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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 83b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 83b

**चौ०** 
> देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई॥  
> धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता॥१॥

भावार्थ: यह [बाल] चरित्र देखकर और [पेटके अंदर देखी हुई] उस प्रभुताका स्मरण कर मैं शरीरकी सुध भूल गया और ‘हे आर्तजनोंके रक्षक! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये’ पुकारता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। मुखसे बात नहीं निकलती थी!॥१॥

**चौ०** 
> प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी॥  
> कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ॥२॥

भावार्थ: तदनन्तर प्रभुने मुझे प्रेमविह्वल देखकर अपनी मायाकी प्रभुता (प्रभाव) को रोक लिया। प्रभुने अपना कर-कमल मेरे सिरपर रखा। दीनदयालुने मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया॥२॥

**चौ०** 
> कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा॥  
> प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी॥३॥

भावार्थ: सेवकोंको सुख देनेवाले, कृपाके समूह (कृपामय) श्रीरामजीने मुझे मोहसे सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहलेवाली प्रभुताको विचार-विचारकर (याद कर-करके) मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष हुआ॥३॥

**चौ०** 
> भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी॥  
> सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी॥४॥

भावार्थ: प्रभुकी भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदयमें बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने [आनन्दसे] नेत्रोंमें जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकारसे विनती की॥४॥

**दो०** 
> सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास।  
> बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास॥८३(क)॥

भावार्थ: मेरी प्रेमयुक्त वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास श्रीरामजी सुखदायक, गम्भीर और कोमल वचन बोले— ॥८३ (क)॥

**दो०** 
> काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।  
> अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि॥८३(ख)॥

भावार्थ: हे काकभुशुण्डि! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखोंकी खान मोक्ष,॥८३ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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