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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 88b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 88b

**चौ०** 
> कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही॥  
> प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ॥१॥

भावार्थ: तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरन्तर मेरा स्मरण और भजन करते रहना। प्रभुके वचनामृत सुनकर मैं तृप्त नहीं होता था। मेरा शरीर पुलकित था और मनमें मैं अत्यन्त ही हर्षित हो रहा था॥१॥

**चौ०** 
> सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना॥  
> प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना॥२॥

भावार्थ: वह सुख मन और कान ही जानते हैं। जीभसे उसका बखान नहीं किया जा सकता। प्रभुकी शोभाका वह सुख नेत्र ही जानते हैं। पर वे कह कैसे सकते हैं? उनके वाणी तो है नहीं॥२॥

**चौ०** 
> बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई॥  
> सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा॥३॥

भावार्थ: मुझे बहुत प्रकारसे भलीभाँति समझाकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकोंके खेल करने लगे। नेत्रोंमें जल भरकर और मुखको कुछ रूखा [-सा] बनाकर उन्होंने माताकी ओर देखा—[और मुखाकृति तथा चितवनसे माताको समझा दिया कि] बहुत भूख लगी है॥३॥

**चौ०** 
> देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई॥  
> गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना॥४॥

भावार्थ: यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ीं और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्रीरामजीको छातीसे लगा लिया। वे गोदमें लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्रीरघुनाथजी (उन्हीं) की ललित लीलाएँ गाने लगीं॥४॥

**सो०** 
> जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।  
> अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥८८(क)॥

भावार्थ: जिस सुखके लिये [सबको] सुख देनेवाले कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजीने अशुभ वेष धारण किया, उस सुखमें अवधपुरीके नर-नारी निरन्तर निमग्न रहते हैं॥८८ (क)॥

**सो०** 
> सोई सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ।  
> ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति॥८८(ख)॥

भावार्थ: उस सुखका लवलेशमात्र जिन्होंने एक बार स्वप्नमें भी प्राप्त कर लिया, हे पक्षिराज! वे सुन्दर बुद्धिवाले सज्जन पुरुष उसके सामने ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते॥८८ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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