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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 41"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 41

> आज्ञप्तो रावणेनेत्थं प्रतिकूलं च राजवत् ।  
> अब्रवीत् परुषं वाक्यं निःशङ्को राक्षसाधिपम् ॥ १ ॥

रावणने जब राजाकी भाँति उसे ऐसी प्रतिकूल आज्ञा दी, तब मारीचने निःशङ्क होकर उस राक्षसराजसे कठोर वाणीमें कहा—॥ १ ॥

> केनायमुपदिष्टस्ते विनाशः पापकर्मणा ।  
> सपुत्रस्य सराज्यस्य सामात्यस्य निशाचर ॥ २ ॥

‘निशाचर ! किस पापीने तुम्हें पुत्र, राज्य और मन्त्रियोंसहित तुम्हारे विनाशका यह मार्ग बताया है ? ॥ २ ॥

> कस्त्वया सुखिना राजन् नाभिनन्दति पापकृत् ।  
> केनेदमुपदिष्टं ते मृत्युद्वारमुपायतः ॥ ३ ॥

‘राजन् ! कौन ऐसा पापाचारी है, जो तुम्हें सुखी देखकर प्रसन्न नहीं हो रहा है ? किसने युक्तिसे तुम्हें मौतके द्वारपर जानेकी यह सलाह दी है ? ॥ ३ ॥

> शत्रवस्तव सुव्यक्तं हीनवीर्या निशाचर ।  
> इच्छन्ति त्वां विनश्यन्तमुपरुद्धं बलीयसा ॥ ४ ॥

‘निशाचर ! आज यह बात स्पष्टरूपसे ज्ञात हो गयी कि तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हें किसी बलवान्से भिड़ाकर नष्ट होते देखना चाहते हैं ॥ ४ ॥

> केनेदमुपदिष्टं ते क्षुद्रेणाहितबुद्धिना ।  
> यस्त्वामिच्छति नश्यन्तं स्वकृतेन निशाचर ॥ ५ ॥

‘राक्षसराज ! तुम्हारे अहितका विचार रखनेवाले किस नीचने तुम्हें यह पाप करनेका उपदेश दिया है ? जान पड़ता है कि वह तुम्हें अपने ही कुकर्मसे नष्ट होते देखना चाहता है ॥ ५ ॥

> वध्याः खलु न वध्यन्ते सचिवास्तव रावण ।  
> ये त्वामुत्पथमारूढं न निगृह्णन्ति सर्वशः ॥ ६ ॥

‘रावण ! निश्चय ही वधके योग्य तुम्हारे वे मन्त्री हैं, जो कुमार्गपर आरूढ़ हुए तुम-जैसे राजाको सब प्रकारसे रोक नहीं रहे हैं; किंतु तुम उनका वध नहीं करते हो ॥ ६ ॥

> अमात्यैः कामवृत्तो हि राजा कापथमाश्रितः ।  
> निग्राह्यः सर्वथा सद्भिः स निग्राह्यो न गृह्यसे ॥ ७ ॥

‘अच्छे मन्त्रियोंको चाहिये कि जो राजा स्वेच्छाचारी होकर कुमार्गपर चलने लगे, उसे सब प्रकारसे वे रोकें । तुम भी रोकनेके ही योग्य हो; फिर भी वे मन्त्री तुम्हें रोक नहीं रहे हैं ॥ ७ ॥

> धर्ममर्थं च कामं च यशश्च जयतां वर ।  
> स्वामिप्रसादात् सचिवाः प्राप्नुवन्ति निशाचर ॥ ८ ॥

‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ निशाचर ! मन्त्री अपने स्वामी राजाकी कृपासे ही धर्म, अर्थ, काम और यश पाते हैं ॥ ८ ॥

> विपर्यये तु तत्सर्वं व्यर्थं भवति रावण ।  
> व्यसनं स्वामिवैगुण्यात् प्राप्नुवन्तीतरे जनाः ॥ ९ ॥

‘रावण ! यदि स्वामीकी कृपा न हो तो सब व्यर्थ हो जाता है । राजाके दोषसे दूसरे लोगोंको भी कष्ट भोगना पड़ता है ॥ ९ ॥

> राजमूलो हि धर्मश्च यशश्च जयतां वर ।  
> तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षितव्या नराधिपाः ॥ १० ॥

‘विजयशीलोंमें श्रेष्ठ राक्षसराज ! धर्म और यशकी प्राप्तिका मूल कारण राजा ही है; अतः सभी अवस्थाओंमें राजाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १० ॥

> राज्यं पालयितुं शक्यं न तीक्ष्णेन निशाचर ।  
> न चातिप्रतिकूलेन नाविनीतेन राक्षस ॥ ११ ॥

‘रात्रिमें विचरनेवाले राक्षस ! जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा हो, जो जनताके अत्यन्त प्रतिकूल चलनेवाला और उद्दण्ड हो, ऐसे राजासे राज्यकी रक्षा नहीं हो सकती ॥ ११ ॥

> ये तीक्ष्णमन्त्राः सचिवा भुज्यन्ते सह तेन वै ।  
> विषमेषु रथाः शीघ्रं मन्दसारथयो यथा ॥ १२ ॥

‘जो मन्त्री तीखे उपायका उपदेश करते हैं, वे अपनी सलाह माननेवाले उस राजाके साथ ही दुःख भोगते हैं, जैसे जिनके सारथि मूर्ख हों, ऐसे रथ नीची-ऊँची भूमिमें जानेपर सारथियोंके साथ ही संकटमें पड़ जाते हैं ॥ १२ ॥

> बहवः साधवो लोके युक्तधर्ममनुष्ठिताः ।  
> परेषामपराधेन विनष्टाः सपरिच्छदाः ॥ १३ ॥

‘उपयुक्त धर्मका अनुष्ठान करनेवाले बहुत-से साधु-पुरुष इस जगत्में दूसरोंके अपराधसे परिवारसहित नष्ट हो गये हैं ॥ १३ ॥

> स्वामिना प्रतिकूलेन प्रजास्तीक्ष्णेन रावण ।  
> रक्ष्यमाणा न वर्धन्ते मेषा गोमायुना यथा ॥ १४ ॥

‘रावण ! प्रतिकूल बर्ताव और तीखे स्वभाववाले राजासे रक्षित होनेवाली प्रजा उसी तरह वृद्धिको नहीं प्राप्त होती है, जैसे गीदड़ या भेड़ियेसे पालित होनेवाली भेड़ें ॥ १४ ॥

> अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः ।  
> येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः ॥ १५ ॥

‘रावण! जिनके तुम क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा हो, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे ॥१५ ॥

> तदिदं काकतालीयं घोरमासादितं मया ।  
> अत्र त्वं शोचनीयोऽसि ससैन्यो विनशिष्यसि ॥ १६ ॥

‘काकतालीय न्यायके अनुसार मुझे तुमसे अकस्मात् ही यह घोर दुःख प्राप्त हो गया । इस विषयमें मुझे तुम ही शोकके योग्य जान पड़ते हो; क्योंकि सेनासहित तुम्हारा नाश हो जायगा ॥ १६ ॥

> मां निहत्य तु रामोऽसावचिरात् त्वां वधिष्यति ।  
> अनेन कृतकृत्योऽस्मि म्रिये चाप्यरिणा हतः ॥ १७ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी मुझे मारकर तुम्हारा भी शीघ्र ही वध कर डालेंगे । जब दोनों ही तरहसे मेरी मृत्यु निश्चित है, तब श्रीरामके हाथसे होनेवाली जो यह मृत्यु है, इसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा; क्योंकि शत्रुके द्वारा युद्धमें मारा जाकर प्राणत्याग करूँगा ( तुम-जैसे राजाके हाथसे बलपूर्वक प्राणदण्ड पानेका कष्ट नहीं भोगूँगा ) ॥ १७ ॥

> दर्शनादेव रामस्य हतं मामवधारय ।  
> आत्मानं च हतं विद्धि हृत्वा सीतां सबान्धवम् ॥ १८ ॥

‘राजन् ! यह निश्चित समझो कि श्रीरामके सामने जाकर उनकी दृष्टि पड़ते ही मैं मारा जाऊँगा और यदि तुमने सीताका हरण किया तो तुम अपनेको भी बन्धु-बान्धवोंसहित मरा हुआ ही मानो ॥ १८ ॥

> आनयिष्यसि चेत् सीतामाश्रमात् सहितो मया ।  
> नैव त्वमपि नाहं वै नैव लङ्का न राक्षसाः ॥ १९ ॥

‘यदि तुम मेरे साथ जाकर श्रीरामके आश्रमसे सीताका अपहरण करोगे, तब न तो तुम जीवित बचोगे और न मैं ही । न लंकापुरी रहने पायगी और न वहाँके निवासी राक्षस ही ॥ १९ ॥

> निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा  
> न मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर ।  
> परेतकल्पा हि गतायुषो नरा  
> हितं न गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम् ॥ २० ॥

‘निशाचर ! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें पापकर्मसे रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं होती है । सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदोंकी कही हुई हितकर बातें नहीं स्वीकार करते हैं’ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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