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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 99b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 99b

**चौ०** 
> नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं॥  
> सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना॥ १॥

भावार्थ: हे गोसाईं! सभी मनुष्य स्त्रियोंके विशेष वशमें हैं और बाजीगरके बंदरकी तरह [ उनके नचाये ] नाचते हैं। ब्राह्मणोंको शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गलेमें जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं॥१॥

**चौ०** 
> सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी॥  
> गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥ २॥

भावार्थ: सभी पुरुष काम और लोभमें तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतोंके विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणोंके धाम सुन्दर पतिको छोड़कर परपुरुषका सेवन करती हैं॥२॥

**चौ०** 
> सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना॥  
> गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा॥ ३॥

भावार्थ: सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणोंसे रहित होती हैं, पर विधवाओंके नित्य नये शृङ्गार होते हैं। शिष्य और गुरुमें बहरे और अंधेका-सा हिसाब होता है। एक ( शिष्य ) गुरुके उपदेशको सुनता नहीं, एक ( गुरु ) देखता नहीं ( उसे ज्ञानदृष्टि प्राप्त नहीं है )॥३॥

**चौ०** 
> हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई॥  
> मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥ ४॥

भावार्थ: जो गुरु शिष्यका धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरकमें पड़ता है। माता-पिता बालकोंको बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे॥४॥

**दो०** 
> ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।  
> कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात॥ ९९ (क)॥

भावार्थ: स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञानके सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों ( बहुत थोड़े लाभ ) के लिये ब्राह्मण और गुरुकी हत्या कर डालते हैं॥९९ ( क )॥

**दो०** 
> बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।  
> जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि॥ ९९ (ख)॥

भावार्थ: शूद्र ब्राह्मणोंसे विवाद करते हैं [ और कहते हैं ] कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्मको जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। [ ऐसा कहकर ] वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं॥९९ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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