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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 92b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 92b

**चौ०** 
> प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला॥  
> तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन॥१॥

भावार्थ: अरबों पातालोंके समान प्रभु अथाह हैं। अरबों यमराजोंके समान भयानक हैं। अनन्तकोटि तीर्थोंके समान वे पवित्र करनेवाले हैं। उनका नाम सम्पूर्ण पापसमूहका नाश करनेवाला है॥१॥

**चौ०** 
> हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा॥  
> कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना॥२॥

भावार्थ: श्रीरघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अचल ( स्थिर ) हैं और अरबों समुद्रोंके समान गहरे हैं। भगवान्‌ अरबों कामधेनुओंके समान सब कामनाओं ( इच्छित पदार्थों ) के देनेवाले हैं॥२॥

**चौ०** 
> सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई॥  
> बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता॥३॥

भावार्थ: उनमें अनन्तकोटि सरस्वतियोंके समान चतुरता है। अरबों ब्रह्माओंके समान सृष्टिरचनाकी निपुणता है। वे करोड़ों विष्णुओंके समान पालन करनेवाले और अरबों रुद्रोंके समान संहार करनेवाले हैं॥३॥

**चौ०** 
> धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना॥  
> भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा॥४॥

भावार्थ: वे अरबों कुबेरोंके समान धनवान्‌ और करोड़ों मायाओंके समान सृष्टिके खजाने हैं। बोझ उठानेमें वे अरबों शेषोंके समान हैं। [ अधिक क्या ] जगदीश्वर प्रभु श्रीरामजी [ सभी बातोंमें ] सीमारहित और उपमारहित हैं॥४॥

**छं०** 
> निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै।  
> जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥  
> एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं।  
> प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥

भावार्थ: श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। श्रीरामके समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। जैसे अरबों जुगनुओंके समान कहनेसे सूर्य [ प्रशंसाको नहीं वरं ] अत्यन्त लघुताको ही प्राप्त होता है ( सूर्यकी निन्दा ही होती है )। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धिके विकासके अनुसार मुनीश्वर श्रीहरिका वर्णन करते हैं। किन्तु प्रभु भक्तोंके भावमात्रको ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं।

**दो०** 
> रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।  
> संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥९२(क)॥

भावार्थ: श्रीरामजी अपार गुणोंके समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है ? संतोंसे मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया॥९२(क)॥

**सो०** 
> भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।  
> तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन॥९२(ख)॥

भावार्थ: सुखके भण्डार, करुणाधाम भगवान्‌ भाव ( प्रेम ) के वश हैं। [ अतएव ] ममता, मद और मानको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजीका ही भजन करना चाहिये॥९२(ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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