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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 3"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 3

> अथोवाच पुनर्वाक्यं विराधः पूरयन् वनम् ।  
> पृच्छतो मम हि ब्रूतं कौ युवां क्व गमिष्यथः ॥ १ ॥

तदनन्तर विराधने उस वनको गुँजाते हुए कहा— ‘अरे ! मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ । तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे ?’ ॥ १ ॥

> तमुवाच ततो रामो राक्षसं ज्वलिताननम् ।  
> पृच्छन्तं सुमहातेजा इक्ष्वाकुकुलमात्मनः ॥ २ ॥  
> क्षत्रियौ वृत्तसम्पन्नौ विद्धि नौ वनगोचरौ ।  
> त्वां तु वेदितुमिच्छावः कस्त्वं चरसि दण्डकान् ॥३॥

तब महातेजस्वी श्रीरामने अपना परिचय पूँछते हुए प्रज्वलित मुखवाले उस राक्षससे इस प्रकार कहा—‘तुझे मालूम होना चाहिये कि महाराज इक्ष्वाकुका कुल ही मेरा कुल है । हम दोनों भाई सदाचारका पालन करनेवाले क्षत्रिय हैं और कारणवश इस समय वनमें निवास करते हैं । अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं । तू कौन है, जो दण्डकवनमें स्वेच्छासे विचर रहा है ?’ ॥ २-३ ॥

> तमुवाच विराधस्तु रामं सत्यपराक्रमम् ।  
> हन्त वक्ष्यामि ते राजन् निबोध मम राघव ॥ ४ ॥

यह सुनकर विराधने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा— ‘रघुवंशी नरेश ! मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना परिचय देता हूँ । तुम मेरे विषयमें सुनो ॥ ४ ॥

> पुत्रः किल जवस्याहं माता मम शतह्रदा ।  
> विराध इति मामाहुः पृथिव्यां सर्वराक्षसाः ॥ ५ ॥

‘मैं ‘जव’ नामक राक्षसका पुत्र हूँ, मेरी माताका नाम ‘शतह्रदा’ है । भूमण्डलके समस्त राक्षस मुझे विराधके नामसे पुकारते हैं ॥ ५ ॥

> तपसा चाभिसम्प्राप्ता ब्रह्मणो हि प्रसादजा ।  
> शस्त्रेणावध्यता लोकेऽच्छेद्याभेद्यत्वमेव च ॥ ६ ॥

‘मैंने तपस्याके द्वारा ब्रह्माजीको प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त किया है कि किसी भी शस्त्रसे मेरा वध न हो । मैं संसारमें अच्छेद्य और अभेद्य होकर रहूँ—कोई भी मेरे शरीरको छिन्न-भिन्न नहीं कर सके ॥ ६ ॥

> उत्सृज्य प्रमदामेनामनपेक्षौ यथागतम् ।  
> त्वरमाणौ पलायेथां न वां जीवितमाददे ॥ ७ ॥

‘अब तुम दोनों इस युवती स्त्रीको यहीं छोड़कर इसे पानेकी इच्छा न रखते हुए जैसे आये हो उसी प्रकार तुरंत यहाँसे भाग जाओ । मैं तुम दोनोंके प्राण नहीं लूँगा’ ॥ ७ ॥

> तं रामः प्रत्युवाचेदं कोपसंरक्तलोचनः ।  
> राक्षसं विकृताकारं विराधं पापचेतसम् ॥ ८ ॥

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं । वे पापपूर्ण विचार और विकट आकारवाले उस पापी राक्षस विराधसे इस प्रकार बोले—॥ ८ ॥

> क्षुद्र धिक् त्वां तु हीनार्थं मृत्युमन्वेषसे ध्रुवम् ।  
> रणे प्राप्स्यसि संतिष्ठ न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ ९ ॥  
> ततः सज्यं धनुः कृत्वा रामः सुनिशिताञ्छरान् ।  
> सुशीघ्रमभिसंधाय राक्षसं निजघान ह ॥ १० ॥

‘नीच ! तुझे धिक्कार है । तेरा अभिप्राय बड़ा ही खोटा है । निश्चय ही तू अपनी मौत ढूँढ़ रहा है और वह तुझे युद्धमें मिलेगी । ठहर, अब तू मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा’॥ यह कहकर भगवान् श्रीरामने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और तुरंत ही तीखे बाणोंका अनुसंधान करके उस राक्षसको बींधना आरम्भ किया ॥ १० ॥

> धनुषा ज्यागुणवता सप्त बाणान् मुमोच ह ।  
> रुक्मपुङ्खान् महावेगान् सुपर्णानिलतुल्यगान् ॥ ११ ॥

उन्होंने प्रत्यञ्चायुक्त धनुषके द्वारा विराधके ऊपर लगातार सात बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायुके समान महान् वेगशाली थे और सोनेके पंखोंसे सुशोभित हो रहे थे ॥ ११ ॥

> ते शरीरं विराधस्य भित्त्वा बर्हिणवाससः ।  
> निपेतुः शोणितादिग्धा धरण्यां पावकोपमाः ॥ १२ ॥

प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और मोरपंख लगे हुए वे बाण विराधके शरीरको छेदकर रक्तरञ्जित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥

> स विद्धो न्यस्य वैदेहीं शूलमुद्यम्य राक्षसः ।  
> अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धस्तदा रामं सलक्ष्मणम् ॥ १३ ॥

घायल हो जानेपर उस राक्षसने विदेहकुमारी सीताको अलग रख दिया और स्वयं हाथमें शूल लिये अत्यन्त कुपित होकर श्रीराम तथा लक्ष्मणपर तत्काल टूट पड़ा ॥ १३ ॥

> स विनद्य महानादं शूलं शक्रध्वजोपमम् ।  
> प्रगृह्याशोभत तदा व्यात्तानन इवान्तकः ॥ १४ ॥

वह बड़े जोरसे गर्जना करके इन्द्रध्वजके समान शूल लेकर उस समय मुँह बाये हुए कालके समान शोभा पा रहा था ॥ १४ ॥

> अथ तौ भ्रातरौ दीप्तं शरवर्षं ववर्षतुः ।  
> विराधे राक्षसे तस्मिन् कालान्तकयमोपमे ॥ १५ ॥

तब काल, अन्तक और यमराजके समान उस भयंकर राक्षस विराधके ऊपर उन दोनों भाइयोंने प्रज्वलित बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १५ ॥

> स प्रहस्य महारौद्रः स्थित्वाजृम्भत राक्षसः ।  
> जृम्भमाणस्य ते बाणाः कायान्निष्पेतुराशुगाः ॥ १६ ॥

‘यह देख वह महाभयंकर राक्षस अट्टहास करके खड़ा हो गया और जँभाईके साथ अँगड़ाई लेने लगा । उसके वैसा करते ही वे शीघ्रगामी बाण उसके शरीरसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १६ ॥

> स्पर्शात् तु वरदानेन प्राणान् संरोध्य राक्षसः ।  
> विराधः शूलमुद्यम्य राघवावभ्यधावत ॥ १७ ॥

वरदानके सम्बन्धसे उस राक्षस विराधने प्राणोंको रोक लिया और शूल उठाकर उन दोनों रघुवंशी वीरोंपर आक्रमण किया ॥ १७ ॥

> तच्छूलं वज्रसंकाशं गगने ज्वलनोपमम् ।  
> द्वाभ्यां शराभ्यां चिच्छेद रामः शस्त्रभृतां वरः ॥ १८ ॥

उसका वह शूल आकाशमें वज्र और अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा; परंतु शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने दो बाण मारकर उसे काट डाला ॥ १८ ॥

> तद् रामविशिखैश्छिन्नं शूलं तस्यापतद् भुवि ।  
> पपाताशनिना छिन्नं मेरोरिव शिलातलम् ॥ १९ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे कटा हुआ विराधका वह शूल वज्रसे छिन्न-भिन्न हुए मेरुके शिलाखण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १९ ॥

> तौ खड्गौ क्षिप्रमुद्यम्य कृष्णसर्पाविवोद्यतौ ।  
> तूर्णमापेततुस्तस्य तदा प्रहरतां बलात् ॥ २० ॥

फिर तो वे दोनों भाई शीघ्र ही काले सर्पोंके समान दो तलवारें लेकर तुरंत उसपर टूट पड़े और तत्काल बलपूर्वक प्रहार करने लगे ॥ २० ॥

> स वध्यमानः सुभृशं भुजाभ्यां परिगृह्य तौ ।  
> अप्रकम्प्यौ नरव्याघ्रौ रौद्रः प्रस्थातुमैच्छत ॥ २१ ॥

उनके आघातसे अत्यन्त घायल हुए उस भयंकर राक्षसने अपनी दोनों भुजाओंसे उन अकम्प्य पुरुषसिंह वीरोंको पकड़कर अन्यत्र जानेकी इच्छा की ॥ २१ ॥

> तस्याभिप्रायमाज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।  
> वहत्वयमलं तावत् पथानेन तु राक्षसः ॥ २२ ॥  
> यथा चेच्छति सौमित्रे तथा वहतु राक्षसः ।  
> अयमेव हि नः पन्था येन याति निशाचरः ॥ २३ ॥  
> स तु स्वबलवीर्येण समुत्क्षिप्य निशाचरः ।  
> बालाविव स्कन्धगतौ चकारातिबलोद्धतः ॥ २४ ॥

उसके अभिप्रायको जानकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा— ‘सुमित्रानन्दन ! यह राक्षस अपनी इच्छाके अनुसार हम लोगोंको इस मार्गसे ढोकर ले चले । यह जैसा चाहता है, उसी तरह हमारा वाहन बनकर हमें ले चले ( इसमें बाधा डालनेकी आवश्यकता नहीं है ) । जिस मार्गसे यह निशाचर चल रहा है, वही हमलोगोंके लिये आगे जानेका मार्ग है’ ॥ अत्यन्त बलसे उद्दण्ड बने हुए निशाचर विराधने अपने बल-पराक्रमसे उन दोनों भाइयोंको बालकोंकी तरह उठाकर अपने दोनों कंधोंपर बिठा लिया ॥ २४ ॥

> तावारोप्य ततः स्कन्धं राघवौ रजनीचरः ।  
> विराधो विनदन् घोरं जगामाभिमुखो वनम् ॥ २५ ॥

उन दोनों रघुवंशी वीरोंको कंधेपर चढ़ा लेनेके बाद राक्षस विराध भयंकर गर्जना करता हुआ वनकी ओर चल दिया ॥ २५ ॥

> वनं महामेघनिभं प्रविष्टो  
> द्रुमैर्महद्भिर्विविधैरुपेतम् ।  
> नानाविधैः पक्षिकुलैर्विचित्रं  
> शिवायुतं व्यालमृगैर्विकीर्णम् ॥ २६ ॥

तदनन्तर उसने एक ऐसे वनमें प्रवेश किया, जो महान् मेघोंकी घटाके समान घना और नीला था । नाना प्रकारके बड़े-बड़े वृक्ष वहाँ भरे हुए थे । भाँति-भाँतिके पक्षियोंके समुदाय उसे विचित्र शोभासे सम्पन्न बना रहे थे तथा बहुत-से गीदड़ और हिंसक पशु उसमें सब ओर फैले हुए थे ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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