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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 47"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 47

> रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा।  
> परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना ॥ १ ॥

सीताको हरनेकी इच्छासे परिव्राजक ( संन्यासी ) का रूप धारण करके आये हुए रावणने उस समय जब विदेहराजकुमारीसे इस प्रकार पूछा, तब उन्होंने स्वयं ही अपना परिचय दिया ॥ १ ॥

> ब्राह्मणश्चातिथिश्चैष अनुक्तो हि शपेत माम्।  
> इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥

वे दो घड़ीतक इस विचारमें पड़ी रहीं कि ये ब्राह्मण और अतिथि हैं, यदि इनकी बातका उत्तर न दिया जाय तो ये मुझे शाप दे देंगे । यह सोचकर सीताने इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २ ॥

> दुहिता जनकस्याहं मैथिलस्य महात्मनः।  
> सीता नाम्नास्मि भद्रं ते रामस्य महिषी प्रिया ॥ ३ ॥

‘ब्रह्मन् ! आपका भला हो । मैं मिथिलानरेश महात्मा जनककी पुत्री और अवधनरेश श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी रानी हूँ । मेरा नाम सीता है ॥ ३ ॥

> उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।  
> भुञ्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी ॥ ४ ॥

‘विवाहके बाद बारह वर्षोंतक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथके महलमें रहकर मैंने अपने पतिके साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं । मैं वहाँ सदा मनोवाञ्छित सुख-सुविधाओंसे सम्पन्न रही हूँ ॥ ४ ॥

> तत्र त्रयोदशे वर्षे राजामन्त्रयत प्रभुः।  
> अभिषेचयितुं रामं समेतो राजमन्त्रिभिः ॥ ५ ॥

‘तेरहवें वर्षके प्रारम्भमें सामर्थ्यशाली महाराज दशरथने राजमन्त्रियोंसे मिलकर सलाह की और श्रीरामचन्द्रजीका युवराजपदपर अभिषेक करनेका निश्चय किया ॥ ५ ॥

> तस्मिन् सम्भ्रियमाणे तु राघवस्याभिषेचने।  
> कैकेयी नाम भर्तारं ममार्या याचते वरम् ॥ ६ ॥

‘जब श्रीरघुनाथजीके राज्याभिषेककी सामग्री जुटायी जाने लगी, उस समय मेरी सास कैकेयीने अपने पतिसे वर माँगा ॥ ६ ॥

> परिगृह्य तु कैकेयी श्वशुरं सुकृतेन मे।  
> मम प्रव्राजनं भर्तुर्भरतस्याभिषेचनम् ॥ ७ ॥  
> द्वावयाचत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्।

‘कैकेयीने मेरे श्वशुरको पुण्यकी शपथ दिलाकर वचन-बद्ध कर लिया, फिर अपने सत्यप्रतिज्ञ पति उन राजशिरो-मणिसे दो वर माँगे—मेरे पतिके लिये वनवास और भरतके लिये राज्याभिषेक ॥ ७½ ॥

> नाद्य भोक्ष्ये न च स्वप्स्ये न पास्ये न कदाचन ॥ ८ ॥  
> एष मे जीवितस्यान्तो रामो यद्भिषिच्यते।

‘कैकेयी हठपूर्वक कहने लगीं—यदि आज श्रीरामका अभिषेक किया गया तो मैं न तो खाऊँगी, न पीऊँगी और न कभी सोऊँगी ही । यही मेरे जीवनका अन्त होगा ॥ ८ ॥

> इति ब्रुवाणां कैकेयीं श्वशुरो मे स पार्थिवः ॥ ९ ॥  
> अयाचतार्थैरन्वर्थैर्न च याच्ञां चकार सा।

‘ऐसी बात कहती हुई कैकेयीसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथने यह याचना की कि ‘तुम सब प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ ले लो; किंतु श्रीरामके अभिषेकमें विघ्न न डालो ।’ किंतु कैकेयीने उनकी वह याचना सफल नहीं की ॥ ९½ ॥

> मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः ॥ १० ॥  
> अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।

‘उस समय मेरे महातेजस्वी पतिकी अवस्था पचीस सालसे ऊपरकी थी और मेरे जन्मकालसे लेकर वनगमन-कालतक मेरी अवस्था वर्षगणनाके अनुसार अठारह सालकी हो गयी थी ॥ १०½ ॥

> रामेति प्रथितो लोके सत्यवाञ्शीलवाञ्शुचिः ॥ ११ ॥  
> विशालाक्षो महाबाहुः सर्वभूतहिते रतः।

‘श्रीराम जगत्में सत्यवादी, सुशील और पवित्र रूपसे विख्यात हैं । उनके नेत्र बड़े-बड़े और भुजाएँ विशाल हैं । वे समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ ११½ ॥

> कामार्तश्च महाराजः पिता दशरथः स्वयम् ॥ १२ ॥  
> कैकेय्याः प्रियकामार्थं तं रामं नाभ्यषेचयत् ।

‘उनके पिता महाराज दशरथने स्वयं कामपीड़ित होनेके कारण कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे श्रीरामका अभिषेक नहीं किया ॥ १२½ ॥

> अभिषेकाय तु पितुः समीपं राममागतम् ॥ १३ ॥  
> कैकेयी मम भर्तारमित्युवाच द्रुतं वचः ।

‘श्रीरामचन्द्रजी जब अभिषेकके लिये पिताके समीप आये, तब कैकेयीने मेरे उन पतिदेवसे तुरंत यह बात कही ॥ १३½ ॥

> तव पित्रा समाज्ञप्तं ममेदं शृणु राघव ॥ १४ ॥  
> भरताय प्रदातव्यमिदं राज्यमकण्टकम् ।  
> त्वया तु खलु वस्तव्यं नव वर्षाणि पञ्च च ॥ १५ ॥  
> वने प्रव्रज काकुत्स्थ पितरं मोचयानृतात् ।

‘रघुनन्दन ! तुम्हारे पिताने जो आज्ञा दी है, इसे मेरे मुँहसे सुनो । यह निष्कण्टक राज्य भरतको दिया जायगा, तुम्हें तो चौदह वर्षोंतक वनमें ही निवास करना होगा । काकुत्स्थ ! तुम वनको जाओ और पिताको असत्यके बन्धनसे छुड़ाओ ॥ १४–१५½ ॥

> तथेत्युवाच तां रामः कैकेयीमकुतोभयः ॥ १६ ॥  
> चकार तद्वचः श्रुत्वा भर्ता मम दृढव्रतः ।

‘किसीसे भी भय न माननेवाले श्रीरामने कैकेयीकी वह बात सुनकर कहा—‘बहुत अच्छा’ । उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया । मेरे स्वामी दृढ़तापूर्वक अपनी प्रतिज्ञाका पालन करनेवाले हैं ॥ १६½ ॥

> दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम् ॥ १७ ॥  
> एतद् ब्राह्मण रामस्य व्रतं धृतमनुत्तमम् ।

‘श्रीराम केवल देते हैं, किसीसे कुछ लेते नहीं । वे सदा सत्य बोलते हैं, झूठ नहीं । ब्राह्मण ! यह श्रीरामचन्द्रजीका सर्वोत्तम व्रत है, जिसे उन्होंने धारण कर रखा है ॥ १७½ ॥

> तस्य भ्राता तु वैमात्रो लक्ष्मणो नाम वीर्यवान् ॥ १८ ॥  
> रामस्य पुरुषव्याघ्रः सहायः समरेऽरिहा ।  
> स भ्राता लक्ष्मणो नाम ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥ १९ ॥

‘श्रीरामके सौतेले भाई लक्ष्मण बड़े पराक्रमी हैं । समरभूमिमें शत्रुओंका संहार करनेवाले पुरुषसिंह लक्ष्मण श्रीरामके सहायक हैं, बन्धु हैं, ब्रह्मचारी और उत्तम व्रतका दृढ़तापूर्वक पालन करनेवाले हैं ॥ १८-१९ ॥

> अन्वगच्छद् धनुष्पाणिः प्रव्रजन्तं मया सह ।  
> जटी तापसरूपेण मया सह सहानुजः ॥ २० ॥  
> प्रविष्टो दण्डकारण्यं धर्मनित्यो दृढव्रतः ।

‘श्रीरघुनाथजी मेरे साथ जब बनमें आने लगे, तब लक्ष्मण भी हाथमें धनुष लेकर उनके पीछे हो लिये । इस प्रकार मेरे और अपने छोटे भाईके साथ श्रीराम इस दण्डकारण्यमें आये हैं । वे दृढ़प्रतिज्ञ तथा नित्य-निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं और सिरपर जटा धारण किये तपस्वीके वेशमें यहाँ रहते हैं ॥ २०½ ॥

> ते वयं प्रच्युता राज्यात् कैकेय्यास्तु कृते त्रयः ॥ २१ ॥  
> विचराम द्विजश्रेष्ठ वनं गम्भीरमोजसा ।  
> समाश्वस मुहूर्तं तु शाक्यं वस्तुमिह त्वया ॥ २२ ॥  
> आगमिष्यति मे भर्ता वन्यमादाय पुष्कलम् ।

‘द्विजश्रेष्ठ ! इस प्रकार हम तीनों कैकेयीके कारण राज्यसे वञ्चित हो इस गम्भीर वनमें अपने ही बलके भरोसे बिचरते हैं । आप यहाँ ठहर सकें तो दो घड़ी विश्राम करें । अभी मेरे स्वामी प्रचुरमात्रामें जंगली फल-मूल लेकर आते होंगे ॥ २१-२२½ ॥

> रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वाऽऽदायामिषं बहु ॥ २३ ॥  
> स त्वं नाम च गोत्रं च कुलमाचक्ष्व तत्त्वतः ।  
> एकश्च दण्डकारण्ये किमर्थं चरसि द्विज ॥ २४ ॥

‘रुरु, गोह और जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओंका वध करके तपस्वी जनोंके उपभोगमें आने योग्य बहुत-सा फल-मूल लेकर वे अभी आयेंगे ( उस समय आपका विशेष सत्कार होगा ) । ब्रह्मन् ! अब आप भी अपने नाम-गोत्र और कुलका ठीक-ठीक परिचय दीजिये । आप अकेले इस दण्डकारण्यमें किस लिये विचरते हैं ?’॥ २३–२४॥

> एवं ब्रुवत्यां सीतायां रामपत्न्यां महाबलः ।  
> प्रत्युवाचोत्तरं तीव्रं रावणो राक्षसाधिपः ॥ २५ ॥  
> येन वित्रासिता लोकाः सदेवासुरमानुषाः ।  
> अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वरः ॥ २६ ॥

श्रीरामपत्नी सीताके इस प्रकार पूछनेपर महाबली राक्षसराज रावणने अत्यन्त कठोर शब्दोंमें उत्तर दिया—॥ ‘सीते ! जिसके नामसे देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोक थर्रा उठते हैं, मैं वही राक्षसोंका राजा रावण हूँ ॥ २६ ॥

> त्वां तु काञ्चनवर्णाभां दृष्ट्वा कौशेयवासिनीम् ।  
> रतिं स्वकेषु दारेषु नाधिगच्छाम्यनिन्दिते ॥ २७ ॥

‘अनिन्द्यसुन्दरि ! तुम्हारे अङ्गोंकी कान्ति सुवर्णके समान है, जिनपर रेशमी साड़ी शोभा पा रही है । तुम्हें देखकर अब मेरा मन अपनी स्त्रियोंकी ओर नहीं जाता है ॥ २७ ॥

> बह्वीनामुत्तमस्त्रीणामाहृतानामितस्ततः ।  
> सर्वासामेव भद्रं ते ममाग्रमहिषी भव ॥ २८ ॥

‘मैं इधर-उधरसे बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियोंको हर लाया हूँ । उन सबमें तुम मेरी पटरानी बनो । तुम्हारा भला हो ॥ २८ ॥

> लङ्का नाम समुद्रस्य मध्ये मम महापुरी ।  
> सागरेण परिक्षिप्ता निविष्टा गिरिमूर्धनि॥ २९ ॥

‘मेरी राजधानीका नाम लङ्का है। वह महापुरी समुद्रके बीचमें एक पर्वतके शिखरपर बसी हुई है । समुद्रने उसे चारों ओरसे घेर रखा है ॥ २९ ॥

> तत्र सीते मया सार्धं वनेषु विचरिष्यसि ।  
> न चास्य वनवासस्य स्पृहयिष्यसि भामिनि ॥ ३० ॥

‘सीते ! वहाँ रहकर तुम मेरे साथ नाना प्रकारके वनोंमें विचरण करोगी । भामिनि ! फिर तुम्हारे मनमें इस वनवासकी इच्छा कभी नहीं होगी ॥ ३० ॥

> पञ्च दास्यः सहस्राणि सर्वाभरणभूषिताः ।  
> सीते परिचरिष्यन्ति भार्या भवसि मे यदि ॥ ३१ ॥

‘सीते ! यदि तुम मेरी भार्या हो जाओगी तो सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित पाँच हजार दासियाँ सदा तुम्हारी सेवा किया करेंगी’ ॥ ३१ ॥

> रावणेनैवमुक्ता तु कुपिता जनकात्मजा ।  
> प्रत्युवाचानवद्याङ्गी तमनादृत्य राक्षसम् ॥ ३२ ॥

रावणके ऐसा कहनेपर निर्दोष अङ्गोंवाली जनकनन्दिनी सीता कुपित हो उठीं और राक्षसका तिरस्कार करके उसे यों उत्तर देने लगीं—॥ ३२ ॥

> महागिरिमिवाकम्प्यं महेन्द्रसदृशं पतिम् ।  
> महोदधिमिवाक्षोभ्यमहं राममनुव्रता ॥ ३३ ॥

‘मेरे पतिदेव भगवान् श्रीराम महान् पर्वतके समान अविचल हैं, इन्द्रके तुल्य पराक्रमी हैं और महासागरके समान प्रशान्त हैं, उन्हें कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता । मैं तन-मन-प्राणसे उन्हींका अनुसरण करनेवाली तथा उन्हींकी अनुरागिणी हूँ ॥ ३३ ॥

> सर्वलक्षणसम्पन्नं न्यग्रोधपरिमण्डलम् ।  
> सत्यसंधं महाभागमहं राममनुव्रता ॥ ३४ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, वट-वृक्षकी भाँति सबको अपनी छायामें आश्रय देनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और महान् सौभाग्यशाली हैं । मैं उन्हींकी अनन्य अनुरागिणी हूँ ॥ ३४ ॥

> महाबाहुं महोरस्कं सिंहविक्रान्तगामिनम् ।  
> नृसिंहं सिंहसंकाशमहं राममनुव्रता ॥ ३५ ॥

‘उनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी और छाती चौड़ी है । वे सिंहके समान पाँव बढ़ाते हुए बड़े गर्वके साथ चलते हैं और सिंहके ही समान पराक्रमी हैं । मैं उन पुरुषसिंह श्रीराममें ही अनन्य भक्ति रखनेवाली हूँ ॥ ३५ ॥

> पूर्णचन्द्राननं रामं राजवत्सं जितेन्द्रियम् ।  
> पृथुकीर्तिं महाबाहुमहं राममनुव्रता ॥ ३६ ॥

‘राजकुमार श्रीरामका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर है । वे जितेन्द्रिय हैं और उनका यश महान् है । उन महाबाहु श्रीराममें ही दृढ़तापूर्वक मेरा मन लगा हुआ है ॥ ३६ ॥

> त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्लभाम् ।  
> नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुमादित्यस्य प्रभा यथा ॥ ३७ ॥

‘पापी निशाचर ! तू सियार है और मैं सिंहिनी हूँ । मैं तेरे लिये सर्वथा दुर्लभ हूँ । क्या तू यहाँ मुझे प्राप्त करनेकी इच्छा रखता है। अरे ! जैसे सूर्यकी प्रभापर कोई हाथ नहीं लगा सकता, उसी प्रकार तू मुझे छू भी नहीं सकता ॥ ३७ ॥

> पादपान् काञ्चनान् नूनं बहून् पश्यसि मन्दभाक् ।  
> राघवस्य प्रियां भार्यां यस्त्वमिच्छसि राक्षस ॥ ३८ ॥

‘अभागे राक्षस ! तेरा इतना साहस ! तू श्रीरघुनाथजीकी प्यारी पत्नीका अपहरण करना चाहता है ! निश्चय ही तुझे बहुत-से सोनेके वृक्ष दिखायी देने लगे हैं—अब तू मौतके निकट जा पहुँचा है ॥ ३८ ॥

> क्षुधितस्य च सिंहस्य मृगशत्रोस्तरस्विनः ।  
> आशीविषस्य वदनाद् दंष्ट्रामादातुमिच्छसि ॥ ३९ ॥  
> मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं पाणिना हर्तुमिच्छसि ।  
> कालकूटं विषं पीत्वा स्वस्तिमान् गन्तुमिच्छसि ॥ ४० ॥  
> अक्षि सूच्या प्रमृजसि जिह्वया लेढि च क्षुरम् ।  
> राघवस्य प्रियां भार्यामधिगन्तुं त्वमिच्छसि ॥ ४१ ॥

‘तू श्रीरामकी प्यारी पत्नीको हस्तगत करना चाहता है । जान पड़ता है, अत्यन्त वेगशाली मृगवैरी भूखे सिंह और विषधर सर्पके मुखसे उनके दाँत तोड़ लेना चाहता है, पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलको हाथसे उठाकर ले जानेकी इच्छा करता है, कालकूट विषको पीकर कुशलपूर्वक लौट जानेकी अभिलाषा रखता है तथा आँखको सूईसे पोंछता और छुरेको जीभसे चाटता है ॥ ३९–४१ ॥

> अवसज्य शिलां कण्ठे समुद्रं तर्तुमिच्छसि ।  
> सूर्याचन्द्रमसौ चोभौ पाणिभ्यां हर्तुमिच्छसि ॥ ४२ ॥  
> यो रामस्य प्रियां भार्यां प्रधर्षयितुमिच्छसि ।

‘क्या तू अपने गलेमें पत्थर बाँधकर समुद्रको पार करना चाहता है ? सूर्य और चन्द्रमा दोनोंको अपने दोनों हाथोंसे हर लानेकी इच्छा करता है ? जो श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नीपर बलात्कार करनेको उतारू हुआ है ॥ ४२½ ॥

> अग्निं प्रज्वलितं दृष्ट्वा वस्त्रेणाहर्तुमिच्छसि ॥ ४३ ॥  
> कल्याणवृत्तां यो भार्यां रामस्याहर्तुमिच्छसि ।

‘यदि तू कल्याणमय आचारका पालन करनेवाली श्रीरामकी भार्याका अपहरण करना चाहता है तो अवश्य ही जलती हुई आगको देखकर भी तू उसे कपड़ेमें बाँधकर ले जानेकी इच्छा करता है ॥ ४३½ ॥

> अयोमुखानां शूलानामग्रे चरितुमिच्छसि ।  
> रामस्य सदृशीं भार्यां योऽधिगन्तुं त्वमिच्छसि।४४।

‘अरे तू श्रीरामकी भार्याको, जो सर्वथा उन्हींके योग्य है, हस्तगत करना चाहता है, तो निश्चय ही लोहमय मुखवाले शूलोंकी नोकपर चलनेकी अभिलाषा करता है ॥ ४४ ॥

> यदन्तरं सिंहमृगालयोर्वने  
> यदन्तरं स्यन्दनिकासमुद्रयोः ।  
> सुराग्र्यसौवीरकयोर्यदन्तरं  
> तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च ॥ ४५ ॥

‘वनमें रहनेवाले सिंह और सियारमें, समुद्र और छोटी नदीमें तथा अमृत और काँजीमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराममें और तुझमें है ॥ ४५ ॥

> यदन्तरं काञ्चनसीसलोहयो-  
> र्यदन्तरं चन्दनवारिपङ्कयोः ।  
> यदन्तरं हस्तिबिडालयोर्वने  
> तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च ॥ ४६ ॥

‘सोने और सीसेमें, चन्दनमिश्रित जल और कीचड़में तथा बनमें रहनेवाले हाथी और बिलावमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है ॥ ४६ ॥

> यदन्तरं वायसवैनतेययो-  
> र्यदन्तरं मद्गुमयूरयोरपि ।  
> यदन्तरं हंसकगृध्रयोर्वने  
> तदन्तरं दाशरथेस्तवैव च ॥ ४७ ॥

‘गरुड़ और कौएमें, मोर और जलकाकमें तथा वनवासी हंस और गीधमें जो अन्तर है, वही अन्तर दशरथनन्दन श्रीराम और तुझमें है ॥ ४७ ॥

> तस्मिन् सहस्राक्षसमप्रभावे  
> रामे स्थिते कार्मुकबाणपाणौ ।  
> हतापि तेऽहं न जरां गमिष्ये  
> आज्यं यथा मक्षिकयावगीर्णम् ॥ ४८ ॥

‘जिस समय सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके समान प्रभावशाली श्रीरामचन्द्रजी हाथमें धनुष और बाण लेकर खड़े हो जाएँगे, उस समय तू मेरा अपहरण करके भी मुझे पचा नहीं सकेगा, ठीक उसी तरह जैसे मक्खी घी पीकर उसे पचा नहीं सकती’ ॥ ४८ ॥

> इतीव तद्वाक्यमदुष्टभावा  
> सुदुष्टमुक्त्वा रजनीचरं तम् ।  
> गात्रप्रकम्पाद् व्यथिता बभूव  
> वातोद्धता सा कदलीव तन्वी ॥ ४९ ॥

सीताके मनमें कोई दुर्भाव नहीं था तो भी उस राक्षससे यह अत्यन्त दुःखजनक बात कहकर सीता रोषसे काँपने लगीं । शरीरके कम्पनसे कृशाङ्गी सीता हवासे हिलायी गयी कदलीके समान व्यथित हो उठीं ॥ ४९ ॥

> तां वेपमानामुपलक्ष्य सीतां  
> स रावणो मृत्युसमप्रभावः ।  
> कुलं बलं नाम च कर्म चात्मनः  
> समाचचक्षे भयकारणार्थम् ॥ ५० ॥

सीताको काँपती देख मौतके समान प्रभाव रखनेवाला रावण उनके मनमें भय उत्पन्न करनेके लिये अपने कुल, बल, नाम और कर्मका परिचय देने लगा ॥ ५० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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