---
title: "उत्तरकाण्ड दोहा 58"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-58"
lang: "hi"
---

# उत्तरकाण्ड · दोहा 58

**चौ०** 
> गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा॥  
> अब सो कथा सुनहु जेहि हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू॥१॥

भावार्थ: हे गिरिजे! मैंने वह सब इतिहास कहा कि जिस समय मैं काकभुशुण्डिके पास गया था। अब वह कथा सुनो जिस कारणसे पक्षिकुलके ध्वजा गरुड़जी उस काकके पास गये थे॥१॥

**चौ०** 
> जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा॥  
> इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो॥२॥

भावार्थ: जब श्रीरघुनाथजीने ऐसी रणलीला की जिस लीलाका स्मरण करनेसे मुझे लज्जा होती है—मेघनादके हाथों अपनेको बँधा लिया—तब नारद मुनिने गरुड़को भेजा॥२॥

**चौ०** 
> बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा॥  
> प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती॥३॥

भावार्थ: सर्पोंके भक्षक गरुड़जी बन्धन काटकर गये, तब उनके हृदयमें बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ। प्रभुके बन्धनको स्मरण करके सर्पोंके शत्रु गरुड़जी बहुत प्रकारसे विचार करने लगे—॥३॥

**चौ०** 
> ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा॥  
> सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं॥४॥

भावार्थ: जो व्यापक, विकाररहित, वाणीके पति और माया-मोहसे परे ब्रह्म परमेश्वर हैं, मैंने सुना था कि जगत्‌में उन्हींका अवतार है। पर मैंने उस ( अवतार ) का प्रभाव कुछ भी नहीं देखा॥४॥

**दो०** 
> भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।  
> खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम॥५८॥

भावार्थ: जिनका नाम जपकर मनुष्य संसारके बन्धनसे छूट जाते हैं उन्हीं रामको एक तुच्छ राक्षसने नागपाशसे बाँध लिया॥५८॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-57  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/uttar-kand/doha-59

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
