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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 85b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 85b

**चौ०** 
> एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक॥  
> सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना॥१॥

भावार्थ: ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर रघुवंशके स्वामी परम सुख देनेवाले वचन बोले—हे काक! सुन, तू स्वभावसे ही बुद्धिमान्‌ है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता?॥१॥

**चौ०** 
> सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी॥  
> जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं॥२॥

भावार्थ: तूने सब सुखोंकी खान भक्ति माँग ली, जगत्‌में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। वे मुनि जो जप और योगकी अग्निसे शरीर जलाते रहते हैं, करोड़ों यत्न करके भी जिसको (जिस भक्तिको) नहीं पाते॥२॥

**चौ०** 
> रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई॥  
> सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें॥३॥

भावार्थ: वही भक्ति तूने माँगी। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह चतुरता मुझे बहुत ही अच्छी लगी। हे पक्षी! सुन, मेरी कृपासे अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदयमें बसेंगे॥३॥

**चौ०** 
> भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा॥  
> जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा॥४॥

भावार्थ: भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उनके रहस्य तथा विभाग—इन सबके भेदको तू मेरी कृपासे ही जान जायगा। तुझे साधनका कष्ट नहीं होगा॥४॥

**दो०** 
> माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।  
> जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥८५ (क)॥

भावार्थ: मायासे उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे। मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण (प्रकृतिके गुणोंसे रहित) और [गुणातीत दिव्य] गुणोंकी खान ब्रह्म जानना॥८५ (क)॥

**दो०** 
> मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।  
> कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग॥८५ (ख)॥

भावार्थ: हे काक! सुन, मुझे भक्त निरन्तर प्रिय हैं, ऐसा विचारकर शरीर, वचन और मनसे मेरे चरणोंमें अटल प्रेम करना॥८५ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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