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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 62b"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 62b

**चौ०** 
> मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥  
> उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला॥१॥

भावार्थ: बिना प्रेमके केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादिके करनेसे श्रीरघुनाथजी नहीं मिलते। [ अतएव तुम सत्संगके लिये वहाँ जाओ जहाँ ] उत्तर दिशामें एक सुन्दर नील पर्वत है। वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं॥१॥

**चौ०** 
> राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥  
> राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर॥२॥

भावार्थ: वे रामभक्तिके मार्गमें परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणोंके धाम हैं और बहुत कालके हैं। वे निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कहते रहते हैं, जिसे भाँति-भाँतिके श्रेष्ठ पक्षी आदरसहित सुनते हैं॥२॥

**चौ०** 
> जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी॥  
> मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई॥३॥

भावार्थ: वहाँ जाकर श्रीहरिके गुणसमूहोंको सुनो, उनके सुननेसे मोहसे उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा। मैंने उसे जब सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणोंमें सिर नवाकर हर्षित होकर चला गया॥३॥

**चौ०** 
> ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा॥  
> होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खोवै चह कृपानिधाना॥४॥

भावार्थ: हे उमा! मैंने उसको इसीलिये नहीं समझाया कि मैं श्रीरघुनाथजीकी कृपासे उसका मर्म ( भेद ) पा गया था। उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्रीरामजी नष्ट करना चाहते हैं॥४॥

**चौ०** 
> कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा॥  
> प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥५॥

भावार्थ: फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षीकी ही बोली समझते हैं। हे भवानी! प्रभुकी माया [ बड़ी ही ] बलवती है, ऐसा कौन ज्ञानी है, जिसे वह न मोह ले ?॥५॥

**दो०** 
> ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।  
> ताहि मोह माया नर पावँर करहिं गुमान॥६२ (क)॥

भावार्थ: जो ज्ञानियोंमें और भक्तोंमें शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान्‌के वाहन हैं, उन गरुड़को भी मायाने मोह लिया। फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं॥६२ ( क )॥

**दो०** 
> सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन।  
> अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान॥६२ (ख)॥

भावार्थ: यह माया जब शिवजी और ब्रह्माजीको भी मोह लेती है, तब दूसरा बेचारा क्या चीज है ? जीमें ऐसा जानकर ही मुनिलोग उस मायाके स्वामी भगवान्‌का भजन करते हैं॥६२ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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