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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 66b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 66b

**चौ०** 
> कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई॥  
> पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा॥१॥

भावार्थ: दण्डकवनका पवित्र करना कहकर फिर भुशुण्डिजीने गृध्रराजके साथ मित्रताका वर्णन किया। फिर जिस प्रकार प्रभुने पञ्चवटीमें निवास किया और सब मुनियोंके भयका नाश किया,॥ १ ॥

**चौ०** 
> पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा॥  
> खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना॥२॥

भावार्थ: और फिर जैसे लक्ष्मणजीको अनुपम उपदेश दिया और शूर्पणखाको कुरूप किया, वह सब वर्णन किया। फिर खर-दूषण-वध और जिस प्रकार रावणने सब समाचार जाना, वह बखानकर कहा,॥ २ ॥

**चौ०** 
> दसकंधर मारीच बतकही। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही॥  
> पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना॥३॥

भावार्थ: तथा जिस प्रकार रावण और मारीचकी बातचीत हुई, वह सब उन्होंने कही। फिर मायासीताका हरण और श्रीरघुवीरके विरहका कुछ वर्णन किया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥  
> बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा॥४॥

भावार्थ: फिर प्रभुने गिद्ध जटायुकी जिस प्रकार क्रिया की, कबन्धका वध करके शबरीको परमगति दी और फिर जिस प्रकार विरह-वर्णन करते हुए श्रीरघुवीरजी पंपासरके तीरपर गये, वह सब कहा॥ ४ ॥

**दो०** 
> प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग।  
> पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग॥६६ (क)॥

भावार्थ: प्रभु और नारदजीका संवाद और मारुतिके मिलनेका प्रसंग कहकर फिर सुग्रीवसे मित्रता और बालिके प्राणनाशका वर्णन किया॥ ६६ ( क )॥

**दो०** 
> कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास।  
> बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास॥६६ (ख)॥

भावार्थ: सुग्रीवका राजतिलक करके प्रभुने प्रवर्षण पर्वतपर निवास किया, वह तथा वर्षा और शरद्‌का वर्णन, श्रीरामजीका सुग्रीवपर रोष और सुग्रीवका भय आदि प्रसंग कहे॥ ६६ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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