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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 95b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 95b

काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना

**चौ०** 
> गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा॥  
> धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी॥१॥

भावार्थ: हे उमा! गरुड़जीकी वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी हर्षित हुए और परम प्रेमसे बोले—हे सर्पोंके शत्रु! आपकी बुद्धि धन्य है! धन्य है! आपके प्रश्न मुझे बहुत ही प्यारे लगे॥१॥

**चौ०** 
> सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई॥  
> सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई॥२॥

भावार्थ: आपके प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे अपने बहुत जन्मोंकी याद आ गयी। मैं अपनी सब कथा विस्तारसे कहता हूँ। हे तात! आदरसहित मन लगाकर सुनिये॥२॥

**चौ०** 
> जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना॥  
> सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा॥३॥

भावार्थ: अनेक जप, तप, यज्ञ, शम ( मनको रोकना ), दम ( इन्द्रियोंको रोकना ), व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सबका फल श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होना है। इसके बिना कोई कल्याण नहीं पा सकता॥३॥

**चौ०** 
> एहिं तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई॥  
> जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई॥४॥

भावार्थ: मैंने इसी शरीरसे श्रीरामजीकी भक्ति प्राप्त की है। इसीसे इसपर मेरी ममता अधिक है। जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उसपर सभी कोई प्रेम करते हैं॥४॥

**सो०** 
> पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।  
> अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित॥ ९५ (क) ॥

भावार्थ: हे गरुड़जी! वेदोंमें मानी हुई ऐसी नीति है और सज्जन भी कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीचसे भी प्रेम करना चाहिये॥९५(क)॥

**सो०** 
> पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर।  
> कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम॥ ९५ (ख) ॥

भावार्थ: रेशम कीड़ेसे होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसीसे उस परम अपवित्र कीड़ेको भी सब कोई प्राणोंके समान पालते हैं॥९५(ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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