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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 28"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 28

> निहतं दूषणं दृष्ट्वा रणे त्रिशिरसा सह ।  
> खरस्याप्यभवत् त्रासो दृष्ट्वा रामस्य विक्रमम् ॥ १ ॥  
> स दृष्ट्वा राक्षसं सैन्यमविषह्यं महाबलम् ।  
> हतमेकेन रामेण दूषणस्त्रिशिरा अपि ॥ २ ॥  
> तद्बलं हतभूयिष्ठं विमनाः प्रेक्ष्य राक्षसः ।  
> आससाद खरो रामं नमुचिर्वासवं यथा ॥ ३ ॥

त्रिशिरासहित दूषणको रणभूमिमें मारा गया देख श्रीरामके पराक्रमपर दृष्टिपात करके खरको भी बड़ा भय हुआ ॥ एकमात्र श्रीरामने महान् बलशाली और असह्य राक्षस-सेनाका वध कर डाला । दूषण और त्रिशिराको भी मार गिराया तथा मेरी सेनाके अधिकांश ( चौदह हजार ) प्रमुख वीरोंको कालके गालमें भेज दिया—यह सब देख और सोचकर राक्षस खर उदास हो गया । उसने श्रीरामपर उसी तरह आक्रमण किया, जैसे नमुचिने इन्द्रपर किया था ॥ २-३ ॥

> विकृष्य बलवच्चापं नाराचान् रक्तभोजनान् ।  
> खरश्चिक्षेप रामाय क्रुद्धानाशीविषानिव ॥ ४ ॥

खरने एक प्रबल धनुषको खींचकर श्रीरामके प्रति बहुत-से नाराच चलाये, जो रक्त पीनेवाले थे । वे समस्त नाराच रोषमें भरे हुए विषधर सर्पोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥

> ज्यां विधुन्वन् सुबहुशः शिक्षयास्त्राणि दर्शयन् ।  
> चचार समरे मार्गाञ्छरै रथगतः खरः ॥ ५ ॥

धनुर्विद्याके अभ्याससे प्रत्यञ्चाको हिलाता और नाना प्रकारके अस्त्रोंका प्रदर्शन करता हुआ रथारूढ़ खर समराङ्गणमें युद्धके अनेक पैंतरे दिखाता हुआ विचरने लगा ॥५॥

> स सर्वाश्च दिशो बाणैः प्रदिशश्च महारथः ।  
> पूरयामास तं दृष्ट्वा रामोऽपि सुमहद् धनुः ॥ ६ ॥

उस महारथी वीरने अपने बाणोंसे समस्त दिशाओं और विदिशाओंको ढक दिया । उसे ऐसा करते देख श्रीरामने भी अपना विशाल धनुष उठाया और समस्त दिशाओंको बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ६ ॥

> स सायकैर्दुर्विषहैर्विस्फुलिङ्गैरिवाग्निभिः ।  
> नभश्चकाराविवरं पर्जन्य इव वृष्टिभिः ॥ ७ ॥

जैसे मेघ जलकी वर्षासे आकाशको ढक देता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजीने भी आगकी चिनगारियोंके समान दुःसह सायकोंकी वर्षा करके आकाशको ठसाठस भर दिया । वहाँ थोड़ी-सी भी जगह खाली नहीं रहने दी ॥ ७ ॥

> तद् बभूव शितैर्बाणैः खररामविसर्जितैः ।  
> पर्याकाशमनाकाशं सर्वतः शरसंकुलम् ॥ ८ ॥

खर और श्रीरामद्वारा छोड़े गये पैने बाणोंसे व्याप्त हो सब ओर फैला हुआ आकाश चारों ओरसे बाणोंद्वारा भर जानेके कारण अवकाशरहित हो गया ॥ ८ ॥

> शरजालावृतः सूर्यो न तदा स्म प्रकाशते ।  
> अन्योन्यवधसंरम्भादुभयोः सम्प्रयुध्यतोः ॥ ९ ॥

एक दूसरेके वधके लिये रोषपूर्वक जूझते हुए उन दोनों वीरोंके बाणजालसे आच्छादित होकर सूर्यदेव प्रकाशित नहीं होते थे ॥ ९ ॥

> ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः ।  
> आजघान रणे रामं तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ १० ॥

तदनन्तर खरने रणभूमिमें श्रीरामपर नालीक, नाराच और तीखे अग्रभागवाले विकर्णि नामक बाणोंद्वारा प्रहार किया, मानो किसी महान् गजराजको अङ्कुशोंद्वारा मारा गया हो ॥ १० ॥

> तं रथस्थं धनुष्पाणिं राक्षसं पर्यवस्थितम् ।  
> ददृशुः सर्वभूतानि पाशहस्तमिवान्तकम् ॥ ११ ॥

उस समय हाथमें धनुष लेकर रथमें स्थिरतापूर्वक बैठे हुए राक्षस खरको समस्त प्राणियोंने पाशधारी यमराजके समान देखा ॥ ११ ॥

> हन्तारं सर्वसैन्यस्य पौरुषे पर्यवस्थितम् ।  
> परिश्रान्तं महासत्त्वं मेने रामं खरस्तदा ॥ १२ ॥

उस वेलामें समस्त सेनाओंका वध करनेवाले तथा पुरुषार्थपर डटे हुए महान् बलशाली श्रीरामको खरने थका हुआ समझा ॥ १२ ॥

> तं सिंहमिव विक्रान्तं सिंहविक्रान्तगामिनम् ।  
> दृष्ट्वा नोद्विजते रामः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ १३ ॥

यद्यपि वह सिंहके समान चलता और सिंहके ही तुल्य पराक्रम प्रकट करता था तो भी उस खरको देखकर श्रीराम उसी तरह उद्विग्न नहीं होते थे, जैसे छोटे-से मृगको देखकर सिंह भयभीत नहीं होता है ॥ १३ ॥

> ततः सूर्यनिकाशेन रथेन महता खरः ।  
> आससादाथ तं रामं पतङ्ग इव पावकम् ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् जैसे पतिङ्गा आगके पास जाता है, उसी प्रकार खर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी विशाल रथके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके पास गया ॥ १४ ॥

> ततोऽस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे महात्मनः ।  
> खरश्चिच्छेद रामस्य दर्शयन् हस्तलाघवम् ॥ १५ ॥

वहाँ जाकर उस राक्षस खरने अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए महात्मा श्रीरामके बाणसहित धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट डाला ॥ १५ ॥

> स पुनस्त्वपरान् सप्त शरानादाय मर्मणि ।  
> निजघान रणे क्रुद्धः शक्राशनिसमप्रभान् ॥ १६ ॥

फिर इन्द्रके वज्रकी भाँति प्रकाशित होनेवाले दूसरे सात बाण लेकर रणभूमिमें कुपित हुए खरने उनके द्वारा श्रीरामके मर्मस्थलमें चोट पहुँचायी ॥ १६ ॥

> ततः शरसहस्रेण राममप्रतिमौजसम् ।  
> अर्दयित्वा महानादं ननाद समरे खरः ॥ १७ ॥

तदनन्तर अप्रतिम बलशाली श्रीरामको सहस्रों बाणोंसे पीड़ित करके निशाचर खर समरभूमिमें जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ १७ ॥

> ततस्तत्प्रहतं बाणैः खरमुक्तैः सुपर्वभिः।  
> पपात कवचं भूमौ रामस्यादित्यवर्चसम् ॥ १८॥

खरके छोड़े हुए उत्तम गाँठवाले बाणोंद्वारा कटकर श्रीरामका सूर्यतुल्य तेजस्वी कवच पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १८॥

> स शरैरर्पितः क्रुद्धः सर्वगात्रेषु राघवः।  
> रराज समरे रामो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ १९॥

उनके सभी अङ्गोंमें खरके बाण धँस गये थे। उस समय कुपित हो समरभूमिमें खड़े हुए श्रीरघुनाथजी धूमरहित प्रज्वलित अग्निकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ १९॥

> ततो गम्भीरनिर्ह्रादं रामः शत्रुनिबर्हणः।  
> चकारान्ताय स रिपोः सज्यमन्यन्महद्धनुः ॥ २०॥

तब शत्रुओंका नाश करनेवाले भगवान् श्रीरामने अपने विपक्षीका विनाश करनेके लिये एक दूसरे विशाल धनुषपर, जिसकी ध्वनि बहुत ही गम्भीर थी, प्रत्यञ्चा चढ़ायी॥ २०॥

> सुमहद् वैष्णवं यत् तदतिसृष्टं महर्षिणा।  
> वरं तद् धनुरुद्यम्य खरं समभिधावत ॥ २१॥

महर्षि अगस्त्यने जो महान् और उत्तम वैष्णव धनुष प्रदान किया था, उसीको लेकर उन्होंने खरपर धावा किया ॥ २१॥

> ततः कनकपुङ्खैस्तु शरैः संनतपर्वभिः।  
> चिच्छेद रामः संक्रुद्धः खरस्य समरे ध्वजम्॥ २२॥

उस समय अत्यन्त क्रोधमें भरकर श्रीरामने सोनेकी पाँख और झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा समराङ्गणमें खरकी ध्वजा काट डाली ॥ २२॥

> स दर्शनीयो बहुधा विच्छिन्नः काञ्चनो ध्वजः।  
> जगाम धरणीं सूर्यो देवतानामिवाज्ञया ॥ २३॥

वह दर्शनीय सुवर्णमय ध्वज अनेक टुकड़ोंमें कटकर धरतीपर गिर पड़ा, मानो देवताओंकी आज्ञासे सूर्यदेव भूमिपर उतर आये हों ॥ २३॥

> तं चतुर्भिः खरः क्रुद्धो रामं गात्रेषु मार्गणैः।  
> विव्याध हृदि मर्मज्ञो मातङ्गमिव तोमरैः ॥ २४॥

क्रोधमें भरे हुए खरको मर्मस्थानोंका ज्ञान था। उसने श्रीरामके अङ्गोंमें, विशेषतः उनकी छातीमें चार बाण मारे, मानो किसी महावतने गजराजपर तोमरोंसे प्रहार किया हो ॥ २४॥

> स रामो बहुभिर्बाणैः खरकार्मुकनिःसृतैः।  
> विद्धो रुधिरसिक्ताङ्गो बभूव रुषितो भृशम् ॥ २५॥

खरके धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंसे घायल होकर श्रीरामका सारा शरीर लहूलुहान हो गया। इससे उनको बड़ा रोष हुआ ॥ २५॥

> स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठः संगृह्य परमाहवे।  
> मुमोच परमेष्वासः षट् शरानभिलक्षितान् ॥ २६॥

धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर श्रीरामने युद्धस्थलमें पूर्वोक्त श्रेष्ठ धनुषको हाथमें लेकर लक्ष्य निश्चित करके खरको छः बाण मारे ॥ २६॥

> शिरस्येकेन बाणेन द्वाभ्यां बाह्वोरथार्पयत्।  
> त्रिभिश्चन्द्रार्धवक्त्रैश्च वक्षस्यभिजघान ह ॥ २७॥

उन्होंने एक बाण उसके मस्तकमें, दोसे उसकी भुजाओंमें और तीन अर्धचन्द्राकार बाणोंसे उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २७॥

> ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् भास्करोपमान्।  
> जघान राक्षसं क्रुद्धस्त्रयोदश शिलाशितान् ॥ २८॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने कुपित होकर उस राक्षसको शानपर तेज किये हुए और सूर्यके समान चमकनेवाले तेरह बाण मारे ॥ २८॥

> रथस्य युगमेकेन चतुर्भिः शबलान् हयान्।  
> षष्ठेन च शिरः संख्ये चिच्छेद खरसारथेः ॥ २९॥

एक बाणसे तो उसके रथका जूआ काट दिया, चार बाणोंसे चारों चितकबरे घोड़े मार डाले और छठे बाणसे युद्धस्थलमें खरके सारथिका मस्तक काट गिराया ॥ २९॥

> त्रिभिस्त्रिवेणून् बलवान् द्वाभ्यामक्षं महाबलः।  
> द्वादशेन तु बाणेन खरस्य सशरं धनुः ॥ ३०॥  
> छित्त्वा वज्रनिकाशेन राघवः प्रहसन्निव।  
> त्रयोदशेनेन्द्रसमो बिभेद समरे खरम् ॥ ३१॥

तत्पश्चात् तीन बाणोंसे त्रिवेणु ( जूएके आधारदण्ड ) और दोसे रथके धुरेको खण्डित करके महान् शक्तिशाली और बलवान् श्रीरामने बारहवें बाणसे खरके बाणसहित धनुषके दो टुकड़े कर दिये। इसके बाद इन्द्रके समान तेजस्वी श्रीराघवेन्द्रने हँसते-हँसते वज्रतुल्य तेरहवें बाणके द्वारा समराङ्गणमें खरको घायल कर दिया ॥ ३०-३१॥

> प्रभग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।  
> गदापाणिरवप्लुत्य तस्थौ भूमौ खरस्तदा ॥ ३२॥

धनुषके खण्डित होने, रथके टूटने, घोड़ोंके मारे जाने और सारथिके भी नष्ट हो जानेपर खर उस समय हाथमें गदा ले रथसे कूदकर धरतीपर खड़ा हो गया ॥ ३२॥

> तत् कर्म रामस्य महारथस्य  
> समेत्य देवाश्च महर्षयश्च।  
> अपूजयन् प्राञ्जलयः प्रहृष्टा-  
> स्तदा विमानाग्रगताः समेताः ॥ ३३॥

उस अवसरपर विमानपर बैठे हुए देवता और महारथी श्रीरामके उस कर्मकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने महर्षि हर्षसे उत्फुल्ल हो परस्पर मिलकर हाथ जोड़ लगे ॥ ३३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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