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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 63b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 63b

**चौ०** 
> गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥  
> देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ॥१॥

भावार्थ: गरुड़जी वहाँ गये जहाँ निर्बाध बुद्धि और पूर्ण भक्तिवाले काकभुशुण्डिजी बसते थे। उस पर्वतको देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और [ उसके दर्शनसे ही ] सब माया, मोह तथा सोच जाता रहा॥१॥

**चौ०** 
> करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना॥  
> बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए॥ २॥

भावार्थ: तालाबमें स्नान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्तसे वटवृक्षके नीचे गये। वहाँ श्रीरामजीके सुन्दर चरित्र सुननेके लिये बूढ़े-बूढ़े पक्षी आये हुए थे॥२॥

**चौ०** 
> कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा॥  
> आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा॥३॥

भावार्थ: भुशुण्डिजी कथा आरम्भ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षिराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे। पक्षियोंके राजा गरुड़जीको आते देखकर काकभुशुण्डिजीसहित सारा पक्षिसमाज हर्षित हुआ॥३॥

**चौ०** 
> अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा॥  
> करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा॥४॥

भावार्थ: उन्होंने पक्षिराज गरुड़जीका बहुत ही आदर-सत्कार किया और स्वागत ( कुशल ) पूछकर बैठनेके लिये सुन्दर आसन दिया। फिर प्रेमसहित पूजा करके काकभुशुण्डिजी मधुर वचन बोले—॥४॥

**दो०** 
> नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।  
> आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज॥६३ (क)॥

भावार्थ: हे नाथ! हे पक्षिराज! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। आप जो आज्ञा दें मैं अब वही करूँ। हे प्रभो! आप किस कार्यके लिये आये हैं ?॥६३ ( क )॥

**दो०** 
> सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।  
> जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस॥६३ (ख)॥

भावार्थ: पक्षिराज गरुड़जीने कोमल वचन कहे—आप तो सदा ही कृतार्थरूप हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवजीने आदरपूर्वक अपने श्रीमुखसे की है॥६३ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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