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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 8b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 8b

**चौ०** 
> लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला॥  
> हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा॥१॥

भावार्थ: लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान्‌ और अंगद तथा हनुमान्‌जी आदि सभी उत्तम स्वभाववाले वीर वानरोंने मनुष्योंके मनोहर शरीर धारण कर लिये॥ १ ॥

**चौ०** 
> भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा॥  
> देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती॥२॥

भावार्थ: वे सब भरतजीके प्रेम, सुन्दर स्वभाव, [ त्यागके ] व्रत और नियमोंकी अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं। और नगरनिवासियोंकी [ प्रेम, शील और विनयसे पूर्ण ] रीति देखकर वे सब प्रभुके चरणोंमें उनके प्रेमकी सराहना कर रहे हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए॥  
> गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥३॥

भावार्थ: फिर श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया और सबको सिखाया कि मुनिके चरणोंमें लगो। ये गुरु वसिष्ठजी हमारे कुलभरके पूज्य हैं। इन्हींकी कृपासे रणमें राक्षस मारे गये हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥  
> मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥४॥

भावार्थ: [ फिर गुरुजीसे कहा— ] हे मुनि! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्रामरूपी समुद्रमें मेरे लिये बेड़े ( जहाज ) के समान हुए। मेरे हितके लिये इन्होंने अपने जन्मतक हार दिये ( अपने प्राणोंतकको होम दिया )। ये मुझे भरतसे भी अधिक प्रिय हैं॥ ४ ॥

**चौ०** 
> सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए॥५॥

भावार्थ: प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्दमें मग्न हो गये। इस प्रकार पल-पलमें उन्हें नये-नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं॥ ५ ॥

**दो०** 
> कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।  
> आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥८ (क)॥

भावार्थ: फिर उन लोगोंने कौसल्याजीके चरणोंमें मस्तक नवाये। कौसल्याजीने हर्षित होकर आशिषें दीं [ और कहा— ] तुम मुझे रघुनाथके समान प्यारे हो॥ ८ ( क ) ॥

**दो०** 
> सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।  
> चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद॥८ (ख)॥

भावार्थ: आनन्दकन्द श्रीरामजी अपने महलको चले, आकाश फूलोंकी वृष्टिसे छा गया। नगरके स्त्री-पुरुषोंके समूह अटारियोंपर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं॥ ८ ( ख ) ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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