श्रीराम विलाप करने लगे ॥ १ ॥

> पश्यन्निव च तां सोतामपश्यन्मन्मथार्दितः ।  
> उवाच राघवो वाक्यं विलापाश्रयदुर्वचम् ॥ २ ॥

रघुनाथजी सीताके प्रति अधिक प्रेमके कारण उनके वियोगमें कष्ट पा रहे थे । वे उन्हें न देखकर भी देखते हुएके समान ऐसी बात कहने लगे, जो विलापका आश्रय होनेसे गद्गदकण्ठके कारण कठिनतासे बोली जा रही थी—॥ २ ॥

> त्वमशोकस्य शाखाभिः पुष्पप्रियतरा प्रिये ।  
> आवृणोषि शरीरं ते मम शोकविवर्धनी ॥ ३ ॥

‘प्रिये ! तुम्हें फूल अधिक प्रिय हैं, इसलिये खिली हुई अशोककी शाखाओंसे अपने शरीरको छिपाती हो और मेरा शोक बढ़ा रही हो ॥ ३ ॥

> कदलीकाण्डसदृशौ कदल्या संवृतावुभौ ।  
> ऊरू पश्यामि ते देवि नासि शक्रा निगूहितुम् ॥ ४ ॥

‘देवि ! मैं केलेके तनोंके तुल्य और कदलीदलसे ही छिपे हुए तुम्हारे दोनों ऊरुओं ( जाँघों ) को देख रहा हूँ । तुम उन्हें छिपा नहीं सकती ॥ ४ ॥

> कर्णिकारवनं भद्रे हसन्ती देवि सेवसे ।  
> अलं ते परिहासेन मम बाधावहेन वै ॥ ५ ॥

‘भद्रे ! देवि ! तुम हँसती हुई कनेर-पुष्पोंकी वाटिकाका सेवन करती हो । बंद करो इस परिहासको, इससे मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है ॥ ५ ॥

> विशेषेणाश्रमस्थाने हासोऽयं न प्रशस्यते ।  
> अवगच्छामि ते शीलं परिहासप्रियं प्रिये ॥ ६ ॥  
> आगच्छ त्वं विशालाक्षि शून्योऽयमुटजस्तव ।

‘विशेषतः आश्रमके स्थानमें यह हास-परिहास अच्छा नहीं बताया जाता है । प्रिये ! मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्वभाव परिहासप्रिय है । विशाललोचने ! आओ । तुम्हारी यह पर्णशाला सूनी है’ ॥ ६½ ॥

> सुव्यक्तं राक्षसैः सीता भक्षिता वा हृतापि वा ॥ ७ ॥  
> न हि सा विलपन्तं मामुपसम्प्रैति लक्ष्मण ।

( फिर भ्रम दूर होनेपर वे सुमित्राकुमारसे बोले—) ‘लक्ष्मण ! अब तो भलीभाँति स्पष्ट हो गया कि राक्षसोंने सीताको खा लिया अथवा हर लिया; क्योंकि मैं विलाप कर रहा हूँ और वह मेरे पास नहीं आ रही है ॥ ७½ ॥

> एतानि मृगयूथानि साश्रुनेत्राणि लक्ष्मण ॥ ८ ॥  
> शंसन्तीव हि मे देवीं भक्षितां रजनीचरैः ।

‘लक्ष्मण ! ये जो मृगसमूह हैं, ये भी अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर मानो मुझसे यही कह रहे हैं कि देवी सीताको निशाचर खा गये ॥ ८½ ॥

> हा ममार्ये क यातासि हा साध्वि वरवर्णिनि ॥ ९ ॥  
> हा सकामाद्य कैकेयी देवि मेऽद्य भविष्यति ।

‘हा मेरी आर्ये ! ( आदरणीये ! ) तुम कहाँ चली गयी ? हा साध्वि ! हा वरवर्णिनि ! तुम कहाँ गयी ? हा देवि ! आज कैकेयी सफलमनोरथ हो जायगी ॥ ९½ ॥

> सीतया सह निर्यातो विना सीतामुपागतः ॥ १० ॥  
> कथं नाम प्रवेक्ष्यामि शून्यमन्तःपुरं मम ।

‘सीताके साथ अयोध्यासे निकला था । यदि सीताके बिना ही वहाँ लौटा तो अपने सूने अन्तःपुरमें कैसे प्रवेश करूँगा ॥ १०½ ॥

> निर्वीर्य इति लोको मां निर्दयश्चेति वक्ष्यति ॥ ११ ॥  
> कातरत्वं प्रकाशं हि सीतापनयनेन मे ।  
> निवृत्तवनवासश्च जनकं मिथिलाधिपम् ॥ १२ ॥  
> कुशलं परिपृच्छन्तं कथं शक्ष्ये निरीक्षितुम् ।

‘सारा संसार मुझे पराक्रमहीन और निर्दय कहेगा । सीताके अपहरणसे मेरी कायरता ही प्रकाशमें आयेगी ॥ ‘जब वनवाससे लौटनेपर मिथिलानरेश जनक मुझसे कुशल पूछने आयेंगे, उस समय मैं कैसे उनकी ओर देख सकूँगा ? ॥ १२½ ॥

> विदेहराजो नूनं मां दृष्ट्वा विरहितं तया ॥ १३ ॥  
> सुताविनाशसंतप्तो मोहस्य वशमेष्यति ।

‘मुझे सीतासे रहित देख बिदेहराज जनक अपनी पुत्रीके विनाशसे संतप्त हो निश्चय ही मूर्च्छित हो जायँगे ॥ १३½ ॥

> अथवा न गमिष्यामि पुरीं भरतपालिताम् ॥ १४ ॥  
> स्वर्गोऽपि हि तया हीनः शून्य एव मतो मम ।

‘अथवा अब मैं भरतद्वारा पालित अयोध्यापुरीको नहीं जाऊँगा । जानकीके बिना मुझे स्वर्ग भी सूना ही जान पड़ेगा ॥ १४½ ॥

> तन्मामुत्सृज्य हि वने गच्छायोध्यापुरीं शुभाम् ॥ १५ ॥  
> न त्वहं तां विना सीतां जीवेयं हि कथंचन ।

‘इसलिये अब तुम मुझे वनमें ही छोड़कर सुन्दर अयोध्यापुरीको लौट जाओ । मैं तो अब सीताके बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकता ॥ १५½ ॥

> गाढमाश्लिष्य भरतो वाच्यो मद्वचनात् त्वया ॥ १६ ॥  
> अनुज्ञातोऽसि रामेण पालयेति वसुंधराम् ।

‘भरतका गाढ़ आलिङ्गन करके तुम उनसे मेरा संदेश कह देना, ‘कैकेयीनन्दन ! तुम सारी पृथ्वीका पालन करो, इसके लिये रामने तुम्हें आज्ञा दे दी है ॥ १६½ ॥

> अम्बा च मम कैकेयी सुमित्रा च त्वया विभो ॥ १७ ॥  
> कौसल्या च यथान्यायमभिवाद्या ममाज्ञया ।  
> रक्षणीया प्रयत्नेन भवता सूक्तचारिणा ॥ १८ ॥

‘विभो ! मेरी माता कौसल्या, कैकेयी तथा सुमित्राको प्रतिदिन यथोचित रीतिसे प्रणाम करते हुए उन सबकी रक्षा करना और सदा उनकी आज्ञाके अनुसार चलना,’ यह तुम्हारे लिये मेरी आज्ञा है ॥ १७-१८ ॥

> सीतायाश्च विनाशोऽयं मम चामित्रसूदन ।  
> विस्तरेण जनन्या मे विनिवेद्यस्त्वया भवेत् ॥ १९ ॥

‘शत्रुसूदन ! मेरी माताके समक्ष सीताके विनाशका यह समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाना’ ॥ १९ ॥

> इति विलपति राघवे तु दीने  
> वनमुपगम्य तया विना सुकेश्या ।  
> भयविकलमुखस्तु लक्ष्मणोऽपि  
> व्यथितमना भृशमातुरो बभूव ॥ २० ॥

सुन्दर केशवाली सीताके विरहमें भगवान् श्रीराम वनके भीतर जाकर जब इस तरह दीनभावसे विलाप करने लगे, तब लक्ष्मणके भी मुखपर भयजनित व्याकुलताके चिह्न दिखायी देने लगे । उनका मन व्यथित हो उठा और वे अत्यन्त घबरा गये ॥ २० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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