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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 89b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 89b

**चौ०** 
> मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला॥  
> राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ॥१॥

भावार्थ: मैं और कुछ समयतक अवधपुरीमें रहा और मैंने श्रीरामजीकी रसीली बाललीलाएँ देखीं। श्रीरामजीकी कृपासे मैंने भक्तिका वरदान पाया। तदनन्तर प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके मैं अपने आश्रमपर लौट आया॥१॥

**चौ०** 
> तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया॥  
> यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा॥२॥

भावार्थ: इस प्रकार जबसे श्रीरघुनाथजीने मुझको अपनाया, तबसे मुझे माया कभी नहीं व्यापी। श्रीहरिकी मायाने मुझे जैसे नचाया, वह सब गुप्त चरित्र मैंने कहा॥२॥

**चौ०** 
> निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥  
> राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥३॥

भावार्थ: हे पक्षिराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ। [वह यह है कि] भगवान्‌के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते। हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीकी कृपा बिना श्रीरामजीकी प्रभुता नहीं जानी जाती;॥३॥

**चौ०** 
> जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥  
> प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥४॥

भावार्थ: प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं॥४॥

**सो०** 
> बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।  
> गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरिभगति बिनु॥८९(क)॥

भावार्थ: गुरुके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? अथवा वैराग्यके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है ? इसी तरह वेद और पुराण कहते हैं कि श्रीहरिकी भक्तिके बिना क्या सुख मिल सकता है ?॥८९(क)॥

**सो०** 
> कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।  
> चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ॥८९(ख)॥

भावार्थ: हे तात! स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है ? [ चाहे ] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [ फिर भी ] क्या कभी जलके बिना नाव चल सकती है ?॥८९(ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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