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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 58"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 58

> राक्षसं मृगरूपेण चरन्तं कामरूपिणम् ।  
> निहत्य रामो मारीचं तूर्णं पथि न्यवर्तत ॥ १ ॥

इधर मृगरूपसे विचरते हुए उस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मारीचका वध करके श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही आश्रमके मार्गपर लौटे ॥ १ ॥

> तस्य संत्वरमाणस्य द्रष्टुकामस्य मैथिलीम् ।  
> क्रूरस्वनोऽथ गोमायुर्विननादास्य पृष्ठतः ॥ २ ॥

वे सीताको देखनेके लिये जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए आ रहे थे । इतनेहीमें पीछेकी ओरसे एक सियारिन बड़े कठोर स्वरमें चीत्कार करने लगी ॥ २ ॥

> स तस्य खरमाज्ञाय दारुणं रोमहर्षणम् ।  
> चिन्तयामास गोमायोः स्वरेण परिशङ्कितः ॥ ३ ॥

गीदड़ीके उस स्वरसे श्रीरामचन्द्रजीके मनमें कुछ शङ्का हुई । उसका स्वर बड़ा ही भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाला था । उसका अनुभव करके वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥ ३ ॥

> अशुभं बत मन्येऽहं गोमायुर्वाश्यते यथा ।  
> स्वस्ति स्यादपि वैदेह्या राक्षसैर्भक्षणं विना ॥ ४ ॥

वे मन-ही-मन कहने लगे—‘यह सियारिन जैसी बोली बोल रही है, इससे तो मुझे मालूम हो रहा है कि कोई अशुभ घटना घटित हो गयी । क्या विदेहनन्दिनी सीता कुशलसे होंगी ? उन्हें राक्षस तो नहीं खा गये ? ॥ ४ ॥

> मारीचेन तु विज्ञाय स्वरमालक्ष्य मामकम् ।  
> विक्रुष्टं मृगरूपेण लक्ष्मणः शृणुयाद् यदि ॥ ५ ॥

‘मृगरूपधारी मारीचने जान-बूझकर मेरे स्वरका अनुसरण करते हुए जो आर्त-पुकार की थी, वह इसलिये कि शायद इसे लक्ष्मण सुन सकें ॥ ५ ॥

> स सौमित्रिः स्वरं श्रुत्वा तां च हित्वाथ मैथिलीम् ।  
> तयैव प्रहितः क्षिप्रं मत्सकाशमिहैष्यति ॥ ६ ॥

‘सुमित्रानन्दन लक्ष्मण वह स्वर सुनते ही सीताके ही भेजनेपर उसे अकेली छोड़कर तुरंत मेरे पास यहाँ पहुँचनेके लिये चल देंगे ॥ ६ ॥

> राक्षसैः सहितैर्नूनं सीताया ईप्सितो वधः ।  
> काञ्चनश्च मृगो भूत्वा व्यपनीयाश्रमात्तु माम् ॥ ७ ॥  
> दूरं नीत्वाथ मारीचो राक्षसोऽभूच्छराहतः ।  
> हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति यद्वाक्यं व्याजहार ह ॥ ८ ॥

‘राक्षसलोग तो सबके सब मिलकर सीताका वध अवश्य कर देना चाहते हैं । इसी उद्देश्यसे यह मारीच राक्षस सोनेका मृग बनकर मुझे आश्रमसे दूर हटा ले आया था और मेरे बाणोंसे आहत होनेपर जो उसने आर्तनाद करते हुए कहा था कि ‘हा लक्ष्मण ! मैं मारा गया’ इसमें भी उसका वही उद्देश्य छिपा था ॥७-८॥

> अपि स्वस्ति भवेद् द्वाभ्यां रहिताभ्यां मया वने ।  
> जनस्थाननिमित्तं हि कृतवैरोऽस्मि राक्षसैः ॥ ९ ॥

वनमें हम दोनों भाइयोंके आश्रमसे अलग हो जानेपर क्या सीता सकुशल वहाँ रह सकेंगी ? जनस्थानमें जो राक्षसोंका संहार हुआ है, उसके कारण सारे राक्षस मुझसे वैर बाँधे ही हुए हैं ॥ ९ ॥

> निमित्तानि च घोराणि दृश्यन्तेऽद्य बहूनि च ।  
> इत्येवं चिन्तयन् रामः श्रुत्वा गोमायुनिःस्वनम् ॥ १० ॥  
> निवर्तमानस्त्वरितो जगामाश्रममात्मवान् ।

‘आज बहुत-से भयङ्कर अपशकुन भी दिखायी देते हैं ।‘ सियारिनकी बोली सुनकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए मनको वशमें रखनेवाले श्रीराम तुरंत लौटकर आश्रमकी ओर चले ॥ १०½ ॥

> आत्मनश्चापनयनं मृगरूपेण रक्षसा ॥ ११ ॥  
> आजगाम जनस्थानं राघवः परिशङ्कितः ।

मृगरूपधारी राक्षसके द्वारा अपनेको आश्रमसे दूर हटानेकी घटनापर विचार करके श्रीरघुनाथजी शङ्कित-हृदयसे जनस्थानको आये ॥ ११½ ॥

> तं दीनमानसं दीनमासेदुर्मृगपक्षिणः ॥ १२ ॥  
> सव्यं कृत्वा महात्मानं घोरांश्च ससृजुः स्वरान् ।

उनका मन बहुत दुखी था । वे दीन हो रहे थे । उसी अवस्थामें वनके मृग और पक्षी उन्हें बाँयें रखते हुए वहाँ आये और भयङ्कर स्वरमें अपनी बोली बोलने लगे॥ १२½ ॥

> तानि दृष्ट्वा निमित्तानि महाघोराणि राघवः ।  
> न्यवर्तताथ त्वरितो जवेनाश्रममात्मनः ॥ १३ ॥

उन महाभयङ्कर अपशकुनोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही बड़े वेगसे अपने आश्रमकी ओर लौटे ॥ १३ ॥

> ततो लक्ष्मणमायान्तं ददर्श विगतप्रभम् ।  
> ततोऽविदूरे रामेण समीयाय स लक्ष्मणः ॥ १४ ॥

इतनेहीमें उन्हें लक्ष्मण आते दिखायी दिये । उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी । थोड़ी ही देरमें निकट आकर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीसे मिले ॥ १४ ॥

> विषण्णः सन् विषण्णेन दुःखितो दुःखभागिना ।  
> स जगर्हेऽथ तं भ्राता दृष्ट्वा लक्ष्मणमागतम् ॥ १५ ॥  
> विहाय सीतां विजने वने राक्षससेविते ।

दुःख और विषादमें डूबे हुए लक्ष्मणने दुखी और विषादग्रस्त श्रीरामचन्द्रजीसे भेंट की । उस समय राक्षसोंसे सेवित निर्जन वनमें सीताको अकेली छोड़कर आये हुए लक्ष्मणको देख भाई श्रीरामने उनकी निन्दा की ॥ १५½ ॥

> गृहीत्वा च करं सव्यं लक्ष्मणं रघुनन्दनः ॥ १६ ॥  
> उवाच मधुरोदर्कमिदं परुषमार्तवत् ।

लक्ष्मणका बायाँ हाथ पकड़कर रघुनन्दन आर्त-से हो गये और पहले कठोर तथा अन्तमें मधुर वाणीद्वारा इस प्रकार बोले—॥ १६½ ॥

> अहो लक्ष्मण गर्ह्यं ते कृतं यत्त्वं विहाय ताम् ॥ १७ ॥  
> सीतामिहागतः सौम्य कच्चित् स्वस्ति भवेदिति ।

‘अहो सौम्य लक्ष्मण ! यह तुमने बहुत बुरा किया, जो सीताको अकेली छोड़कर यहाँ चले आये । क्या वहाँ सीता सकुशल होगी ? ॥ १७½ ॥

> न मेऽस्ति संशयो वीर सर्वथा जनकात्मजा ॥ १८ ॥  
> विनष्टा भक्षिता वापि राक्षसैर्वनचारिभिः ।

‘वीर ! मुझे इस बातमें संदेह नहीं है कि वनमें विचरनेवाले राक्षसोंने जनककुमारी सीताको या तो सर्वथा नष्ट कर दिया होगा या वे उन्हें खा गये होंगे ॥ १८½ ॥

> अशुभान्येव भूयिष्ठं यथा प्रादुर्भवन्ति मे ॥ १९ ॥  
> अपि लक्ष्मण सीतायाः सामर्थ्यं प्राप्नुयामहे ।  
> जीवन्त्याः पुरुषव्याघ्र सुताया जनकस्य वै ॥ २० ॥  
> यथा वै मृगसंघाश्च गोमायुश्चैव भैरवम् ।  
> वाश्यन्ते शकुनाश्चापि प्रदीप्तामभितो दिशम् ।  
> अपि स्वस्ति भवेत् तस्या राजपुत्र्या महाबल ॥ २१ ॥

‘क्योंकि मेरे आसपास बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। पुरुषसिंह लक्ष्मण ! क्या हमलोग जीती-जागती हुई जनकदुलारी सीताको पूर्णतः स्वस्थ एवं सकुशल पा सकेंगे? ॥ ‘महाबली लक्ष्मण ! ये मृगोंके झुंड ( दाहिनी ओरसे आकर ) जैसा अमङ्गल सूचित कर रहे हैं, ये गीदड़ जिस तरह भैरवनाद कर रहे हैं तथा जलती-सी प्रतीत होनेवाली सम्पूर्ण दिशाओंमें पक्षी जिस तरहकी बोली बोल रहे हैं— इन सबसे यही अनुमान होता है कि राजकुमारी सीता शायद ही कुशलसे हों ॥ २१ ॥

> इदं हि रक्षो मृगसंनिकाशं  
> प्रलोभ्य मां दूरमनुप्रयातम् ।  
> हतं कथंचिन्महता श्रमेण  
> स राक्षसोऽभून्म्रियमाण एव ॥ २२ ॥

‘यह राक्षस मृगके समान रूप धारण करके मुझे लुभाकर दूर चला आया था । महान् परिश्रम करके जब मैंने इसे किसी तरह मारा, तब यह मरते ही राक्षस हो गया ॥ २२ ॥

> मनश्च मे दीनमिहाप्रहृष्टं  
> चक्षुश्च सव्यं कुरुते विकारम् ।  
> असंशयं लक्ष्मण नास्ति सीता  
> हृता मृता वा पथि वर्तते वा ॥ २३ ॥

‘लक्ष्मण ! अतः मेरा मन अत्यन्त दीन और अप्रसन्न हो रहा है । मेरी बाँयीं आँख फड़क रही है, इससे जान पड़ता है, निःसंदेह आश्रमपर सीता नहीं है । उसे कोई हर ले गया, वह मारी गयी अथवा ( किसी राक्षसके साथ ) मार्गमें होगी’ ॥ २३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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