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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 61"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 61

**चौ०** 
> तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा॥  
> सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी॥१॥

भावार्थ: गरुड़ने आदरपूर्वक मेरे चरणोंमें सिर नवाया और फिर मुझको अपना सन्देह सुनाया। हे भवानी! उनकी विनती और कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेमसहित उनसे कहा—॥१॥

**चौ०** 
> मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही॥  
> तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥२॥

भावार्थ: हे गरुड़! तुम मुझे रास्तेमें मिले हो। राह चलते मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ ? सब सन्देहोंका तो तभी नाश हो जब दीर्घ कालतक सत्संग किया जाय॥२॥

**चौ०** 
> सुनिअ तहाँ हरिकथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई॥  
> जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना॥३॥

भावार्थ: और वहाँ ( सत्संगमें ) सुन्दर हरिकथा सुनी जाय, जिसे मुनियोंने अनेकों प्रकारसे गाया है और जिसके आदि, मध्य और अन्तमें भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी ही प्रतिपाद्य प्रभु हैं॥३॥

**चौ०** 
> नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहु तुम्ह जाई॥  
> जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा॥४॥

भावार्थ: हे भाई! जहाँ प्रतिदिन हरिकथा होती है, तुमको मैं वहीं भेजता हूँ, तुम जाकर उसे सुनो। उसे सुनते ही तुम्हारा सब सन्देह दूर हो जायगा और तुम्हें श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम होगा॥४॥

**दो०** 
> बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।  
> मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥६१॥

भावार्थ: सत्संगके बिना हरिकी कथा सुननेको नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोहके गये बिना श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें दृढ़ ( अचल ) प्रेम नहीं होता॥६१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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