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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 76"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 76

**चौ०** 
> कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक॥  
> नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती॥१॥

भावार्थ: भुशुण्डिजी कहने लगे—हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीका चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। [ अयोध्याका ] राजमहल सब प्रकारसे सुन्दर है। सोनेके महलमें नाना प्रकारके रत्न जड़े हुए हैं॥१॥

**चौ०** 
> बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई॥  
> बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई॥२॥

भावार्थ: सुन्दर आँगनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं। माताको सुख देनेवाले बालविनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी आँगनमें विचर रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा॥  
> नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना॥३॥

भावार्थ: मरकत मणिके समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। अङ्ग-अङ्गमें बहुत-से कामदेवोंकी शोभा छायी हुई है। नवीन [ लाल ] कमलके समान लाल-लाल कोमल चरण हैं। सुन्दर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योतिसे चन्द्रमाकी कान्तिको हरनेवाले हैं॥३॥

**चौ०** 
> ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी॥  
> चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिनि कल मुखर सुहाई॥४॥

भावार्थ: [ तलवेमें ] वज्रादि ( वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल ) के चार सुन्दर चिह्न हैं, चरणोंमें मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नूपुर हैं, मणियों, रत्नोंसे जड़ी हुई सोनेकी बनी हुई सुन्दर करधनीका शब्द सुहावना लग रहा है॥४॥

**दो०** 
> रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।  
> उर आयत भ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर॥७६॥

भावार्थ: उदरपर सुन्दर तीन रेखाएँ ( त्रिवली ) हैं, नाभि सुन्दर और गहरी है। विशाल वक्षःस्थलपर अनेकों प्रकारके बच्चोंके आभूषण और वस्त्र सुशोभित हैं॥७६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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