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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 97b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 97b

**चौ०** 
> तेहिं कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई॥  
> सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी॥१॥

भावार्थ: उस कलियुगमें मैं अयोध्यापुरीमें जाकर शूद्रका शरीर पाकर जन्मा। मैं मन, वचन और कर्मसे शिवजीका सेवक और दूसरे देवताओंकी निन्दा करनेवाला अभिमानी था॥१॥

**चौ०** 
> धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला॥  
> जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी॥२॥

भावार्थ: मैं धनके मदसे मतवाला, बहुत ही बकवादी और उग्रबुद्धिवाला था; मेरे हृदयमें बड़ा भारी दम्भ था। यद्यपि मैं श्रीरघुनाथजीकी राजधानीमें रहता था, तथापि मैंने उस समय उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी॥२॥

**चौ०** 
> अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा॥  
> कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई॥३॥

भावार्थ: अब मैंने अवधका प्रभाव जाना। वेद, शास्त्र और पुराणोंने ऐसा गाया है कि किसी भी जन्ममें जो कोई भी अयोध्यामें बस जाता है, वह अवश्य ही श्रीरामजीके परायण हो जायगा॥३॥

**चौ०** 
> अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी॥  
> सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी॥४॥

भावार्थ: अवधका प्रभाव जीव तभी जानता है, जब हाथमें धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी उसके हृदयमें निवास करते हैं। हे गरुड़जी! वह कलिकाल बड़ा कठिन था। उसमें सभी नर-नारी पापपरायण ( पापोंमें लिप्त ) थे॥४॥

**दो०** 
> कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ।  
> दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ॥ ९७ (क) ॥

भावार्थ: कलियुगके पापोंने सब धर्मोंको ग्रस लिया, सद्‌ग्रन्थ लुप्त हो गये, दम्भियोंने अपनी बुद्धिसे कल्पना कर-करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये॥९७ ( क )॥

**दो०** 
> भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।  
> सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म॥ ९७ (ख) ॥

भावार्थ: सभी लोग मोहके वश हो गये, शुभकर्मोंको लोभने हड़प लिया। हे ज्ञानके भण्डार! हे श्रीहरिके वाहन! सुनिये, अब मैं कलिके कुछ धर्म कहता हूँ॥९७ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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