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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 73b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 73b

**चौ०** 
> असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी॥  
> जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी॥१॥

भावार्थ: हे गरुड़जी! ऐसी ही श्रीरघुनाथजीकी यह लीला है, जो राक्षसोंको विशेष मोहित करनेवाली और भक्तोंको सुख देनेवाली है। हे स्वामी! जो मनुष्य मलिनबुद्धि, विषयोंके वश और कामी हैं, वे ही प्रभुपर इस प्रकार मोहका आरोप करते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई॥  
> जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा॥२॥

भावार्थ: जब जिसको [ कवँल आदि ] नेत्रदोष होता है, तब वह चन्द्रमाको पीले रंगका कहता है। हे पक्षिराज! जब जिसे दिशाभ्रम होता है, तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिममें उदय हुआ है॥ २ ॥

**चौ०** 
> नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोहबस आपुहि लेखा॥  
> बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥३॥

भावार्थ: नौकापर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत्‌को चलता हुआ देखता है और मोहवश अपनेको अचल समझता है। बालक घूमते ( चक्राकार दौड़ते ) हैं, घर आदि नहीं घूमते। पर वे आपसमें एक-दूसरेको झूठा कहते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा॥  
> मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी॥४॥

भावार्थ: हे गरुड़जी! श्रीहरिके विषयमें मोहकी कल्पना भी ऐसी ही है, भगवान्‌में तो स्वप्नमें भी अज्ञानका प्रसंग ( अवसर ) नहीं है। किन्तु जो मायाके वश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदयपर अनेकों प्रकारके परदे पड़े हैं, ॥ ४ ॥

**चौ०** 
> ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं॥५॥

भावार्थ: वे मूर्ख हठके वश होकर सन्देह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीरामजीपर आरोपित करते हैं॥ ५ ॥

**दो०** 
> काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप।  
> ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप॥७३ (क)॥

भावार्थ: जो काम, क्रोध, मद और लोभमें रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अन्धकाररूपी कुएँमें पड़े हुए हैं॥ ७३ ( क )॥

**दो०** 
> निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।  
> सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥७३ (ख)॥

भावार्थ: निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ ( सहज ही समझमें आ जानेवाला ) है, परन्तु [ गुणातीत दिव्य ] सगुण रूपको कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान्‌के अनेक प्रकारके सुगम और अगम चरित्रोंको सुनकर मुनियोंके भी मनको भ्रम हो जाता है॥ ७३ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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