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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 37"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 37

> तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य वाक्यं वाक्यविशारदः ।  
> प्रत्युवाच महातेजा मारीचो राक्षसेश्वरम् ॥ १ ॥

राक्षसराज रावणकी पूर्वोक्त बात सुनकर बातचीत करनेमें कुशल महातेजस्वी मारीचने उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥

> सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः ।  
> अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥ २ ॥

‘राजन् ! सदा प्रिय वचन बोलनेवाले पुरुष तो सर्वत्र सुलभ होते हैं; परंतु जो अप्रिय होनेपर भी हितकर हो, ऐसी बातके कहने और सुननेवाले दोनों ही दुर्लभ हैं ॥ २ ॥

> न नूनं बुध्यसे रामं महावीर्यगुणोन्नतम् ।  
> अयुक्तचारश्चपलो महेन्द्रवरुणोपमम् ॥ ३ ॥

‘तुम कोई गुप्तचर तो रखते नहीं और तुम्हारा हृदय भी बहुत ही चञ्चल है; अतः निश्चय ही तुम श्रीरामचन्द्रजीको बिलकुल नहीं जानते। वे पराक्रमोचित गुणोंमें बहुत बढ़े-चढ़े तथा इन्द्र और वरुणके समान हैं ॥ ३ ॥

> अपि स्वस्ति भवेत् तात सर्वेषामपि रक्षसाम् ।  
> अपि रामो न संक्रुद्धः कुर्याल्लोकानराक्षसान् ॥ ४ ॥

‘तात ! मैं तो यही चाहता हूँ कि समस्त राक्षसोंका कल्याण हो । कहीं ऐसा न हो कि श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त कुपित हो समस्त लोकोंको राक्षसोंसे शून्य कर दें ? ॥ ४ ॥

> अपि ते जीवितान्ताय नोत्पन्ना जनकात्मजा ।  
> अपि सीतानिमित्तं च न भवेद् व्यसनं महत् ॥ ५ ॥

‘जनकनन्दिनी सीता तुम्हारे जीवनका अन्त करनेके लिये तो नहीं उत्पन्न हुई है ? कहीं ऐसा न हो कि सीताके कारण तुम्हारे ऊपर कोई बहुत बड़ा सङ्कट आ जाय ? ॥ ५ ॥

> अपि त्वामीश्वरं प्राप्य कामवृत्तं निरङ्कुशम् ।  
> न विनश्येत् पुरी लङ्का त्वया सह सराक्षसा ॥ ६ ॥

‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी और उच्छृङ्खल राजाको पाकर लङ्कापुरी तुम्हारे और राक्षसोंके साथ ही नष्ट न हो जाय ? ॥ ६ ॥

> त्वद्विधः कामवृत्तो हि दुःशीलः पापमन्त्रितः ।  
> आत्मानं स्वजनं राष्ट्रं स राजा हन्ति दुर्मतिः ॥ ७ ॥

‘जो राजा तुम्हारे समान दुराचारी, स्वेच्छाचारी, पापपूर्ण विचार रखनेवाला और खोटी बुद्धिवाला होता है, वह अपना, अपने स्वजनोंका तथा समूचे राष्ट्रका भी विनाश कर डालता है ॥ ७ ॥

> न च पित्रा परित्यक्तो नामर्यादः कथंचन ।  
> न लुब्धो न च दुःशीलो न च क्षत्रियपांसनः ॥ ८ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी न तो पिताद्वारा त्यागे या निकाले गये हैं, न उन्होंने धर्मकी मर्यादाका किसी तरह त्याग किया है, न वे लोभी, न दूषित आचार-विचारवाले और न क्षत्रियकुलकलङ्क ही हैं ॥ ८ ॥

> न च धर्मगुणैर्हीनः कौसल्यानन्दवर्धनः ।  
> न च तीक्ष्णो हि भूतानां सर्वभूतहिते रतः ॥ ९ ॥

‘कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीराम धर्मसम्बन्धी गुणोंसे हीन नहीं हुए हैं। उनका स्वभाव भी किसी प्राणीके प्रति तीखा नहीं है। वे सदा समस्त प्राणियोंके हितमें ही तत्पर रहते हैं ॥ ९ ॥

> वञ्चितं पितरं दृष्ट्वा कैकेय्या सत्यवादिनम् ।  
> करिष्यामीति धर्मात्मा ततः प्रव्रजितो वनम् ॥ १० ॥

‘रानी कैकेयीने पिताको धोखेमें डालकर मेरे वनवासका वर माँग लिया—यह देखकर धर्मात्मा श्रीरामने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि मैं पिताको सत्यवादी बनाऊँगा ( उनके दिये हुए वर या वचनको पूरा करूँगा ); इस निश्चयके अनुसार वे स्वयं ही वनको चल दिये ॥ १० ॥

> कैकेय्याः प्रियकामार्थं पितुर्दशरथस्य च ।  
> हित्वा राज्यं च भोगांश्च प्रविष्टो दण्डकावनम् ॥ ११ ॥

‘माता कैकेयी और पिता राजा दशरथका प्रिय करनेकी इच्छासे ही वे स्वयं राज्य और भोगोंका परित्याग करके दण्डकवनमें प्रविष्ट हुए हैं ॥ ११ ॥

> न रामः कर्कशस्तात नाविद्वान् नाजितेन्द्रियः ।  
> अनृतं न श्रुतं चैव नैव त्वं वक्तुमर्हसि ॥ १२ ॥

‘तात ! श्रीराम क्रूर नहीं हैं। वे मूर्ख और अजितेन्द्रिय भी नहीं हैं। श्रीराममें मिथ्याभाषणका दोष मैंने कभी नहीं सुना है; अतः उनके विषयमें तुम्हें ऐसी उल्टी बातें कभी नहीं कहनी चाहिये ॥ १२ ॥

> रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः ।  
> राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामिव वासवः ॥ १३ ॥

‘श्रीराम धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप हैं । वे साधु और सत्यपराक्रमी हैं । जैसे इन्द्र समस्त देवताओंके अधिपति हैं, उसी प्रकार श्रीराम भी सम्पूर्ण जगत्के राजा हैं ॥ १३ ॥

> कथं नु तस्य वैदेहीं रक्षितां स्वेन तेजसा ।  
> इच्छसे प्रसभं हर्तुं प्रभामिव विवस्वतः ॥ १४ ॥

‘उनकी पत्नी विदेहराजकुमारी सीता अपने ही पातिव्रत्यके तेजसे सुरक्षित हैं । जैसे सूर्यकी प्रभा उससे अलग नहीं की जा सकती, उसी तरह सीताको श्रीरामसे अलग करना असम्भव है । ऐसी दशामें तुम बलपूर्वक उनका अपहरण कैसे करना चाहते हो ? ॥ १४ ॥

> शरार्चिषमनाधृष्यं चापखड्गेन्धनं रणे ।  
> रामाग्नि सहसा दीप्तं न प्रवेष्टुं त्वमर्हसि ॥ १५ ॥

‘श्रीराम प्रज्वलित अग्निके समान हैं । बाण ही उस अग्निकी ज्वाला है । धनुष और खड्ग ही उसके लिये ईंधनका काम करते हैं । तुम्हें युद्धके लिये सहसा उस अग्निमें प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥

> धनुर्व्यादितदीप्तास्यं शरार्चिषमम र्षणम् ।  
> चापबाणधरं तीक्ष्णं शत्रुसेनापहारिणम् ॥ १६ ॥  
> राज्यं सुखं च संत्यज्य जीवितं चेष्टमात्मनः ।  
> नात्यासादयितुं तात रामान्तकमिहार्हसि ॥ १७ ॥

‘तात ! धनुष ही जिसका फैला हुआ दीप्तिमान् मुख है और बाण ही प्रभा है, जो अमर्षमें भरा हुआ है, धनुष और बाण धारण किये खड़ा है, रोषवश तीखे स्वभावका परिचय देता है और शत्रुसेनाके प्राण लेनेमें समर्थ है, उस रामरूपी यमराजके पास तुम्हें यहाँ अपने राज्यसुख और प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर सहसा नहीं जाना चाहिये ॥ १६-१७ ॥

> अप्रमेयं हि तत्तेजो यस्य सा जनकात्मजा ।  
> न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने ॥ १८ ॥

‘जनककिशोरी सीता जिनकी धर्मपत्नी हैं, उनका तेज अप्रमेय है । श्रीरामचन्द्रजीका धनुष उनका आश्रय है, अतः तुममें इतनी शक्ति नहीं है कि वनमें उनका अपहरण कर सको ॥ १८ ॥

> तस्य वै नरसिंहस्य सिंहोरस्कस्य भामिनी ।  
> प्राणेभ्योऽपि प्रियतरा भार्या नित्यमनुव्रता ॥ १९ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी हैं । उनका वक्षःस्थल सिंहके समान उन्नत है । भामिनी सीता उनकी प्राणोंसे भी अधिक प्रियतमा पत्नी हैं । वे सदा अपने पतिका ही अनुसरण करती हैं ॥ १९ ॥

> न सा धर्षयितुं शक्या मैथिल्योजस्विनः प्रिया ।  
> दीप्तस्येव हुताशस्य शिखा सीता सुमध्यमा ॥ २० ॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता ओजस्वी श्रीरामकी प्यारी पत्नी हैं । वे प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाके समान असह्य हैं, अतः उन सुन्दरी सीतापर बलात्कार नहीं किया जा सकता ॥ २० ॥

> किमुद्यमं व्यर्थमिमं कृत्वा ते राक्षसाधिप ।  
> दृष्टश्चेत् त्वं रणे तेन तदन्तमुपजीवितम् ॥ २१ ॥

‘राक्षसराज ! यह व्यर्थका उद्योग करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा ? जिस दिन युद्धमें तुम्हारे ऊपर श्रीरामकी दृष्टि पड़ जाय, उसी दिन तुम अपने जीवनका अन्त समझना ॥ २१ ॥

> जीवितं च सुखं चैव राज्यं चैव सुदुर्लभम् ।  
> यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम् ॥ २२ ॥

‘यदि तुम अपने जीवनका, सुखका और परम दुर्लभ राज्यका चिरकाल तक उपभोग करना चाहते हो तो श्रीरामका अपराध न करो ॥ २२ ॥

> स सर्वैः सचिवैः सार्धं विभीषणपुरस्कृतैः ।  
> मन्त्रयित्वा स धर्मिष्ठैः कृत्वा निश्चयमात्मनः ।  
> दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम् ॥ २३ ॥  
> आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा राघवस्य च तत्त्वतः ।  
> हितं हि तव निश्चित्य क्षमं त्वं कर्तुमर्हसि ॥ २४ ॥

‘तुम विभीषण आदि सभी धर्मात्मा मन्त्रियोंके साथ सलाह करके अपने कर्तव्यका निश्चय करो । अपने और श्रीरामके दोषों तथा गुणोंके बलाबलपर भलीभाँति विचार करके अपनी और श्रीरामचन्द्रजीकी शक्तिको ठीक-ठीक समझ लो । फिर क्या करनेसे तुम्हारा हित होगा, इसका निश्चय करके जो उचित जान पड़े, वही कार्य तुम्हें करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥

> अहं तु मन्ये तव न क्षमं रणे  
> समागमं कोसलराजसूनुना ।  
> इदं हि भूयः शृणु वाक्यमुत्तमं  
> क्षमं च युक्तं च निशाचराधिप ॥ २५ ॥

‘निशाचरराज ! मैं तो समझता हूँ कि कोसलराजकुमार श्रीरामचन्द्रजीके साथ तुम्हारा युद्ध करना उचित नहीं है । अब पुनः मेरी एक बात और सुनो, यह तुम्हारे लिये बहुत ही उत्तम, उचित और उपयुक्त सिद्ध होगी’ ॥ २५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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