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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 60"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 60

**चौ०** 
> तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ॥  
> सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा॥१॥

भावार्थ: तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजीके पास गये और अपना सन्देह उन्हें कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजीने श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाया और उनके प्रतापको समझकर उनके अत्यन्त प्रेम छा गया॥१॥

**चौ०** 
> मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता॥  
> हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा॥ २ ॥

भावार्थ: ब्रह्माजी मनमें विचार करने लगे कि कवि, कोविद और ज्ञानी सभी मायाके वश हैं। भगवान्‌की मायाका प्रभाव असीम है, जिसने मुझतकको अनेकों बार नचाया है॥२॥

**चौ०** 
> अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥  
> तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥३॥

भावार्थ: यह सारा चराचर जगत्‌ तो मेरा रचा हुआ है। जब मैं ही मायावश नाचने लगता हूँ, तब पक्षिराज गरुड़को मोह होना कोई आश्चर्य [ की बात ] नहीं है। तदनन्तर ब्रह्माजी सुन्दर वाणी बोले—श्रीरामजीकी महिमाको महादेवजी जानते हैं॥३॥

**चौ०** 
> बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू॥  
> तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी॥ ४ ॥

भावार्थ: हे गरुड़! तुम शंकरजीके पास जाओ। हे तात! और कहीं किसीसे न पूछना। तुम्हारे सन्देहका नाश वहीं होगा। ब्रह्माजीका वचन सुनते ही गरुड़ चल दिये॥४॥

**दो०** 
> परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास।  
> जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास॥६०॥

भावार्थ: तब बड़ी आतुरता ( उतावली ) से पक्षिराज गरुड़ मेरे पास आये। हे उमा! उस समय मैं कुबेरके घर जा रहा था और तुम कैलासपर थीं॥६०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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