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title: "अरण्यकाण्ड, Sarga 21"
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# अरण्यकाण्ड, Sarga 21

> स पुनः पतितां दृष्ट्वा क्रोधाच्छूर्पणखां पुनः ।  
> उवाच व्यक्तया वाचा तामनर्थार्थमागताम् ॥ १ ॥

शूर्पणखाको पुनः पृथ्वीपर पड़ी हुई देख अनर्थके लिये आयी हुई उस बहिनसे खरने क्रोधपूर्वक स्पष्ट वाणीमें फिर कहा–॥ १ ॥

> मया त्विदानीं शूरास्ते राक्षसाः पिशिताशनाः ।  
> त्वत्प्रियार्थं विनिर्दिष्टाः किमर्थं रुद्यते पुनः ॥ २ ॥

‘बहिन ! मैंने तुम्हारा प्रिय करनेके लिये उस समय बहुत-से शूरवीर एवं मांसाहारी राक्षसोंको जानेकी आज्ञा दे दी थी, अब फिर तुम किसलिये रो रही हो ? ॥ २ ॥

> भक्ताश्चैवानुरक्ताश्च हिताश्च मम नित्यशः ।  
> हन्यमाना न हन्यन्ते न न कुर्युर्वचो मम ॥ ३ ॥

‘मैंने जिन राक्षसोंको भेजा था, वे मेरे भक्त, मुझमें अनुराग रखनेवाले और सदा मेरा हित चाहनेवाले हैं । वे किसीके मारनेपर भी मर नहीं सकते । उनके द्वारा मेरी आज्ञाका पालन न हो, यह भी सम्भव नहीं है ॥ ३ ॥

> किमेतच्छ्रोतुमिच्छामि कारणं यत्कृते पुनः ।  
> हा नाथेति विनर्दन्ती सर्पवच्चेष्टसे क्षितौ ॥ ४ ॥

‘फिर ऐसा कौन-सा कारण उपस्थित हो गया, जिसके लिये तुम ‘हा नाथ’ की पुकार मचाती हुई साँपकी तरह धरतीपर लोट रही हो । मैं उसे सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

> अनाथवद् विलपसि किं नु नाथे मयि स्थिते ।  
> उत्तिष्ठोत्तिष्ठ मा मैवं वैक्लव्यं त्यज्यतामिति ॥ ५ ॥

‘मेरे-जैसे संरक्षकके रहते हुए तुम अनाथकी तरह विलाप क्यों करती हो ? उठो ! उठो !! इस तरह लोटो मत । घबराहट छोड़ दो’ ॥ ५ ॥

> इत्येवमुक्ता दुर्धर्षा खरेण परिसान्त्विता ।  
> विमृज्य नयने साश्रू खरं भ्रातरमब्रवीत् ॥ ६ ॥

खरके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर वह दुर्धर्ष राक्षसी अपने आँसू भरे नेत्रोंको पोंछकर भाई खरसे बोली–॥ ६ ॥

> अस्मीदानीमहं प्राप्ता हतश्रवणनासिका ।  
> शोणितौघपरिक्लिन्ना त्वया च परिसान्त्विता ॥ ७ ॥

‘भैया ! मैं इस समय फिर तुम्हारे पास क्यों आयी हूँ—यह बताती हूँ, सुनो––मेरे नाक-कान कट गये और मैं खूनकी धारासे नहा उठी, उस अवस्थामें जब पहली बार मैं आयी थी, तब तुमने मुझे बड़ी सान्त्वना दी थी ॥ ७ ॥

> प्रेषिताश्च त्वया शूरा राक्षसास्ते चतुर्दश ।  
> निहन्तुं राघवं घोरं मत्प्रियार्थं सलक्ष्मणम् ॥ ८ ॥  
> ते तु रामेण सामर्षाः शूलपट्टिशपाणयः ।  
> समरे निहताः सर्वे सायकैर्मर्मभेदिभिः ॥ ९ ॥

‘तत्पश्चात् मेरा प्रिय करनेके लिये लक्ष्मणसहित रामका वध करनेके उद्देश्यसे तुमने जो वे चौदह शूरवीर राक्षस भेजे थे, वे सब-के-सब अमर्षमें भरकर हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये वहाँ जा पहुँचे, परंतु रामने अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा उन सबको समराङ्गणमें मार गिराया ॥ ८-९ ॥

> तान् भूमौ पतितान्दृष्ट्वा क्षणेनैव महाजवान् ।  
> रामस्य च महत्कर्म महांस्त्रासोऽभवन्मम ॥ १० ॥

‘उन महान् वेगशाली निशाचरोंको क्षणभरमें ही धराशायी हुआ देख रामके उस महान् पराक्रमपर दृष्टिपात करके मेरे मनमें बड़ा भय उत्पन्न हो गया ॥ १० ॥

> सास्मि भीता समुद्विग्ना विषण्णा च निशाचर ।  
> शरणं त्वां पुनः प्राप्ता सर्वतो भयदर्शिनी ॥ ११ ॥

‘निशाचरराज ! मैं भयभीत, उद्विग्न और विषादग्रस्त हो गयी हूँ । मुझे सब ओर भय-ही-भय दिखायी देता है, इसीलिये फिर तुम्हारी शरणमें आयी हूँ ॥ ११ ॥

> विषादनक्राध्युषिते परित्रासोर्मिमालिनि ।  
> किं मां न त्रायसे मग्नां विपुले शोकसागरे ॥ १२ ॥

‘मैं शोकके उस विशाल समुद्रमें डूब गयी हूँ, जहाँ विषादरूपी मगर निवास करते हैं और त्रासकी तरङ्गमालाएँ उठती रहती हैं । तुम उस शोकसागरसे मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हो ? ॥ १२ ॥

> एते च निहता भूमौ रामेण निशितैः शरैः ।  
> ये च मे पदवीं प्राप्ता राक्षसाः पिशिताशनाः ॥ १३ ॥

‘जो मांसभक्षी राक्षस मेरे साथ गये थे, वे सब-के-सब रामके पैने बाणोंसे मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हैं ॥ १३ ॥

> मयि ते यद्यनुक्रोशो यदि रक्षःसु तेषु च ।  
> रामेण यदि शक्तिस्ते तेजो वास्ति निशाचर ॥ १४ ॥  
> दण्डकारण्यनिलयं जहि राक्षसकण्टकम् ।

‘राक्षसराज ! यदि मुझपर और उन मरे हुए राक्षसोंपर तुम्हें दया आती हो तथा यदि रामके साथ लोहा लेनेके लिये तुममें शक्ति और तेज हो तो उन्हें मार डालो; क्योंकि दण्डकारण्यमें घर बनाकर रहनेवाले राम राक्षसोंके लिये कण्टक हैं ॥ १४½ ॥

> यदि रामममित्रघ्नं न त्वमद्य वधिष्यसि ॥ १५ ॥  
> तव चैवाग्रतः प्राणांस्त्यक्ष्यामि निरपत्रपा ।

‘यदि तुम आज ही शत्रुघाती रामका वध नहीं कर डालोगे तो मैं तुम्हारे सामने ही अपने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि मेरी लाज लुट चुकी है ॥ १५½ ॥

> बुद्ध्याहमनुपश्यामि न त्वं रामस्य संयुगे ॥ १६ ॥  
> स्थातुं प्रतिमुखे शक्तः सबलोऽपि महारणे ।

‘मैं बुद्धिसे बारंबार सोचकर देखती हूँ कि तुम महासमरमें सबल होकर भी रामके सामने युद्धमें नहीं ठहर सकोगे ॥ १६½ ॥

> शूरमानी न शूरस्त्वं मिथ्यारोपितविक्रमः ॥ १७ ॥  
> अपयाहि जनस्थानात् त्वरितः सहबान्धवः ।  
> जहि त्वं समरे मूढान्यथा तु कुलपांसन ॥ १८ ॥

‘तुम अपनेको शूरवीर मानते हो, किंतु तुममें शौर्य है ही नहीं । तुमने झूठे ही अपने-आपमें पराक्रमका आरोप कर लिया है । मूढ़ ! तुम समराङ्गणमें उन दोनोंको मार डालो अन्यथा अपने कुलमें कलङ्क लगाकर भाई-बन्धुओंके साथ तुरंत ही इस जनस्थानसे भाग जाओ ॥ १७-१८ ॥

> मानुषौ तौ न शक्नोषि हन्तुं वै रामलक्ष्मणौ ।  
> निःसत्त्वस्याल्पवीर्यस्य वासस्ते कीदृशस्त्विह ॥ १९ ॥

‘राम और लक्ष्मण मनुष्य हैं, यदि उन्हें भी मारनेकी तुममें शक्ति नहीं है तो तुम्हारे-जैसे निर्बल और पराक्रमशून्य राक्षसका यहाँ रहना कैसे सम्भव हो सकता है ! ॥ १९ ॥

> रामतेजोऽभिभूतो हि त्वं क्षिप्रं विनशिष्यसि ।  
> स हि तेजःसमायुक्तो रामो दशरथात्मजः ॥ २० ॥  
> भ्राता चास्य महावीर्यो येन चास्मि विरूपिता ।

‘तुम रामके तेजसे पराजित होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे; क्योंकि दशरथकुमार राम बड़े तेजस्वी हैं । उनका भाई भी महान् पराक्रमी है, जिसने मुझे नाक-कानसे हीन करके अत्यन्त कुरूप बना दिया’ ॥ २०½ ॥

> एवं विलप्य बहुशो राक्षसी प्रदरोदरी ॥ २१ ॥  
> भ्रातुः समीपे शोकार्ता नष्टसंज्ञा बभूव ह ।  
> कराभ्यामुदरं हत्वा रुरोद भृशदुःखिता ॥ २२ ॥

इस प्रकार बहुत विलाप करके गुफाके समान गहरे पेटवाली वह राक्षसी शोकसे आतुर हो अपने भाईके पास मूर्च्छित-सी हो गयी और अत्यन्त दुखी हो दोनों हाथोंसे पेट पीटती हुई फूट-फूटकर रोने लगी ॥ २१-२२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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