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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 69b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 69b

**चौ०** 
> देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी॥  
> सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना॥१॥

भावार्थ: बिलकुल ही लौकिक मनुष्योंका-सा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी सन्देह हो गया। मैं अब उस भ्रम ( सन्देह ) को अपने लिये हित करके समझता हूँ। कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया॥ १ ॥

**चौ०** 
> जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई॥  
> जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही॥२॥

भावार्थ: जो धूपसे अत्यन्त व्याकुल होता है, वही वृक्षकी छायाका सुख जानता है। हे तात! यदि मुझे अत्यन्त मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता?॥ २ ॥

**चौ०** 
> सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई॥  
> निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा॥३॥

भावार्थ: और कैसे अत्यन्त विचित्र यह सुन्दर हरिकथा सुनता; जो आपने बहुत प्रकारसे गायी है? वेद, शास्त्र और पुराणोंका यही मत है; सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि— ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही॥  
> राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ॥४॥

भावार्थ: शुद्ध ( सच्चे ) संत उसीको मिलते हैं जिसे श्रीरामजी कृपा करके देखते हैं। श्रीरामजीकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपासे मेरा सन्देह चला गया॥ ४ ॥

**दो०** 
> सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग।  
> पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग॥६९ (क)॥

भावार्थ: पक्षिराज गरुड़जीकी विनय और प्रेमयुक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजीका शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रोंमें जल भर आया और वे मनमें अत्यन्त हर्षित हुए॥ ६९ ( क )॥

**दो०** 
> श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरिदास।  
> पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास॥६९ (ख)॥

भावार्थ: हे उमा! सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र कथाके प्रेमी और हरिके सेवक श्रोताको पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय ( सबके सामने प्रकट न करनेयोग्य ) रहस्यको भी प्रकट कर देते हैं॥ ६९ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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