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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 9b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 9b

**चौ०** 
> कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥  
> बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥१॥

भावार्थ: सोनेके कलशोंको विचित्र रीतिसे [ मणि-रत्नादिसे ] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगोंने अपने-अपने दरवाजोंपर रख लिया। सब लोगोंने मङ्गलके लिये बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं॥ १ ॥

**चौ०** 
> बीथीं सकल सुगंध सिंचाईं। गजमनि रचि बहु चौक पुराईं॥  
> नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे॥२॥

भावार्थ: सारी गलियाँ सुगन्धित द्रवोंसे सिंचायी गयीं। गजमुक्ताओंसे रचकर बहुत-सी चौकें पुरायी गयीं। अनेकों प्रकारके सुन्दर मङ्गल-साज सजाये गये और हर्षपूर्वक नगरमें बहुत-से डंके बजने लगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं॥  
> कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना॥३॥

भावार्थ: स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदयमें हर्षित होकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत-सी युवती [ सौभाग्यवती ] स्त्रियाँ सोनेके थालोंमें अनेकों प्रकारकी आरती सजकर मङ्गलगान कर रही हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें॥  
> पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना॥४॥

भावार्थ: वे आर्तिहर ( दुःखोंको हरनेवाले ) और सूर्यकुलरूपी कमलवनके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजीकी आरती कर रही हैं। नगरकी शोभा, सम्पत्ति और कल्याणका वेद, शेषजी और सरस्वतीजी वर्णन करते हैं— ॥ ४ ॥

**चौ०** 
> तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥५॥

भावार्थ: परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं ( स्तम्भित हो रहते हैं )। [ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं॥ ५ ॥

**दो०** 
> नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस।  
> अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस॥९ (क)॥

भावार्थ: स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [ इस विरह-सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं ]। अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं॥ ९ ( क ) ॥

**दो०** 
> होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान।  
> पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान॥९ (ख)॥

भावार्थ: अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं। नगरके पुरुषों और स्त्रियोंको सनाथ ( दर्शनद्वारा कृतार्थ ) करके भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी महलको चले॥ ९ ( ख ) ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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