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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 38"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 38

> कदाचिदप्यहं वीर्यात् पर्यटन् पृथिवीमिमाम् ।  
> बलं नागसहस्रस्य धारयन् पर्वतोपमः ॥ १ ॥

‘एक समयकी बात है कि मैं अपने पराक्रमके अभिमानमें आकर पर्वतके समान शरीर धारण किये इस पृथ्वीपर चक्कर लगा रहा था । उस समय मुझमें एक हजार हाथियोंका बल था ॥ १ ॥

> नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः ।  
> भयं लोकस्य जनयन् किरीटी परिघायुधः ॥ २ ॥  
> व्यचरन् दण्डकारण्यमृषिमांसानि भक्षयन् ।

‘मेरा शरीर नील मेघके समान काला था । मैंने कानोंमें पक्के सोनेके कुण्डल पहन रखे थे । मेरे मस्तकपर किरीट था और हाथमें परिघ । मैं ऋषियोंके मांस खाता और समस्त जगत्के मनमें भय उत्पन्न करता हुआ दण्डकारण्यमें विचर रहा था ॥ २½ ॥

> विश्वामित्रोऽथ धर्मात्मा मद्वित्रस्तो महामुनिः ॥ ३ ॥  
> स्वयं गत्वा दशरथं नरेन्द्रमिदमब्रवीत् ।

‘उन दिनों धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्रको मुझसे बड़ा भय हो गया था । वे स्वयं राजा दशरथके पास गये और उनसे इस प्रकार बोले—॥ ३½ ॥

> अयं रक्षतु मां रामः पर्वकाले समाहितः ॥ ४ ॥  
> मारीचान्मे भयं घोरं समुत्पन्नं नरेश्वर ।

‘नरेश्वर ! मुझे मारीच नामक राक्षससे घोर भय प्राप्त हुआ है, अतः ये श्रीराम मेरे साथ चलें और पर्वके दिन एकाग्रचित्त हो मेरी रक्षा करें’ ॥ ४½ ॥

> इत्येवमुक्तो धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा ॥ ५ ॥  
> प्रत्युवाच महाभागं विश्वामित्रं महामुनिम् ।

‘मुनिके ऐसा कहनेपर उस समय धर्मात्मा राजा दशरथने महाभाग महामुनि विश्वामित्रको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ५½ ॥

> ऊनद्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघवः ॥ ६ ॥  
> कामं तु मम तत् सैन्यं मया सह गमिष्यति ।  
> बलेन चतुरङ्गेण स्वयमेत्य निशाचरम् ॥ ७ ॥  
> वधिष्यामि मुनिश्रेष्ठ शत्रुं तव यथेप्सितम् ।

‘मुनिश्रेष्ठ ! रघुकुलनन्दन रामकी अवस्था अभी बारह वर्षसे भी कम है । इन्हें अस्त्र-शस्त्रोंके चलानेका पूरा अभ्यास भी नहीं है । आप चाहें तो मेरे साथ मेरी सारी सेना वहाँ चलेगी और मैं चतुरङ्गिणी सेनाके साथ स्वयं ही चलकर आपकी इच्छाके अनुसार उस शत्रुरूप निशाचरका वध करूँगा’ ॥ ६–७½ ॥

> एवमुक्तः स तु मुनी राजानमिदमब्रवीत् ॥ ८ ॥  
> रामान्नान्यद् बलं लोके पर्याप्तं तस्य रक्षसः ।

‘राजाके ऐसा कहनेपर मुनि उनसे इस प्रकार बोले—‘उस राक्षसके लिये श्रीरामके सिवा दूसरी कोई शक्ति पर्याप्त नहीं है ॥ ८½ ॥

> देवतानामपि भवान् समरेष्वभिपालकः ॥ ९ ॥  
> आसीत् तव कृतं कर्म त्रिलोकविदितं नृप ।

‘राजन् ! इसमें संदेह नहीं कि आप समरभूमिमें देवताओंकी भी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। आपने जो महान् कार्य किया है, वह तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है ॥ ९½ ॥

> काममस्ति महत् सैन्यं तिष्ठत्विह परंतप ॥ १० ॥  
> बालोऽप्येष महातेजाः समर्थस्तस्य निग्रहे ।  
> गमिष्ये राममादाय स्वस्ति तेऽस्तु परंतप ॥ ११ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश ! आपके पास जो विशाल सेना है, वह आपकी इच्छा हो तो यहीं रहे । ( आप भी यहीं रहें । ) महातेजस्वी श्रीराम बालक हैं तो भी उस राक्षसका दमन करनेमें समर्थ हैं, अतः मैं श्रीरामको ही साथ लेकर जाऊँगा; आपका कल्याण हो’ ॥ १०-११ ॥

> इत्येवमुक्त्वा स मुनिस्तमादाय नृपात्मजम् ।  
> जगाम परमप्रीतो विश्वामित्रः स्वमाश्रमम् ॥ १२ ॥

‘ऐसा कहकर ( लक्ष्मणसहित ) राजकुमार श्रीरामको साथ ले महामुनि विश्वामित्र बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने आश्रमको गये ॥ १२ ॥

> तं तथा दण्डकारण्ये यज्ञमुद्दिश्य दीक्षितम् ।  
> बभूवोपस्थितो रामश्चित्रं विस्फारयन् धनुः ॥ १३ ॥

‘इस प्रकार दण्डकारण्यमें जाकर उन्होंने यज्ञके लिये दीक्षा ग्रहण की और श्रीराम अपने अद्भुत धनुषकी टङ्कार करते हुए उनकी रक्षाके लिये पास ही खड़े हो गये ॥ १३ ॥

> अजातव्यञ्जनः श्रीमान् बालः श्यामः शुभेक्षणः।  
> एकवस्त्रधरो धन्वी शिखी कनकमालया ॥ १४ ॥

‘उस समयतक श्रीराममें जवानीके चिह्न प्रकट नहीं हुए थे। ( उनकी किशोरावस्था थी । ) वे एक शोभाशाली बालकके रूपमें दिखायी देते थे। उनके श्रीअङ्गका रंग साँवला और आँखें बड़ी सुन्दर थीं। वे एक वस्त्र धारण किये, हाथोंमें धनुष लिये सुन्दर शिखा और सोनेके हारसे सुशोभित थे ॥ १४ ॥

> शोभयन् दण्डकारण्यं दीप्तेन स्वेन तेजसा।  
> अदृश्यत तदा रामो बालचन्द्र इवोदितः ॥ १५ ॥

‘उस समय अपने उद्दीप्त तेजसे दण्डकारण्यकी शोभा बढ़ाते हुए श्रीरामचन्द्र नवोदित बालचन्द्रके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ १५ ॥

> ततोऽहं मेघसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।  
> बली दत्तवरो दर्पादाजगामाश्रमान्तरम् ॥ १६ ॥

‘इधर मैं भी मेघके समान काले शरीरसे बड़े घमंडके साथ उस आश्रमके भीतर घुसा। मेरे कानोंमें तपाये हुए सुवर्णके कुण्डल झलमला रहे थे। मैं बलवान् तो था ही, मुझे वरदान भी मिल चुका था कि देवता मुझे मार नहीं सकेंगे ॥ १६ ॥

> तेन दृष्टः प्रविष्टोऽहं सहसैवोद्यतायुधः।  
> मां तु दृष्ट्वा धनुः सज्यमसम्भ्रान्तश्चकार ह ॥ १७ ॥

‘भीतर प्रवेश करते ही श्रीरामचन्द्रजीकी दृष्टि मुझपर पड़ी। मुझे देखते ही उन्होंने सहसा धनुष उठा लिया और बिना किसी घबराहटके उसपर डोरी चढ़ा दी ॥ १७ ॥

> अवजानन्नहं मोहाद् बालोऽयमिति राघवम्।  
> विश्वामित्रस्य तां वेदिमभ्यधावं कृतत्वरः ॥ १८ ॥

‘मैं मोहवश श्रीरामचन्द्रको ‘यह बालक है’ ऐसा समझकर उनकी अवहेलना करता हुआ बड़ी तेजीके साथ विश्वामित्रकी उस यज्ञवेदीकी ओर दौड़ा ॥ १८ ॥

> तेन मुक्तस्ततो बाणः शितः शत्रुनिबर्हणः।  
> तेनाहं ताडितः क्षिप्तः समुद्रे शतयोजने ॥ १९ ॥

‘इतनेहीमें श्रीरामने एक ऐसा तीखा बाण छोड़ा, जो शत्रुका संहार करनेवाला था; परंतु उस बाणकी चोट खाकर ( मैं मरा नहीं ) सौ योजन दूर समुद्रमें आकर गिर पड़ा ॥ १९ ॥

> नेच्छता तात मां हन्तुं तदा वीरेण रक्षितः।  
> रामस्य शरवेगेन निरस्तो भ्रान्तचेतनः ॥ २० ॥  
> पातितोऽहं तदा तेन गम्भीरे सागराम्भसि।  
> प्राप्य संज्ञां चिरात् तात लङ्कां प्रति गतः पुरीम् ॥ २१ ॥

‘तात ! वीर श्रीरामचन्द्रजी उस समय मुझे मारना नहीं चाहते थे, इसीलिये मेरी जान बच गयी। उनके बाणके वेगसे मैं भ्रान्तचित्त होकर दूर फेंक दिया गया और समुद्रके गहरे जलमें गिरा दिया गया । तात ! फिर दीर्घकालके पश्चात् जब मुझे चेत हुआ, तब मैं लंकापुरीमें गया ॥ २०-२१ ॥

> एवमस्मि तदा मुक्तः सहायास्ते निपातिताः।  
> अकृतास्त्रेण रामेण बालेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ २२ ॥

‘इस प्रकार उस समय मैं मरनेसे बचा। अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम उन दिनों अभी बालक थे और उन्हें अस्त्र चलानेका पूरा अभ्यास भी नहीं था तो भी उन्होंने मेरे उन सभी सहायकोंको मार गिराया, जो मेरे साथ गये थे ॥ २२ ॥

> तन्मया वार्यमाणस्तु यदि रामेण विग्रहम्।  
> करिष्यस्यापदं घोरां क्षिप्रं प्राप्य न शिष्यसि ॥ २३ ॥

‘इसलिये मेरे मना करनेपर भी यदि तुम श्रीरामके साथ विरोध करोगे तो शीघ्र ही घोर आपत्तिमें पड़ जाओगे और अन्तमें अपने जीवनसे भी हाथ धो बैठोगे ॥ २३ ॥

> क्रीडारतिविधिज्ञानां समाजोत्सवदर्शिनाम्।  
> रक्षसां चैव संतापमनर्थं चाहरिष्यसि ॥ २४ ॥

‘खेल-कूद और भोग-विलासके क्रमको जाननेवाले तथा सामाजिक उत्सवोंको ही देख-देखकर दिल बहलानेवाले राक्षसोंके लिये तुम संताप और अनर्थ ( मौत ) बुला लाओगे ॥ २४ ॥

> हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नविभूषिताम्।  
> द्रक्ष्यसि त्वं पुरीं लङ्कां विनष्टां मैथिलीकृते ॥ २५ ॥

‘मिथिलेशकुमारी सीताके लिये तुम्हें धनियोंकी अट्टालिकाओं तथा राजभवनोंसे भरी हुई एवं नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित लंकापुरीका विनाश भी अपनी आँखों देखना पड़ेगा ॥ २५ ॥

> अकुर्वन्तोऽपि पापानि शुचयः पापसंश्रयात्।  
> परपापैर्विनश्यन्ति मत्स्या नागह्रदे यथा ॥ २६ ॥

‘जो लोग आचार-विचारसे शुद्ध हैं और पाप या अपराध नहीं करते हैं, वे भी यदि पापियोंके सम्पर्कमें चले जायँ तो दूसरोंके पापोंसे ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे साँपवाले सरोवरमें निवास करनेवाली मछलियाँ उस सर्पके साथ ही मारी जाती हैं ॥ २६ ॥

> दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गान् दिव्याभरणभूषितान्।  
> द्रक्ष्यस्यभिहतान् भूमौ तव दोषात् तु राक्षसान् ॥ २७ ॥

‘तुम देखोगे कि जिनके अङ्ग दिव्य चन्दनसे चर्चित होते थे तथा जो दिव्य आभूषणोंसे विभूषित रहते थे, वे ही राक्षस तुम्हारे ही अपराधसे मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हुए हैं ॥ २७ ॥

> हृतदारान् सदारांश्च दश विद्रवतो दिशः।  
> हतशेषानशरणान् द्रक्ष्यसि त्वं निशाचरान् ॥ २८ ॥

‘तुम्हें यह भी दिखायी देगा कि कितने ही निशाचरोंकी स्त्रियाँ हर ली गयी हैं और कुछकी स्त्रियाँ साथ हैं तथा वे युद्धमें मरनेसे बचकर असहाय अवस्थामें दसों दिशाओंकी ओर भाग रहे हैं ॥ २८ ॥

> शरजालपरिक्षिप्तामग्निज्वालासमावृताम् ।  
> प्रदग्धभवनां लङ्कां द्रक्ष्यसि त्वमसंशयम् ॥ २९ ॥

‘निःसंदेह तुम्हारे सामने वह दृश्य भी आयेगा कि लंकापुरीपर बाणोंका जाल-सा बिछ गया है। वह आगकी ज्वालाओंसे घिर गयी है और उसका एक-एक घर जलकर भस्म हो गया है ॥ २९ ॥

> परदाराभिमर्शात्तु नान्यत् पापतरं महत्।  
> प्रमदानां सहस्राणि तव राजन् परिग्रहे ॥ ३० ॥  
> भव स्वदारनिरतः स्वकुलं रक्ष राक्षसान्।  
> मानं वृद्धिं च राज्यं च जीवितं चेष्टमात्मनः ॥ ३१ ॥

‘राजन्! परायी स्त्रीके संसर्गसे बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है। तुम्हारे अन्तःपुरमें हजारों युवती स्त्रियाँ हैं, उन अपनी ही स्त्रियोंमें अनुराग रखो। अपने कुलकी रक्षा करो, राक्षसोंके प्राण बचाओ तथा अपनी मान, प्रतिष्ठा, उन्नति, राज्य और प्यारे जीवनको नष्ट न होने दो ॥ ३०-३१ ॥

> कलत्राणि च सौम्यानि मित्रवर्गं तथैव च।  
> यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम् ॥ ३२ ॥

‘यदि तुम अपनी सुन्दरी स्त्रियों तथा मित्रोंका सुख अधिक कालतक भोगना चाहते हो तो श्रीरामका अपराध न करो ॥ ३२ ॥

> निवार्यमाणः सुहृदा मया भृशं  
> प्रसह्य सीतां यदि धर्षयिष्यसि।  
> गमिष्यसि क्षीणबलः सबान्धवो  
> यमक्षयं रामशरास्तजीवितः ॥ ३३ ॥

‘मैं तुम्हारा हितैषी सुहृद् हूँ। यदि मेरे बारंबार मना करनेपर भी तुम हठपूर्वक सीताका अपहरण करोगे तो तुम्हारी सारी सेना नष्ट हो जायगी और तुम श्रीरामके बाणोंसे अपने प्राण गँवाकर बन्धु-बान्धवोंके साथ यमलोककी यात्रा करोगे’ ॥ ३३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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