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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 49"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 49

> सीताया वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् ।  
> हस्ते हस्तं समाहत्य चकार सुमहद् वपुः ॥ १ ॥

सीताके इस वचनको सुनकर प्रतापी दशमुख रावणने अपने हाथपर हाथ मारकर शरीरको बहुत बड़ा बना लिया ॥ १ ॥

> स मैथिलीं पुनर्वाक्यं बभाषे वाक्यकोविदः ।  
> नोन्मत्तया श्रुतौ मन्ये मम वीर्यपराक्रमौ ॥ २ ॥

वह बातचीत करनेकी कला जानता था । उसने मिथिलेशकुमारी सीतासे फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—‘मेरी समझमें तुम पागल हो गयी हो, इसीलिये तुमने मेरे बल और पराक्रमकी बातें अनसुनी कर दी हैं ॥ २ ॥

> उद्वहेयं भुजाभ्यां तु मेदिनीमम्बरे स्थितः ।  
> आपिबेयं समुद्रं च मृत्युं हन्यां रणे स्थितः ॥ ३ ॥

‘अरी ! मैं आकाशमें खड़ा हो इन दोनों भुजाओंसे ही सारी पृथ्वीको उठा ले जा सकता हूँ । समुद्रको पी जा सकता हूँ और युद्धमें स्थित हो मौतको भी मार सकता हूँ ॥ ३ ॥

> अर्कं तुर्धां शरैस्तीक्ष्णैर्विभिन्द्यां हि महीतलम् ।  
> कामरूपेण उन्मत्ते पश्य मां कामरूपिणम् ॥ ४ ॥

‘काम तथा रूपसे उन्मत्त रहनेवाली नारी ! यदि चाहूँ तो अपने तीखे बाणोंसे सूर्यको भी व्यथित कर दूँ और इस भूतलको भी विदीर्ण कर डालूँ । मैं इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हूँ । तुम मेरी ओर देखो’ ॥ ४ ॥

> एवमुक्तवतस्तस्य रावणस्य शिखिप्रभे ।  
> क्रुद्धस्य हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्रे बभूवतुः ॥ ५ ॥

ऐसा कहते-कहते क्रोधसे भरे हुए रावणकी आँखें, जिनके प्रान्तभाग काले थे, जलती आगके समान लाल हो गयीं ॥ ५ ॥

> सद्यः सौम्यं परित्यज्य तीक्ष्णरूपं स रावणः ।  
> स्वं रूपं कालरूपाभं भेजे वैश्रवणानुजः ॥ ६ ॥

कुबेरके छोटे भाई रावणने तत्काल अपने सौम्य रूपको त्यागकर तीखा एवं कालके समान विकराल अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया ॥ ६ ॥

> संरक्तनयनः श्रीमांस्तप्तकाञ्चनभूषणः ।  
> क्रोधेन महताविष्टो नीलजीमूतसंनिभः ॥ ७ ॥

उस समय श्रीमान् रावणके सभी नेत्र लाल हो रहे थे । वह पक्के सोनेके आभूषणोंसे अलंकृत था और महान् क्रोधसे आविष्ट हो नीलमेघके समान काला दिखायी देने लगा ॥ ७ ॥

> दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः ।  
> स परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत् ॥ ८ ॥

वह विशालकाय निशाचर परिव्राजकके उस छद्मवेशको त्यागकर दस मुखों और बीस भुजाओंसे संयुक्त हो गया ॥ ८ ॥

> प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिपः ।  
> रक्ताम्बरधरस्तस्थौ स्त्रीरत्नं प्रेक्ष्य मैथिलीम् ॥ ९ ॥

उस समय राक्षसराज रावणने अपने सहज रूपको ग्रहण कर लिया और लाल रंगके वस्त्र पहनकर वह स्त्री-रत्न सीताकी ओर देखता हुआ खड़ा हो गया ॥ ९ ॥

> स तामसितकेशान्तां भास्करस्य प्रभामिव ।  
> वसनाभरणोपेतां मैथिलीं रावणोऽब्रवीत् ॥ १० ॥  
> त्रिषु लोकेषु विख्यातं यदि भर्तारमिच्छसि ।  
> मामाश्रय वरारोहे तवाहं सदृशः पतिः ॥ ११ ॥

काले केशवाली मैथिली वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सूर्यकी प्रभा-सी जान पड़ती थीं। रावणने उनसे कहा–॥ ‘वरारोहे ! यदि तुम तीनों लोकोंमें विख्यात पुरुषको अपना पति बनाना चाहती हो तो मेरा आश्रय लो। मैं ही तुम्हारे योग्य पति हूँ ॥ ११ ॥

> मां भजस्व चिराय त्वमहं श्लाघ्यः पतिस्तव ।  
> नैव चाहं क्वचिद् भद्रे करिष्ये तव विप्रियम् ॥ १२ ॥

‘भद्रे ! मुझे सुदीर्घकालके लिये स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये स्पृहणीय एवं प्रशंसनीय पति होऊँगा तथा कभी तुम्हारे मनके प्रतिकूल कोई बर्ताव नहीं करूँगा ॥ १२ ॥

> त्यज्यतां मानुषो भावो मयि भावः प्रणीयताम् ।  
> राज्याच्च्युतमसिद्धार्थं रामं परिमितायुषम् ॥ १३ ॥  
> कैर्गुणैरनुरक्तासि मूढे पण्डितमानिनि ।

‘मनुष्य रामके विषयमें जो तुम्हारा अनुराग है, उसे त्याग दो और मुझसे स्नेह करो। अपनेको पण्डित ( बुद्धिमती ) माननेवाली मूढ़ नारी ! जो राज्यसे भ्रष्ट है, जिसका मनोरथ सफल नहीं हुआ तथा जिसकी आयु सीमित है, उस राममें किन गुणोंके कारण तुम अनुरक्त हो ॥ १३½ ॥

> यः स्त्रियो वचनाद् राज्यं विहाय ससुहृज्जनम् ॥ १४ ॥  
> अस्मिन् व्यालानुचरिते वने वसति दुर्मतिः ।

‘जो एक स्त्रीके कहनेसे सुहृदोंसहित सारे राज्यका त्याग करके इस हिंसक जन्तुओंसे सेवित वनमें निवास करता है, उसकी बुद्धि कैसी खोटी है ? ( वह सर्वथा मूढ़ है )’ ॥ १४½ ॥

> इत्युक्त्वा मैथिलीं वाक्यं प्रियार्हां प्रियवादिनीम् ॥  
> अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः ।  
> जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीमिव ॥ १६ ॥

जो प्रिय वचन सुननेके योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलनेवाली थीं, उस मिथिलेशकुमारी सीतासे ऐसा अप्रिय वचन कहकर कामसे मोहित हुए उस अत्यन्त दुष्टात्मा राक्षस रावणने निकट जाकर ( माताके समान आदरणीया ) सीताको पकड़ लिया, मानो बुधने आकाशमें अपनी माता रोहिणीको पकड़नेका दुस्साहस किया हो॥ ॥ १५–१६ ॥

> वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः ।  
> ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥ १७ ॥

उसने बायें हाथसे कमलनयनी सीताके केशोंसहित मस्तकको पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जाँघोंके नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया ॥ १७ ॥

> तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाभुजम् ।  
> प्राद्रवन् मृत्युसंकाशं भयार्ता वनदेवताः ॥ १८ ॥

उस समय तीखी दाढ़ों और विशाल भुजाओंसे युक्त पर्वतशिखरके समान प्रतीत होनेवाले उस कालके समान विकराल राक्षसको देखकर वनके समस्त देवता भयभीत होकर भाग गये ॥ १८ ॥

> स च मायामयो दिव्यः खरयुक्तः खरस्वनः ।  
> प्रत्यदृश्यत हेमाङ्गो रावणस्य महारथः ॥ १९ ॥

इतनेहीमें गधोंसे जुता हुआ और गधोंके समान ही शब्द करनेवाला रावणका वह विशाल सुवर्णमय मायानिर्मित दिव्य रथ वहाँ दिखायी दिया ॥ १९ ॥

> ततस्तां परुषैर्वाक्यैरभितर्ज्य महास्वनः ।  
> अंकेनादाय वैदेहीं रथमारोपयत् तदा ॥ २० ॥

रथके प्रकट होते ही जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले रावणने कठोर वचनोंद्वारा विदेहनन्दिनी सीताको डाँटा और पूर्वोक्त रूपसे गोदमें उठाकर तत्काल रथपर बिठा दिया ॥ २० ॥

> सा गृहीतातिचुक्रोश रावणेन यशस्विनी ।  
> रामेति सीता दुःखार्ता रामं दूरं गतं वने ॥ २१ ॥

रावणके द्वारा पकड़ी जानेपर यशस्विनी सीता दुःखसे व्याकुल हो गयीं और वनमें दूर गये हुए श्रीरामचन्द्रजीको ‘हे राम !’ कहकर जोर-जोरसे पुकारने लगीं ॥ २१ ॥

> तामकामां स कामार्तः पन्नगेन्द्रवधूमिव ।  
> विचेष्टमानामादाय उत्पपाताथ रावणः ॥ २२ ॥

सीताके मनमें रावणकी कामना नहीं थी—वे उसकी ओरसे सर्वथा विरक्त थीं और उसकी कैदसे अपनेको छुड़ानेके लिये चोट खायी हुई नागिनकी तरह उस रथपर छटपटा रही थीं । उसी अवस्थामें कामपीड़ित राक्षस उन्हें लेकर आकाशमें उड़ चला ॥ २२ ॥

> ततः सा राक्षसेन्द्रेण ह्रियमाणा विहायसा ।  
> भृशं चुक्रोश मत्तेव भ्रान्तचित्ता यथातुरा ॥ २३ ॥

राक्षसराज जब सीताको हरकर आकाशमार्गसे ले जाने लगा, उस समय उनका चित्त भ्रमित हो उठा । वे पगली-सी हो गयीं और दुःखसे आतुर-सी होकर जोर-जोरसे विलाप करने लगीं—॥ २३ ॥

> हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक ।  
> ह्रियमाणां न जानीषे रक्षसा कामरूपिणा ॥ २४ ॥

‘हा महाबाहु लक्ष्मण ! तुम गुरुजनोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हो । इस समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला राक्षस मुझे हरकर लिये जाता है, किंतु तुम्हें इसका पता नहीं है ॥ २४ ॥

> जीवितं सुखमर्थं च धर्महेतोः परित्यजन् ।  
> ह्रियमाणामधर्मेण मां राघव न पश्यसि ॥ २५ ॥

‘हा रघुनन्दन ! आपने धर्मके लिये प्राणोंका मोह, शरीरका सुख तथा राज्य-वैभव सब कुछ छोड़ दिया है । यह राक्षस मुझे अधर्मपूर्वक हरकर लिये जा रहा है, परंतु आप नहीं देखते हैं ॥ २५ ॥

> ननु नामाविनीतानां विनेतासि परंतप ।  
> कथमेवंविधं पापं न त्वं शाधि हि रावणम् ॥ २६ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले आर्यपुत्र ! आप तो कुमार्गपर चलनेवाले उद्दण्ड पुरुषोंको दण्ड देकर उन्हें राहपर लानेवाले हैं, फिर ऐसे पापी रावणको क्यों नहीं दण्ड देते हैं ॥ २६ ॥

> न तु सद्योऽविनीतस्य दृश्यते कर्मणः फलम् ।  
> कालोऽप्यङ्गीभवत्यत्र सस्यानामिव पक्तये ॥ २७ ॥

‘उद्दण्ड पुरुषके उद्दण्डतापूर्ण कर्मका फल तत्काल मिलता नहीं दिखायी देता है; क्योंकि इसमें काल भी सहकारी कारण होता है, जैसे कि खेतीके पकनेके लिये तदनुकूल समयकी अपेक्षा होती है ॥ २७ ॥

> त्वं कर्म कृतवानेतत् कालोपहतचेतनः ।  
> जीवितान्तकरं घोरं रामाद् व्यसनमाप्नुहि ॥ २८ ॥

‘रावण ! तेरे सिरपर काल नाच रहा है । उसीने तेरी विचारशक्ति नष्ट कर दी है, इसीलिये तूने ऐसा पापकर्म किया है । तुझे श्रीरामसे वह भयंकर संकट प्राप्त हो, जो तेरे प्राणोंका अन्त कर डाले ॥ २८ ॥

> हन्तेदानीं सकामा तु कैकेयी बान्धवैः सह ।  
> ह्रियेयं धर्मकामस्य धर्मपत्नी यशस्विनः ॥ २९ ॥

‘हाय ! इस समय कैकेयी अपने बन्धु-बान्धवोंसहित सफलमनोरथ हो गयी; क्योंकि धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले यशस्वी श्रीरामकी धर्मपत्नी होकर भी मैं एक राक्षसद्वारा हरी जा रही हूँ ॥ २९ ॥

> आमन्त्रये जनस्थाने कर्णिकारांश्च पुष्पितान् ।  
> क्षिप्रं रामाय शंसध्वं सीतां हरति रावणः ॥ ३० ॥

‘मैं जनस्थानमें खिले हुए कनेर वृक्षोंसे प्रार्थना करती हूँ, तुमलोग शीघ्र ही श्रीरामसे कहना कि सीताको रावण हर ले जा रहा है ॥ ३० ॥

> हंससारससंघुष्टां वन्दे गोदावरीं नदीम् ।  
> क्षिप्रं रामाय शंस त्वं सीतां हरति रावणः ॥ ३१ ॥

‘हंसों और सारसोंके कलरवोंसे मुखरित हुई गोदावरी नदीको मैं प्रणाम करती हूँ । माँ ! तुम श्रीरामसे शीघ्र ही कह देना, सीताको रावण हर ले जा रहा है ॥ ३१ ॥

> दैवतानि च यान्यस्मिन् वने विविधपादपे ।  
> नमस्करोम्यहं तेभ्यो भर्तुः शंसत मां हृताम् ॥ ३२ ॥

‘इस वनके विभिन्न वृक्षोंपर निवास करनेवाले जो-जो देवता हैं, उन सबको मैं नमस्कार करती हूँ । आप सब लोग शीघ्र ही मेरे स्वामीको सूचना दे दें कि आपकी स्त्रीको राक्षस हर ले गया ॥ ३२ ॥

> यानि कानिचिदप्यत्र सत्त्वानि विविधानि च ।  
> सर्वाणि शरणं यामि मृगपक्षिगणानि वै ॥ ३३ ॥  
> ह्रियमाणां प्रियां भर्तुः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम् ।  
> विवशा ते हृता सीता रावणेनेति शंसत ॥ ३४ ॥

‘यहाँ पशु-पक्षी आदि जो कोई भी नाना प्रकारके प्राणी रहते हों, उन सबकी मैं शरण लेती हूँ । वे मेरे स्वामी श्रीरामचन्द्रजीसे कहें कि जो आपको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय थी, वह सीता हरी गयी । आपकी सीताको असहाय अवस्थामें रावण हर ले गया ॥ ३३-३४ ॥

> विदित्वा तु महाबाहुरमुत्रापि महाबलः ।  
> आनेष्यति पराक्रम्य वैवस्वतहृतामपि ॥ ३५ ॥

‘महाबाहु श्रीराम बड़े बलवान् हैं । वे मुझे परलोकमें भी गयी हुई जान लें तो यमराजके द्वारा अपहृत होनेपर भी मुझको पराक्रमपूर्वक वहाँसे लौटा लायेंगे’ ॥ ३५ ॥

> सा तदा करुणा वाचो विलपन्ती सुदुःखिता ।  
> वनस्पतिगतं गृध्रं ददर्शायतलोचना ॥ ३६ ॥

उस समय अत्यन्त दुखी हो करुणाजनक बातें कहकर विलाप करती हुई विशाललोचना सीताने एक वृक्षपर बैठे हुए गृध्रराज जटायुको देखा ॥ ३६ ॥

> सा तमुद्वीक्ष्य सुश्रोणी रावणस्य वशंगता ।  
> समाक्रन्दद् भयपरा दुःखोपहतया गिरा ॥ ३७ ॥

रावणके वशमें पड़ जानेके कारण सुन्दरी सीता अत्यन्त भयभीत हो रही थीं । जटायुको देखकर वे दुःखभरी वाणीमें करुण क्रन्दन करने लगीं—॥ ३७ ॥

> जटायो पश्य मामार्य ह्रियमाणामनाथवत् ।  
> अनेन राक्षसेन्द्रेणाकरुणं पापकर्मणा ॥ ३८ ॥

‘आर्य जटायो ! देखिये, यह पापाचारी राक्षसराज अनाथकी भाँति मुझे निर्दयतापूर्वक हरकर लिये जा रहा है ॥ ३८ ॥

> नैष वारयितुं शक्यस्त्वया क्रूरो निशाचरः ।  
> सत्त्ववाञ्जितकाशी च सायुधश्चैव दुर्मतिः ॥ ३९ ॥

‘परंतु आप इस क्रूर निशाचरको रोक नहीं सकते; क्योंकि यह बलवान् है, अनेक युद्धोंमें विजय पानेके कारण इसका दुस्साहस बढ़ा हुआ है । इसके हाथोंमें हथियार है और इसके मनमें दुष्टता भी भरी हुई है ॥ ३९ ॥

> रामाय तु यथातत्त्वं जटायो हरणं मम ।  
> लक्ष्मणाय च तत् सर्वमाख्यातव्यमशेषतः ॥ ४० ॥

‘आर्य जटायो ! जिस प्रकार मेरा अपहरण हुआ है, यह सब समाचार आप श्रीराम और लक्ष्मणसे ज्यों-का-त्यों पूर्णरूपसे बता दीजियेगा’ ॥ ४० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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