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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 80b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 80b

**चौ०** 
> मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ॥  
> मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं॥१॥

भावार्थ: जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूद लीं। फिर आँखें खोलकर देखते ही अवधपुरीमें पहुँच गया। मुझे देखकर श्रीरामजी मुसकराने लगे। उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुखमें चला गया॥१॥

**चौ०** 
> उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया॥  
> अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका॥२॥

भावार्थ: हे पक्षिराज! सुनिये, मैंने उनके पेटमें बहुत-से ब्रह्माण्डोंके समूह देखे। वहाँ ( उन ब्रह्माण्डोंमें ) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक-से-एककी बढ़कर थी॥२॥

**चौ०** 
> कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा॥  
> अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला॥३॥

भावार्थ: करोड़ों ब्रह्माजी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि, ॥३॥

**चौ०** 
> सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा॥  
> सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर॥४॥

भावार्थ: असंख्य समुद्र, नदी, तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकारकी सृष्टिका विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर तथा चारों प्रकारके जड़ और चेतन जीव देखे॥४॥

**दो०** 
> जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ।  
> सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ॥८० (क)॥

भावार्थ: जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मनमें भी नहीं समा सकता था ( अर्थात्‌ जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ), वही सब अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। तब उसका किस प्रकार वर्णन किया जाय!॥८० ( क )॥

**दो०** 
> एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक।  
> एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक॥८०(ख)॥

भावार्थ: मैं एक-एक ब्रह्माण्डमें एक-एक सौ वर्षतक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा॥ ८० ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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