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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 65"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 65

**चौ०** 
> बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा॥  
> पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा॥१॥

भावार्थ: फिर श्रीरामजीके राज्याभिषेकका प्रसङ्ग, फिर राजा दशरथजीके वचनसे राजरस ( राज्याभिषेकके आनन्द ) में भङ्ग पड़ना, फिर नगरनिवासियोंका विरह, विषाद और श्रीराम-लक्ष्मणका संवाद ( बातचीत ) कहा॥ १ ॥

**चौ०** 
> बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा॥  
> बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना॥२॥

भावार्थ: श्रीरामका वनगमन, केवटका प्रेम, गङ्गाजीसे पार उतरकर प्रयागमें निवास, वाल्मीकिजी और प्रभु श्रीरामजीका मिलन और जैसे भगवान् चित्रकूटमें बसे, वह सब कहा॥ २ ॥

**चौ०** 
> सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना॥  
> करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी॥ ३॥

भावार्थ: फिर मन्त्री सुमन्त्रजीका नगरमें लौटना, राजा दशरथजीका मरण, भरतजीका [ ननिहालसे ] अयोध्यामें आना और उनके प्रेमका बहुत वर्णन किया। राजाकी अन्त्येष्टि क्रिया करके नगरनिवासियोंको साथ लेकर भरतजी वहाँ गये जहाँ सुखकी राशि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए॥  
> भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी॥४॥

भावार्थ: फिर श्रीरघुनाथजीने उनको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्यापुरी लौट आये, यह सब कथा कही। भरतजीकी नन्दिग्राममें रहनेकी रीति, इन्द्रपुत्र जयन्तकी नीच करनी और फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी और अत्रिजीका मिलाप वर्णन किया॥४॥

**दो०** 
> कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।  
> बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग॥६५॥

भावार्थ: जिस प्रकार विराधका वध हुआ और शरभंगजीने शरीर त्याग किया, वह प्रसंग कहकर, फिर सुतीक्ष्णजीका प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्यजीका सत्संग-वृत्तान्त कहा॥६५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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