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title: "उत्तरकाण्ड दोहा 57"
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# उत्तरकाण्ड · दोहा 57

**चौ०** 
> तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई॥  
> माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका॥१॥

भावार्थ: उस सुन्दर पर्वतपर वही पक्षी (काकभुशुण्डि) बसता है। उसका नाश कल्पके अन्तमें भी नहीं होता। मायारचित अनेकों गुण-दोष, मोह, काम आदि अविवेक,॥१॥

**चौ०** 
> रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं॥  
> तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा॥२॥

भावार्थ: जो सारे जगत्‌में छा रहे हैं, उस पर्वतके पास भी कभी नहीं फटकते। वहाँ बसकर जिस प्रकार वह काक हरिको भजता है, हे उमा! उसे प्रेमसहित सुनो॥२॥

**चौ०** 
> पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई॥  
> आँब छाँह कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा॥३॥

भावार्थ: वह पीपलके वृक्षके नीचे ध्यान धरता है। पाकरके नीचे जपयज्ञ करता है। आमकी छायामें मानसिक पूजा करता है। श्रीहरिके भजनको छोड़कर उसे दूसरा कोई काम नहीं है॥३॥

**चौ०** 
> बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा॥  
> राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना॥४॥

भावार्थ: बरगदके नीचे वह श्रीहरिकी कथाओंके प्रसङ्ग कहता है। वहाँ अनेकों पक्षी आते और कथा सुनते हैं। वह विचित्र रामचरित्रको अनेकों प्रकारसे प्रेमसहित आदरपूर्वक गान करता है॥४॥

**चौ०** 
> सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला॥  
> जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा॥५॥

भावार्थ: सब निर्मल बुद्धिवाले हंस, जो सदा उस तालाबपर बसते हैं, उसे सुनते हैं। जब मैंने वहाँ जाकर यह कौतुक (दृश्य) देखा, तब मेरे हृदयमें विशेष आनन्द उत्पन्न हुआ॥५॥

**दो०** 
> तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।  
> सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास॥५७॥

भावार्थ: तब मैंने हंसका शरीर धारण कर कुछ समय वहाँ निवास किया और श्रीरघुनाथजीके गुणोंको आदरसहित सुनकर फिर कैलासको लौट आया॥५७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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