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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 82b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 82b

**चौ०** 
> भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका॥  
> फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ॥१॥

भावार्थ: अनेक ब्रह्माण्डोंमें भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गये। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रममें आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया॥१॥

**चौ०** 
> निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ॥  
> देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई॥२॥

भावार्थ: फिर जब अपने प्रभुका अवधपुरीमें जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेमसे परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म-महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ॥२॥

**चौ०** 
> राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना॥  
> तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना॥३॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके पेटमें मैंने बहुत-से जगत्‌ देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान मायाके स्वामी कृपालु भगवान्‌ श्रीरामको देखा॥३॥

**चौ०** 
> करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥  
> उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥४॥

भावार्थ: मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ीमें देखा। मनमें विशेष मोह होनेसे मैं थक गया॥४॥

**दो०** 
> देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।  
> बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर॥८२(क)॥

भावार्थ: मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुवीर हँस दिये। हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँहसे बाहर आ गया॥८२ (क)॥

**दो०** 
> सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।  
> कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम॥८२(ख)॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकारसे मनको समझाता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था॥८२ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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