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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 59"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 59

**चौ०** 
> नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा॥  
> खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई॥१॥

भावार्थ: गरुड़जीने अनेकों प्रकारसे अपने मनको समझाया। पर उन्हें ज्ञान नहीं हुआ, हृदयमें भ्रम और भी अधिक छा गया। [ सन्देहजनित ] दुःखसे दुःखी होकर, मनमें कुतर्क बढ़ाकर वे तुम्हारी ही भाँति मोहवश हो गये॥१॥

**चौ०** 
> ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं॥  
> सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया॥२॥

भावार्थ: व्याकुल होकर वे देवर्षि नारदजीके पास गये और मनमें जो सन्देह था, वह उनसे कहा। उसे सुनकर नारदको अत्यन्त दया आयी। [ उन्होंने कहा— ] हे गरुड़! सुनिये, श्रीरामजीकी माया बड़ी ही बलवती है॥२॥

**चौ०** 
> जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआईं बिमोह मन करई॥  
> जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही॥३॥

भावार्थ: जो ज्ञानियोंके चित्तको भी भलीभाँति हरण कर लेती है और उनके मनमें जबर्दस्ती बड़ा भारी मोह उत्पन्न कर देती है, तथा जिसने मुझको भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षिराज! वही माया आपको भी व्याप गयी है॥३॥

**चौ०** 
> महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें॥  
> चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा॥४॥

भावार्थ: हे गरुड़! आपके हृदयमें बड़ा भारी मोह उत्पन्न हो गया है। यह मेरे समझानेसे तुरंत नहीं मिटेगा। अतः हे पक्षिराज! आप ब्रह्माजीके पास जाइये और वहाँ जिस कामके लिये आदेश मिले, वही कीजियेगा॥४॥

**दो०** 
> अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान।  
> हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान॥५९॥

भावार्थ: ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारदजी श्रीरामजीका गुणगान करते हुए और बारंबार श्रीहरिकी मायाका बल वर्णन करते हुए चले॥५९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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