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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 75b"
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lang: "hi"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 75b

**चौ०** 
> राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥  
> जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥१॥

भावार्थ: हे पक्षिराज गरुड़जी! श्रीरामजीकी कृपा और अपनी जड़ता ( मूर्खता ) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिये। जब-जब श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यशरीर धारण करते हैं और भक्तोंके लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ॥  
> जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई॥२॥

भावार्थ: तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाललीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्ममहोत्सव देखता हूँ और [ भगवान्‌की शिशुलीलामें ] लुभाकर पाँच वर्षतक वहीं रहता हूँ॥ २ ॥

**चौ०** 
> इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥  
> निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥३॥

भावार्थ: बालकरूप श्रीरामचन्द्रजी मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीरमें अरबों कामदेवोंकी शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभुका मुख देख-देखकर मैं नेत्रोंको सफल करता हूँ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहु रंगा॥४॥

भावार्थ: छोटे-से कौएका शरीर धरकर और भगवान्‌के साथ-साथ फिरकर मैं उनके भाँति-भाँतिके बालचरित्रोंको देखा करता हूँ॥ ४॥

**दो०** 
> लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।  
> जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ॥७५ (क)॥

भावार्थ: लड़कपनमें वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगनमें उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ॥ ७५ ( क )॥

**दो०** 
> एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।  
> सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर॥७५ (ख)॥

भावार्थ: एक बार श्रीरघुवीरने सब चरित्र बहुत अधिकतासे किये। प्रभुकी उस लीलाका स्मरण करते ही काकभुशुण्डिजीका शरीर [ प्रेमानन्दवश ] पुलकित हो गया॥७५ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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